यातना भुगत चुके, यातना पर लिखने के हकदार.?

-सुनील कुमार॥ हिंदी की एक जानी-मानी लेखिका मैत्रेयी पुष्पा हाल के महीनों में अपने कई सोशल मीडिया बयानों को लेकर बहस का सामान बनी हैं। बहुत से लोगों का यह मानना है कि उन पर उम्र का असर हो रहा है और वह बहुत ही रद्दी किस्म की बातें लिख रही हैं। हम पुरानी बातों को तो नहीं देख पाए लेकिन अभी उन्होंने एक ताजा फेसबुक पोस्ट में कह दिया है कि जो खुद तलाकशुदा हैं या पति से अलग हैं वे किसी दूसरे के तलाक के उचित अनुचित (होने) पर बहस कर रही हैं, और इसके साथ उन्होंने हैरानी...

रँगे हाथ धरा गया खूनी समाज..

क्या जब किसी की मौत के बाद उसका खून हाथों में लगा हो, तभी उसे हत्या कहा जा सकता है। या किसी को जान बूझकर तिल-तिल कर मरने की हालत में पहुंचा देने को भी हत्या कहा जाएगा। आज देश को इस सवाल का सामना कर अपने गिरेबां में झांक ही लेना चाहिए। आखिर कब तक हम स्वार्थी समाज बन कर रहेंगे। कब तक हम ये सोचेंगे कि हमारा कोई अपना बिना किसी दोष के जेल में बंद नहीं है, तो हम क्यों परेशान हों। क्यों हमारे माथे पर बल नहीं पड़ते, जब हम देखते हैं कि सत्ता अपने फायदे...

गोया मुख्यमंत्री न हुए मोदीजी के कपड़े हो गए..

नारायण दत्त तिवारी ने उत्तराखंड के विकास के लिए नौकरशाही को नियंत्रित करते बहुत से कार्य किए, जैसे बेरोज़गारी हटाने के लिए उन्होंने सिडकुल स्थापित किया। इस तरह के विकास कार्य कर कोई नेता उत्तराखंडवासियों के बीच लोकप्रिय होता तो शायद उसे दिल्ली से हटा पाना मुश्किल होता। –हिमांशु जोशी॥20 साल में 11 मुख्यमंत्री, जी हां भारत में उत्तराखंड एकमात्र ऐसा प्रदेश है जहां कपड़े की तरह मुख्यमंत्रियों को बदला जाता है, भाजपा हो या कांग्रेस प्रदेश की सियासत के फरमान दिल्ली से जारी किए जाते हैं।https://twitter.com/uttarakhand/status/1410995904870453248?s=20 इस बार तो हद हो गई पूर्ण बहुमत से आई भाजपा सरकार ने प्रदेशवासियों...

फिल्म और कलम उनके लिए क्रांति के औजार थे..

-विनीत तिवारी॥ महान फिल्म निर्देशक, फिल्म-लेखक, कहानीकार-उपन्यासकार, पत्रकार और भी न जाने कितनी ही प्रतिभाओं के धनी ख्वाजा अहमद अब्बास की रचनात्मकता और सामाजिक चिंताओं को उनकी फ़िल्मों के माध्यम से समझने के लिए भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) की केन्द्रीय इकाई ने 3 जुलाई 2021 को ज़ूम के माध्यम से एक ऑनलाइन कार्यक्रम श्रृंखला की शुरुआत की। कार्यक्रम में सीएसडीएस, दिल्ली के प्रोफ़ेसर रविकांत ने अब्बास की फिल्म “राही” के जरिये बताया कि उनकी निर्देशकीय दृष्टि ग़रीब, मजलूम और मज़दूरों की ज़िंदगी की परतें खोलती थी। देवानंद और नलिनी जयवंत अभिनीत इस फ़िल्म के केन्द्र में आसाम के चाय...

सुप्रीम कोर्ट में इतनी बार घिरने के बाद भी सरकार की बेशर्मियाँ..

-सुनील कुमार कोरोना के मोर्चे पर एक बार फिर केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में बहुत बुरी तरह घिरी है। सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगाई गई थी कि कोरोना से मरने वालों के परिवारों को 4-4 लाख मुआवजा दिया जाए। इस पर केंद्र सरकार ने पहले तो सुप्रीम कोर्ट में कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें कोरोना से बहुत बुरी आर्थिक स्थिति से गुजर रही हैं और ऐसा कोई मुआवजा दे पाना उनकी क्षमता से परे हैं। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया गया उस वक्त सरकारी वकील ने वहां पर यह कहा कि आर्थिक क्षमता कोई मुद्दा...

बड़े ओहदों पर बैठे ज़िम्मेदारों की गैरजिम्मेदारी..

-सुनील कुमार॥ जब बड़े जिम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग कोई लापरवाह बात कहते हैं तो अटपटा लगता है। आमतौर पर अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी या जमानत जैसे देश के सबसे ज्वलंत मामले में ही मुंह खोलने वाले भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभी अपने गांव जाकर वहां एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मंच से जब यह कहा कि उन्हें 5 लाख रूपये तनख्वाह मिलती है, लेकिन उनमें से पौने तीन लाख तो इनकम टैक्स कट जाता है, और एक शिक्षक की तनख्वाह उनसे ज्यादा बचती है, तो लोगों को बात अटपटी लगी। अटपटी कई मायनों में लगी, एक तो...

