नरेन्द्र मोदी से बड़े गुनाहगार तो तरुण गोगोई है…

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क्या भारत में छुआछूत की जड़ें अब भी इतनी गहरीं हैं कि इंसान को अछूत बनाने के लिए कई शक्तियाँ मिलकर लगातार काम करती रहें? जी हाँ लगता तो यही है. कांग्रेस हो या सीपीआई, सीपीएम हो या समाजवादी पार्टी, या फिर एक दूसरे की धुर विरोधी जदयू हो या राजग सारे के सारे राजनीतिक दलों के पास पिछले बारह सालों से एक मात्र काम रह गया है गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजनैतिक तौर पर अछूत साबित करने के अथक प्रयास.

अपने मीडिया मैनेजमेंट और पत्रकारों से रिश्तों के चलते इन राजनैतिक दलों के दिग्गजों ने मीडिया को भी ऐसा अर्जुन बना दिया जिसका निशाना सिर्फ और सिर्फ नरेन्द्र मोदी ही रह गए हैं और इसी का नतीजा है कि मीडिया को दशक का सबसे बड़ा साम्प्रदायिक दंगा भी नजर नहीं आता तथा कथित मीडिया गुरु राजदीप सरदेसाई ट्विट कर देते हैं कि जब तक एक हज़ार हिंदू नहीं मार दिए जाते कोकराझार की साम्प्रदायिक हिंसा नहीं दिखाई जा सकती.

क्या सचमुच नरेन्द्र मोदी इतने बड़े अछूत हैं कि उनकी विचारधारा को अमान्य करने के नाम पर आसाम के दंगों में रिंग लीडर्स के हाथों हो रही बेहिसाब मौतों को दरकिनार कर दिया जाये और यदि कोई शाहिद सिद्दीकी नरेन्द्र मोदी का साक्षात्कार कर ले तो सपा से निकाल दिया जाये तथा कोई कांग्रेसी सांसद नरेन्द्र मोदी को सार्वजनिक मंच पर शेर कह दे तो उसे कांग्रेस कारण बताओ नोटिस जारी कर दे?

क्या यह उचित है कि नरेन्द्र मोदी को अछूत घोषित करने में कोई कोर कसर ना छोड़ी जाये? क्या यह मान लिया जाये कि अब इस देश में नरेन्द्र मोदी होना एक अपराध है? नरेन्द्र मोदी  होने या उनकी विचारधारा समर्थकों को फासिज्मवाद की निशानी मान लिया जाये और कथित सेक्युलरवाद की तलवार चलाकर एक सम्पूर्ण संस्कृति को तहस नहस कर दिया जाये? क्या इस तरह की घटिया राजनीति कर कभी लोकप्रिय और विश्वसनीय सरकार बनाई जा सकेगी इस देश में?

भारत का बहुसंख्यक समाज कट्टर पंथी नहीं है बल्कि उसे बचपन से ही सबके साथ मिलजुल कर रहने और कमजोरों के साथ दया भाव की घुट्टी पिलाई जाती है. इसीके साथ उसे धर्मभीरू भी बनाया जाता है. और इसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं नरेन्द्र मोदी. गुजरात में उनके तीनों कार्यकालों के दौरान हुए विकास ने किसी वर्ग विशेष का भेद नहीं रखा. देखा जाये तो गुजरात में उन्होंने एक लोकप्रिय सरकार का उदाहरण प्रस्तुत किया. उनके विकास कार्यों का कोई भी विरोध नहीं कर पाया. जब भी उन्हें अछूत घोषित करने का प्रयास हुआ तो एक ही मुद्दा था सबके पास, बारह साल पुराने गुजरात दंगे का भूत और कितने साल ढोया जायेगा इस भूत को?

यदि इस देश का मीडिया वास्तव में इस देश का भला चाहता है तो उसे सबसे पहले छुआछूत की राजनीति करने वालों का बहिष्कार करना होगा और इस्तीफ़ा ही मांगना है तो आसाम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से मांगिये कि सप्ताह भर लगातार हिंसा होती रही मगर वे दंगे रोकने में असफल रहे. मुकद्दमा चलाना है तो तरुण गोगोई पर चलाइए क्योंकि असम दंगे की कमांड रिंग लीडर्स के हाथ में थी. और ये सभी जानते हैं कि ये रिंग लीडर्स कौन हैं..

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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