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Author: अनिल शुक्ल (अनिल शुक्ल)

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मथुरा: सर्व धर्म सम भाव बनाम धार्मिक कठमुल्लावाद..

-अनिल शुक्ल॥ ‘सर्व धर्म सम भाव’ की सोच और कर्तव्य कैसे धार्मिक कठमुल्लावाद, सोशल मीडिया और मीडिया के क्रूर प्रचार की भेंट चढ़ जाते हैं और कैसे पुलिस-प्रशासन इन मामलों में एकतरफ़ा कार्रवाई करने को तत्काल सक्रिय हो जाती है, इसका उदाहरण दिल्ली से मथुरा आए ‘ख़ुदाई ख़िदमतगाऱ संस्था’ के कार्यकर्ता हैं। मथुरा पुलिस ने...

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शतरंज की चाल में ‘मात’ वज़ीर की होती है, पैदल की नहीं..

-अनिल शुक्ल।। देस-दुनिया से लगातार आते ‘थू-थू’ के छींटो से अठारह दिन तक अपना चेहरा पोंछ डालने की कोशिश में एनेक्सी भवन (लखनऊ) के पांचवे तल पर बैठे मुख्यमंत्री शतरंज खेलते रहे। बाज़ी बिछा कर सामने बैठा जोड़ीदार लुलपुंज था। डरता-काँपता अपने पैदल को एक-एक कदम आगे बढ़ाता। जवाब में यह अपने पैदल को तो...

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अमरसिंह न अमर थे न रहेंगे

-अनिल शुक्ल।। अमरसिंह के गुज़र जाने पर हिंदी के राष्ट्रीय स्तर पर जाने गए पत्रकारों से लेकर जिला स्तर तक के पत्रकारों की टिप्पणियों को पढ़ना ख़ासा दिलचस्प अनुभव था। वीरेंद्र सेंगर और शकील अख़्तर और कुछेक इक्का-दुक्का पत्रकारों को छोड़कर ज़्यादातर भाई लोगों (जो उनसे गाहे-बगाहे उपकृत हुए वे सभी और जो नहीं हुए...

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कॉमेडी, एक्शन, रोमांस, थ्रिलर, ट्रेजेडी, ड्रामा उर्फ़ बस डिप्लोमेसी

-अनिल शुक्ल।। आइये आइये देखिये श्रीमान ! देखिये देखिये कैसे क़ुर्बान चढ़ती है चाह मज़दूरों के घर द्वार तक पहुंचने की! आइये और देखिये कैसे पड़ोसी राज की एक राजकुमारी उन्हें सपने दिखाती है 56 दिन से चप्पल घसीटते मज़दूरों को बस में तफरीह कराने की। आइये और देखिये श्रीमान, कैसे कूदते फांदते अपने राज...

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1857 के महान प्रवासी पलायन की पुनरावृत्ति

-अनिल शुक्ल।। 2020 के मई महीने में भारतीय प्रवासी श्रमिकों का पलायन इतिहास की न तो पहली बानगी है न अंतिम। यह घटना बताती है कि पहले भी धरती तब-तब कांपी है जब-जब किसान पुत्रों ने पलायन किया है। 10 मई 1857 के दिन का इतवार होना महज़ इत्तफ़ाक़ हो लेकिन मेरठ में ‘सन्डे इज़...

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