पिछले का पता नहीं, अब एक और राहत पैकेज

कोरोना की दूसरी लहर ने जैसी तबाही देश में मचाई है, उससे उबरने में न जाने कितना वक्त लगेगा। दूसरी लहर के दौरान जब स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी, लोग इलाज के लिए तरस रहे थे, तब तो सरकार जनता की कुछ खास मदद नहीं कर पाई। लेकिन अब सरकार ने एक बार फिर राहत पैकेज का ऐलान किया है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के पैकेज में आठ राहत उपायों की घोषणा की है, जिनमें से चार ऐलान नए हैं। वित्त मंत्री ने कोरोना से प्रभावित सेक्टरों के लिए 1.1 लाख करोड़ रुपए की...

लोकतंत्र की अहमियत समझना जरूरी..

खास लोगों की आवाजाही आम लोगों पर किस कदर भारी पड़ती है, इसका ताजा उदाहरण कानपुर से सामने आया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस वक्त कानपुर में अपने पैतृक आवास के दौरे पर हैं। दिल्ली से कानपुर तक की यात्रा महामहिम ने रेल से संपन्न की। हालांकि राष्ट्रपति की रेल यात्रा भी खास तरीके की होती है।  राष्ट्रपति की यात्रा से पहले कानपुर सेंट्रल और रेलवे स्टेशन के आसपास सुरक्षा के चाक चौबंद इंतजाम किए गए थे। यातायात मार्ग में परिवर्तन किया गया। स्टेशन के आसपास की दुकानों, ई रिक्शा, आटो आदि पर कुछ वक्त का प्रतिबंध लगाया गया। इससे...

सत्ता के नशे में धुत्त राष्ट्रपति.?

-सुनील कुमार॥ राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 4 बरस बाद अपने गृह ग्राम जाने के लिए दिल्ली से कानपुर पहुंचे। इस मौके की जो तस्वीरें सरकारी अफसरों ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की हैं उनमें कानपुर के रेलवे स्टेशन पर पटरियों के नीचे लगी स्लीपर तक को रंग कर सजाया गया था, जाहिर है कि कानपुर शहर को भी कुछ सजाया गया होगा और कानपुर के पास से राष्ट्रपति के अपने गांव को भी। लेकिन इसके पहले कि यह सब खुशियां कामयाब हो पातीं, कानपुर शहर में राष्ट्रपति के लिए पौन घंटे तक रोके गए ट्रैफिक में फंसी एंबुलेंस में तड़प तड़प...

हिन्दू हृदय सम्राट का मुकुट खतरे में है..

-विष्णु नागर॥ हिन्दू हृदय सम्राट को यूँ तो जूते से मुकुट तक सब पहनकर सोने का अभ्यास था मगर उस रात उनके गंजे सिर में खुजली बहुत चली।वह सिर खुजाते और मुकुट पहनते।फिर खुजाते और फिर पहनते। कोई सौ बार के बाद थक कर उन्होंने मुकुट सिरहाने रख दिया। तुरंत ही ईश्वर की कृपा से उनकी नींद सुबह सात बजे खुली,जबकि रोज पाँच बजे खुल जाती थी। खैर सम्राट ने ईश्वर को धन्यवाद दिया।सूरज देवता को प्रणाम करके उनसे क्षमा माँगी कि आज मैं आपके दर्शन विलंब से कर पाया।क्षमा करें। आप के सहारे ही मैं हिन्दू हृदय सम्राट हूँ।...

स्टेज पर ट्रे लिए खड़ी शोपीस सी लडक़ी

-सुनील कुमार॥ छत्तीसगढ़ में अभी खबर वीडियो के साथ तैर रही है कि एक आदिवासी इलाके में महिला सरपंच का पति किस तरह गुंडागर्दी कर रहा है, और कैसे एक म्युनिसिपल इलाके में महिला नगर पालिका अध्यक्ष का पति गुंडागर्दी कर रहा है। कानून बनने से महिला आरक्षित सीट पर महिला पंच-सरपंच, या पार्षद-महापौर बन जाती हैं लेकिन उनके नाम पर उनके पति ही दफ्तर चलते हैं, गुंडागर्दी करते हैं। महिला की सहमति बिना किस तरह वसूली-उगाही करते हैं। कानून ने गांव और शहर में तो महिला को बराबरी का दर्जा दे दिया है, लेकिन घर के भीतर वह गुलाम...

नक्सलियों को भी तो इलाज का हक़..

-सुनील कुमार॥ बस्तर पुलिस की बार-बार एक अपील आ रही है कि माओवादी आत्मसमर्पण करें और कोरोना का इलाज कराएं, अपनी, अपने साथियों की, और ग्रामीणों की जान बचाएं। इसके साथ ही पुलिस यह भी बता रही है कि किस तरह आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को कोरोना की वैक्सीन लगाई जा रही है। बात सही है कि जंगलों में जो माओवादी हैं, जो इलाज के लिए शहरों तक नहीं आ पाते हैं, उनके लिए कोरोना का इलाज जंगल में मुमकिन भी नहीं है, और न ही कोरोना की वैक्सीन उन्हें हासिल हो सकती है। नतीजा यह है कि अभी 2...