आपके आये या नहीं, रेपिस्टों के अच्छे दिन आ गए..

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-विष्णु नागर।। लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार और भाजपा यह सिद्ध करने पर आमादा है कि 19 साल की हाथरस की दलित लड़की के साथ बलात्कार नहीं हुआ था और वे लड़के जिन पर ऐसा आरोप है,वे निर्दोष हैं या कम से कम बलात्कार के दोषी नहीं हैं।दोषियों की […]

शतरंज की चाल में ‘मात’ वज़ीर की होती है, पैदल की नहीं..

-अनिल शुक्ल।। देस-दुनिया से लगातार आते ‘थू-थू’ के छींटो से अठारह दिन तक अपना चेहरा पोंछ डालने की कोशिश में एनेक्सी भवन (लखनऊ) के पांचवे तल पर बैठे मुख्यमंत्री शतरंज खेलते रहे। बाज़ी बिछा कर सामने बैठा जोड़ीदार लुलपुंज था। डरता-काँपता अपने पैदल को एक-एक कदम आगे बढ़ाता। जवाब में […]

एचआर तोताराम के चलते टाईम्स समूह का प्रस्ताव ठुकरा दिया..

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-ओम थानवी।। 1984 की बात है। राजेंद्र माथुर नवभारत टाइम्स का संस्करण शुरू करने के इरादे से जयपुर आए। पहली, महज़ परिचय वाली, मुलाक़ात में कहा: “जानता हूँ आप इतवारी का काम देखते हैं। “फिर अगले ही वाक्य में, “और अच्छा देखते हैं”। कुछ रोज़ बाद में उन्होंने मुझे नवभारत […]

गावस्कर का आत्मघाती मजाक खासा महंगा पड़ा

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-सुनील कुमार।।हिन्दुस्तानी क्रिकेट के एक बड़े नामी-गिरामी और इज्जतदार भूतपूर्व खिलाड़ी, वर्तमान कमेंटेटर सुनील गावस्कर अपनी एक लापरवाह एक टिप्पणी को लेकर ऐसे बुरे फंसे हैं कि उन्होंने कभी ऐसा सोचा भी नहीं होगा। गावस्कर का नाम तमाम विवादों से परे रहते आया है, और उनके बारे में यह कल्पना […]

कहीं पे हकीकत, कहीं पे फसाना..

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-सुनील कुमार।।हिन्दुस्तान में इन दिनों हकीकत देखनी हो तो कार्टून देखें और अखबारों में खबरें पढ़ें, और फसाने देखने हों तो टीवी चैनलों पर खबरें देखें, और सोशल मीडिया पर फुलटाईम नौकरी की तरह काम करने वाली ट्रोल आर्मी की पोस्ट देखें। कुछ महीनों से यह लतीफा चल रहा था […]

इन्साफ की डगर पे..

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-विष्णु नागर।। जिस दिन यह टिप्पणी लिख रहा हूँ उस दिन पता नहीं क्यों सुबह से ही हेमंत कुमार का गाया और बचपन में और विशेषकर स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर कई बार सुना यह गाना मन में बारबार गूँजता रहा – ‘ इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ […]

राजेन्द्र माथुर यानी पत्रकारिता के पर्याय..

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-विष्णु नागर।। राजेन्द्र माथुर को तो नहीं मगर उनके लेखन को ‘नई दुनिया ‘ के माध्यम से तब से जानना शुरू किया,जब हायरसेकंडरी का छात्र था और अखबार और उसमें छपे संपादकीय को पढ़ने में रुचि जाग चुकी थी। तब इन्दौर से अखबार तो तीन या चार छपते थे- ‘ […]

हेडलाइन मैनेजमेंट की एक बड़ी कोशिश और उसका प्रभाव..

-संजय कुमार सिंह।।वैसे तो बीस लाख करोड़ का सच सब जानते हैं। जब विदेश में रखा काला धन नहीं आया। आना तो छोड़िए, लाने के लिए क्या प्रयास हुए इसे बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई। 1,25,000 करोड़ का बिहार पैकेज और 1,70,000 करोड़ का हाल का पैकेट सब […]

गिर कर शहतूत बनते हुए..

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क्या आपने कभी शहतूत देखा है,जहां गिरता है, उतनी जमीन परउसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है।गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।मैंने कितने मजदूरों को देखा हैइमारतों से गिरते हुए,गिरकर शहतूत बन जाते हुए। ईरानी कवि साबिर हका की यह कविता इस समय जितनी प्रासंगिक है, शायद किसी और […]

ट्रम्प: जो दवा के नाम पर जहर दे दे..

-चंद्र प्रकाश झा।। कोरोना के खिलाफ मुकाबला में वैश्विक वीर की भूमिका में नजर आने को आतुर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यप्रणाली एक जैसी लगती है. अमेरिका में कोरोना का पहला संक्रमित मरीज भारत से 10 दिन पहले 20 जनवरी को मिला। […]

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