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Author: अनिल शुक्ल (अनिल शुक्ल)

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लखनऊ प्रेस क्लब : एडिटर हेल्ड फॉर वॉयलेंस

लखनऊ प्रेस क्लब : एडिटर हेल्ड फॉर वॉयलेंस

-अनिल शुक्ल|| उप्र के अख़बार आज अपने स्वातंत्र्य बोध को लेकर सवालिया निशानों के घेरे में हैं। क्या सचमुच सांप्रदायिक घृणा और जातीय उन्माद उनके प्रथम मूल्य बोध बन चुके हैं। क्या सचमुच वे सत्ता और स्थापना की आलोचना के अपने नैतिक कर्तव्यों से विमुख हो चुके हैं? यदि ऐसा है तो इनकी जड़ें कब...

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मरियम वेंडर: ऑल इज वेल..

मरियम वेंडर: ऑल इज वेल..

[मशहूर अमेरिकन कवियत्री मिरियम वेंडर (1894-1983) ने कोई सौ साल पहले एक कविता लिखी थी-चौकीदार। कविता तब के अमेरिकी समाज में काफी लोकप्रिय हुई थी। पिछले दिनों कोलकाता के प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक ‘टेलीग्राफ़’ ने इसे अपने पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापा। दैनिक ‘देशबंधु’ ने इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है] ऑल इज़ वेल! तंग-...

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किसान आंदोलन का विकट संकट..

-अनिल शुक्ल || बेशक़ राकेश टिकैत के आंसुओं ने किसान आंदोलन को फिलहाल उखड़ने से बचा लिया है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आंदोलन के भीतर जो कमज़ोरियाँ हैं और इसके नेतृत्व में शासन के षड्यंत्रों को बूझने की जो कार्यकुशलता है वह अब ‘फूल प्रूफ’ हो गयी है। 2 महीने तक शांतिपूर्ण तरीके...

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लव, सियासत और इंसाफ़..

-अनिल शुक्ल॥बीते मंगलवार ‘बॉम्बे हाईकोर्ट ने विपरीत धर्म की एक शादी का आदेश सुनाया। लड़के द्वारा अपनी प्रेमिका को उसके घरवालों द्वारा जबरन घर में रोके जाने के मामले में दायर ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका’ की सुनवाई के दौरान जस्टिस एसएस शिंदे और जस्टिस जगदीश पिटाले की डिवीजज बेंच ने लड़की को तलब करके उसकी राय...

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अलविदा कलमुंहे साल.!

-अनिल शुक्ल॥‘आपदा को अवसर’ बनाने में मिली कामयाबी के चलते जाते हुए साल को ‘शुक्रिया’ कहने वालों की तादाद बहुत थोड़ी होगी। यूं तो हर साल इंसान को अच्छे-बुरे दिन दिखाता हैं लेकिन मौजूदा साल जैसा दुःस्वप्न लेकर आया पूरे साल बर्बादियों की बारिश होती रही।सहस्त्राब्दियों से धार्मिक सहिष्णुता और आपसी भाईचारे के रंग में...

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पराजित फेसबुक..

-अनिल शुक्ल॥बीते रविवार की शाम ने उस ‘फेसबुक’ को हथियार डालने को मजबूर कर दिया जिसने ‘किसान एकता मोर्चा’ के ऑफीशियल ‘फेसबुक पेज’ और ‘इंस्टाग्राम एकाउंट’ को ‘स्पैम’ (अवांछनीय ई-मेल) का फ्लैग लगाकर डिलीट कर दिया था। भारत, यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के विभिन्न शहरों में किसान आंदोलन के पक्ष में हुए सामाजिक संगठनों...

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लेफ़्ट: चुनौतियाँ ही चुनौतियाँ..

बिहार के चुनाव में मिली लेफ्ट को शानदार सफलता और देश के स्तर पर उभरे किसान आंदोलन में लेफ़्ट का सीधा दख़ल क्या इस बात का सबूत है कि अब वे ‘संघ’ परिवार के हिन्दुवाद को चुनौती देने में कामयाब हों रहे हैं? क्या प० बंगाल के आगामी चुनावों में भाजपा को और केरल के...

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लेफ़्ट : बहुत कठिन है डगर पनघट की..

भारत की राजनीति में लेफ़्ट की पार्टियों को 100 साल पूरे हो रहे हैं। ब्रिटिश शासनकाल से लेकर आज़ाद भारत में लेफ़्ट एक लड़ाक़ू क़ौम के रूप में अपनी पहचान बनाते रहे हैं। फिर क्या वजह है कि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में दाखिल होने से पहले वे नेस्तनाबूद हो गए। जिस तरह से...

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कला और हंसिया की जुगलबंदी

–अनिल शुक्ल|| भारत सहित सारी दुनिया में चर्चित पंजाबी के नामचीन गायकों और संगीतकारों ने इन दिनों दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर डेरा जमा लिया है। वहां मौजूद लाखों किसानों की मुश्क़िलों से भरी ज़िंदगी के पक्ष में बने गीतों को वे सब गा रहे हैं। कला और हंसिया की ऐसी जुगलबंदी हमेशा भयावह इतिहास...

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लोकतान्त्रिक है ‘प्रेम’

-अनिल शुक्ल॥ ‘संविधान दिवस’ के दिन ‘प्रेम’ स्मरण इसलिए आवश्यक है क्योंकि प्रेम में भी लोकतंत्र का भाव है। इलाहबाद हाईकोर्ट ने ‘प्रेम’ को आधुनिक सन्दर्भों में परिभाषित किया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति पंकज नक़वी की खंड पीठ ने एक वयस्क हिन्दू लड़की और मुस्लिम लड़के के प्रेम और स्वेच्छा से विवाह किये...

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बंगाल चुनाव में केंद्र कटघरे में होगा : दीपांकर भट्टाचार्य..

हाल के बिहार चुनावों में देश के सामने भाकपा (माले) एक बड़े और सुदृढ़ राजनितिक समूह के रूप में उभर कर आया है। 19 में से 12 सीटें जीतने वाली इस पार्टी का ज़मीनी आधार कैसा था और कैसे उसने तुम्मनखां भाजपा-जेडीयू गठबंधन को धूल चटाई यह बिहार से बाहर बैठे लोगों को ताज्जुब में...

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मुंबई में क्यों न हुए सौमित्र ?

-अनिल शुक्ल॥ अपनी फिल्म रचना के संसार का उल्लेख करते हुए सौमित्र चटर्जी के बारे में महान फ़िल्मकार सत्यजीत रे लिखते हैं “वह ‘अच्छा’ अभिनेता है या नहीं क्या पता, लेकिन वह इतना ‘बड़ा’ अभिनेता है कि मैं उसे अपनी फिल्मों में लेने से ख़ुद को रोक नहीं पाता हूँ । इतना ही नहीं, मेरी...

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