टीवी चैनलों की बहस के बाद मौत से उपजे सवाल..

Desk

–सुनील कुमार||कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव त्यागी की कल मौत हो गई। वे एक समाचार चैनल की बहस पर थे, और वहां भाजपा के एक प्रवक्ता अपनी आदत के मुताबिक कांग्रेस प्रवक्ता पर जहरीले आरोप लगा रहे थे। जिससे कि हो सकता है वे विचलित भी हुए हों, […]

सीना ठोंक कर हिसाब माँगने वाले राहत साहब हम से जुदा हो गए..

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-तौसीफ कुरैशी।। 1 जनवरी 1950 को इंदौर में जन्मे राहत क़ुरैशी इंदौरी ने लगभग 16 वर्षों से अधिक उर्दू साहित्य को इंदौर विश्व विद्यालय में पढ़ाया।उनके 6 से अधिक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुए।50 से अधिक फिल्मी गीत लिखे , म्यूज़िक एल्बम आयीं और फिल्मों में अभिनय भी किया। “तुझे क्या […]

अपूर्वानंद के लिए दो शब्द: अजय तिवारी

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-अजय तिवारी।। अपूर्वानंद मेरे सहकर्मी रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में वे रीडर (अब के अनुसार एसोशिएट प्रोफ़ेसर) होकर आये थे, जब हम वहाँ कुछ ही महीनों पहले प्रोफ़ेसर बने थे। विभाग में वे कम दिलचस्पी लेते थे। हमारे दो अन्य वरिष्ठ प्रोफ़ेसर सुधीश पचौरी और रमेश गौतम […]

कोरोना पीड़ित और न्यू इंडिया..

admin

कोरोना से लड़ाई में भारत बुरी तरह मात खा चुका है, इसका ताजा प्रमाण ये है कि अब देश में मामले इकाई-दहाई में नहीं बल्कि हजारों में बढ़ने लगे हैं। मार्च के अंतिम सप्ताह में लॉकडाउन लगाकर सरकार ने यह भरोसा दिलाया था कि कुछ दिनों का कष्ट सह लें […]

इन्साफ की डगर पे..

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-विष्णु नागर।। जिस दिन यह टिप्पणी लिख रहा हूँ उस दिन पता नहीं क्यों सुबह से ही हेमंत कुमार का गाया और बचपन में और विशेषकर स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर कई बार सुना यह गाना मन में बारबार गूँजता रहा – ‘ इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ […]

राजेन्द्र माथुर यानी पत्रकारिता के पर्याय..

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-विष्णु नागर।। राजेन्द्र माथुर को तो नहीं मगर उनके लेखन को ‘नई दुनिया ‘ के माध्यम से तब से जानना शुरू किया,जब हायरसेकंडरी का छात्र था और अखबार और उसमें छपे संपादकीय को पढ़ने में रुचि जाग चुकी थी। तब इन्दौर से अखबार तो तीन या चार छपते थे- ‘ […]

धरती पर इंसानों से अधिक कमीनी नस्ल कोई और है?

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-सुनील कुमार।।पिछले तीन दिनों से केरल की एक हथिनी और उसके पेट में पल रहे उसके शिशु की मौत की खबर तस्वीरों सहित सोशल मीडिया और टीवी-अखबारों में इस कदर छाई हुई है कि बहुत से संवेदनशील लोग उसे देख भी नहीं पा रहे हैं। केरल में लोगों ने एक […]

रुख हवाओं का जिधर है, हम उधर के हैं..

Mithilesh

-मिथिलेश।। मित्रो! आप सबको पता है हम मध्यवर्ग हैं और हम भी इसी दुनिया के वाशिंदे हैं। हाँ, हाँ, आपने सही पहचाना हम खाये-अघाये पगुराते हुए मध्यवर्ग हैं। ज्यादातर मामलों में हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कि देश दुनिया में क्या कुछ हो-जा रहा है? और यदि हो-जा भी रहा […]

हेडलाइन मैनेजमेंट की एक बड़ी कोशिश और उसका प्रभाव..

-संजय कुमार सिंह।।वैसे तो बीस लाख करोड़ का सच सब जानते हैं। जब विदेश में रखा काला धन नहीं आया। आना तो छोड़िए, लाने के लिए क्या प्रयास हुए इसे बताने की भी जरूरत नहीं समझी गई। 1,25,000 करोड़ का बिहार पैकेज और 1,70,000 करोड़ का हाल का पैकेट सब […]

गिर कर शहतूत बनते हुए..

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क्या आपने कभी शहतूत देखा है,जहां गिरता है, उतनी जमीन परउसके लाल रस का धब्बा पड़ जाता है।गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं।मैंने कितने मजदूरों को देखा हैइमारतों से गिरते हुए,गिरकर शहतूत बन जाते हुए। ईरानी कवि साबिर हका की यह कविता इस समय जितनी प्रासंगिक है, शायद किसी और […]

भाषा का मजहब

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एकता में अनेकता भारत का स्वस्थापित सत्य है। नाना प्रकार के खान-पान, वेशभूषा, कला-संस्कृति, साहित्य, भाषाएं और बोलियां- सब मिलकर देश की ऐसी धज बनाते हैं जो शायद सैकड़ों इन्द्रधनुष मिलकर भी न बना सकें। लेकिन अफसोस कि कुछ विघ्नसंतोषी लोग इस विविधरंगी छटा पर कालिख पोत देना चाहते हैं। […]

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