आसाम के दंगों का जिम्मेदार कौन….

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इसे आसाम का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि कभी वह भीषण बाढ़ की चपेट में आता है और लाखों असमी नागरिक बेघरबार हो जाते हैं. बाढ़ पीड़ित दुबारा अपना आशियाना बसा पायें उससे पहले ही गुवाहाटी में एक लड़की के साथ कुछ लोग दरिंदों की तरह बर्ताव कर देश भर के पुरुषों की गर्दन शर्म से झूका देते हैं.  यह घटना भूली भी ना गई हो तभी आसाम साम्प्रदायिकता की आग में झुलस उठता है. जिसके चलते करीब दो लाख लोग बेघरबार हो जाते हैं और इस देश के राजनेता मामले की गम्भीरता को हल्का फुल्का लेने का प्रयास करते हैं. जबकि सभी जानते हैं कि आसाम दशकों से बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को लेकर स्वयं को असुरक्षित महसूस करता रहा है.

गत 19 जुलाई को दो अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र नेताओं पर हुए हमले के बाद से असम के बोड़ो क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) के कोकराझाड़ जिले में जो हिंसा शुरू हुई थी वह अब तक फैलकर पास के चिरांग और धुबड़ी जिलों में भी पहुंच चुकी है. अंतिम समाचार मिलने तक बिलासीपाड़ा सब-डिवीजन में पास के गांवों से लोगों का पलायन जारी है.

मंगलवार को दिन में कोकराझाड़ में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में बीटीसी के मुख्य कार्यकारी पार्षद हाग्रामा मोहिलारी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि उसने समय पर सुरक्षा बल मुहैया नहीं कराया, जिसके कारण हिंसा को काबू करने में देर हो रही है. मोहिलारी ने बीटीसी इलाके में सेना को तैनात करने का भी राज्य सरकार से अनुरोध किया. स्वायत्तशासी बीटीसी इलाके में कानून और व्यवस्था राज्य सरकार का दायित्व है.

आम तौर पर बीटीसी में क्या होता है, इससे बिल्कुल ही मतलब नहीं रखने वाले असम के बाकी हिस्सों में हिंसा की आंच तब महसूस हुई जब असम से बाहर जाने के एकमात्र मार्ग कोकराझाड़ जिले में फैले दंगों के कारण विभिन्न ट्रेनों को पश्चिम बंगाल और असम के विभिन्न स्टेशनों पर रोक लिया गया. बीटीसी इलाके में तनाव कोई एक दिन में नहीं फैला है. हालांकि ताजा हिंसा फैलने का फौरी कारण 19 जुलाई को मुस्लिम छात्र संघ के दो नेताओं पर हुआ जानलेवा हमला बताया जा रहा है, लेकिन बोड़ो और गैर-बोड़ो समुदायों के बीच तनाव पिछले कई महीनों से बन रहा था.

इस तनाव का कारण है बीटीसी में रहने वाले गैर-बोड़ो समुदायों का खुलकर बोड़ो समुदाय द्वारा की जाने वाली अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग के विरोध में आ जाना. गैर-बोड़ो समुदायों के दो संगठन मुख्य रूप से बोड़ोलैंड की मांग के विरुद्ध सक्रिय हैं. इनमें से एक है गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच और दूसरा है-अखिल बोड़ोलैंड मुस्लिम छात्र संघ. गैर-बोड़ो सुरक्षा मंच में भी मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के कार्यकर्ता ही सक्रिय हैं.

इन दोनों संगठनों की सक्रियता उन स्थानों पर अधिक है जहां बोड़ो आबादी अपेक्षाकृत रूप से कम है. लेकिन इससे एक तनाव तो बन ही रहा था जिसकी प्रतिक्रिया कोकराझाड़ जैसे बोड़ो बहुल इलाकों में हो रही थी. इन दोनों संगठनों की जो बात बोड़ो संगठनों को नागवार गुजर रही थी वह थी बीटीसी इलाके के जिन गांवों में बोड़ो समुदाय की आबादी आधी से कम है उन गांवों को बीटीसी से बाहर करने की मांग उठाना. अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग को विरोध तो खैर वे लोग कर ही रहे थे.

अपनी इस मांग के समर्थन में ये दोनों संगठन समय-समय पर प्रदर्शन और बंद का आह्वान करते रहे थे. 16 जुलाई को भी गैर-बोड़ो समुदायों ने गुवाहाटी में राजभवन के सामने प्रदर्शन कर प्रशासन का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया था. इधर बोड़ोलैंड की मांग का समर्थन करने वाले संगठन भी पिछले कुछ महीनों से सक्रिय होते हुए दिखाई दे रहे हैं. हाल ही में इन लोगों ने रेलगाड़ियों को रोककर यह बताने की कोशिश की थी कि बोड़ोलैंड राज्य की मांग उनलोगों ने अभी तक छोड़ी नहीं है.

बोड़ो समुदाय के दो चरमपंथी गुट – नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आफ बोड़ोलैंड (एनडीएफबी) वार्तापंथी और इसी संगठन का वार्ताविरोधी गुट – भी अलग बोड़ोलैंड राज्य की मांग रहे हैं. जबकि केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रवक्ता अब तक यही कहते आए हैं कि अलग राज्य बनाने का सवाल ही नहीं पैदा होता है.

आसाम के जनजातीय इलाकों में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया कि गैर-जनजातीय समुदाय खुले रूप से जनजातीय आबादी के विरुद्ध मुखर हो जाएं. इसकी शुरुआत हुई थी एक अन्य इलाके में, जहां राभा जनजाति अपने लिए स्वायत्तता की मांग कर रही है. वहां रहने वाले विभिन्न गैर-राभा समुदायों ने उनकी उक्त मांग के विरोध में आंदोलन छेड़ दिया. इस तरह वहां दो समुदायों के आमने-सामने आ खड़े होने की यह पहली घटना थी और इसके कारण वहां समय-समय पर हिंसा भी फैलती रही है.

बीटीसी इलाके में गैर-बोड़ो समुदायों के गुस्से के फटने का एक प्रमुख कारण शायद यह है कि वहां स्वायत्त शासन लागू होने के बाद से कानून और व्यवस्था की स्थिति पहले से बदतर हुई है. गैर-बोड़ो समुदाय अक्सर भेदभाव किए जाने और शिकायत करने पर पुलिस द्वारा पर्याप्त कार्रवाई नहीं किए जाने की शिकायत करते रहे हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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