अलविदा कलमुंहे साल.!

-अनिल शुक्ल॥‘आपदा को अवसर’ बनाने में मिली कामयाबी के चलते जाते हुए साल को ‘शुक्रिया’ कहने वालों की तादाद बहुत थोड़ी होगी। यूं तो हर साल इंसान को अच्छे-बुरे दिन दिखाता हैं लेकिन मौजूदा साल जैसा दुःस्वप्न लेकर आया पूरे साल बर्बादियों की बारिश होती रही।सहस्त्राब्दियों से धार्मिक सहिष्णुता और […]

पराजित फेसबुक..

-अनिल शुक्ल॥बीते रविवार की शाम ने उस ‘फेसबुक’ को हथियार डालने को मजबूर कर दिया जिसने ‘किसान एकता मोर्चा’ के ऑफीशियल ‘फेसबुक पेज’ और ‘इंस्टाग्राम एकाउंट’ को ‘स्पैम’ (अवांछनीय ई-मेल) का फ्लैग लगाकर डिलीट कर दिया था। भारत, यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के विभिन्न शहरों में किसान आंदोलन के […]

लेफ़्ट: चुनौतियाँ ही चुनौतियाँ..

बिहार के चुनाव में मिली लेफ्ट को शानदार सफलता और देश के स्तर पर उभरे किसान आंदोलन में लेफ़्ट का सीधा दख़ल क्या इस बात का सबूत है कि अब वे ‘संघ’ परिवार के हिन्दुवाद को चुनौती देने में कामयाब हों रहे हैं? क्या प० बंगाल के आगामी चुनावों में […]

लेफ़्ट : बहुत कठिन है डगर पनघट की..

भारत की राजनीति में लेफ़्ट की पार्टियों को 100 साल पूरे हो रहे हैं। ब्रिटिश शासनकाल से लेकर आज़ाद भारत में लेफ़्ट एक लड़ाक़ू क़ौम के रूप में अपनी पहचान बनाते रहे हैं। फिर क्या वजह है कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दाखिल होने से पहले वे नेस्तनाबूद […]

कला और हंसिया की जुगलबंदी

–अनिल शुक्ल|| भारत सहित सारी दुनिया में चर्चित पंजाबी के नामचीन गायकों और संगीतकारों ने इन दिनों दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर डेरा जमा लिया है। वहां मौजूद लाखों किसानों की मुश्क़िलों से भरी ज़िंदगी के पक्ष में बने गीतों को वे सब गा रहे हैं। कला और हंसिया की […]

लोकतान्त्रिक है ‘प्रेम’

-अनिल शुक्ल॥ ‘संविधान दिवस’ के दिन ‘प्रेम’ स्मरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि प्रेम में भी लोकतंत्र का भाव है। इलाहबाद हाईकोर्ट ने ‘प्रेम’ को आधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति पंकज नक़वी की खंड पीठ ने एक वयस्क हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के के प्रेम […]

बंगाल चुनाव में केंद्र कटघरे में होगा : दीपांकर भट्टाचार्य..

हाल के बिहार चुनावों में देश के सामने भाकपा (माले) एक बड़े और सुदृढ़ राजनितिक समूह के रूप में उभर कर आया है। 19 में से 12 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का ज़मीनी आधार कैसा था और कैसे उसने तुम्मनखां भाजपा-जेडीयू गठबंधन को धूल चटाई यह बिहार से बाहर […]

मुंबई में क्यों न हुए सौमित्र ?

-अनिल शुक्ल॥ अपनी फिल्म रचना के संसार का उल्लेख करते हुए सौमित्र चटर्जी के बारे में महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे लिखते हैं “वह ‘अच्छा’ अभिनेता है या नहीं क्या पता, लेकिन वह इतना ‘बड़ा’ अभिनेता है कि मैं उसे अपनी फिल्मों में लेने से ख़ुद को रोक नहीं पाता हूँ […]

मथुरा: सर्व धर्म सम भाव बनाम धार्मिक कठमुल्लावाद..

-अनिल शुक्ल॥ ‘सर्व धर्म सम भाव’ की सोच और कर्तव्य कैसे धार्मिक कठमुल्लावाद, सोशल मीडिया और मीडिया के क्रूर प्रचार की भेंट चढ़ जाते हैं और कैसे पुलिस-प्रशासन इन मामलों में एकतरफ़ा कार्रवाई करने को तत्काल सक्रिय हो जाती है, इसका उदाहरण दिल्ली से मथुरा आए ‘ख़ुदाई ख़िदमतगाऱ संस्था’ के […]

शतरंज की चाल में ‘मात’ वज़ीर की होती है, पैदल की नहीं..

-अनिल शुक्ल।। देस-दुनिया से लगातार आते ‘थू-थू’ के छींटो से अठारह दिन तक अपना चेहरा पोंछ डालने की कोशिश में एनेक्सी भवन (लखनऊ) के पांचवे तल पर बैठे मुख्यमंत्री शतरंज खेलते रहे। बाज़ी बिछा कर सामने बैठा जोड़ीदार लुलपुंज था। डरता-काँपता अपने पैदल को एक-एक कदम आगे बढ़ाता। जवाब में […]

अमरसिंह न अमर थे न रहेंगे

-अनिल शुक्ल।। अमरसिंह के गुज़र जाने पर हिंदी के राष्ट्रीय स्तर पर जाने गए पत्रकारों से लेकर जिला स्तर तक के पत्रकारों की टिप्पणियों को पढ़ना ख़ासा दिलचस्प अनुभव था। वीरेंद्र सेंगर और शकील अख़्तर और कुछेक इक्का-दुक्का पत्रकारों को छोड़कर ज़्यादातर भाई लोगों (जो उनसे गाहे-बगाहे उपकृत हुए वे […]

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