सरकारी विज्ञापनों की लूट के चक्कर में जागरण अवैध रूप से छपता था बिहार में बारह जगह से…

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भारत में सबसे पहले अखबार स्वतंत्रता आंदोलन को विस्तार देने के लिए निकलने शुरू हुए थे. आज़ादी के बाद सरोकार से जुड़ी पत्रकारिता होने लगी. एक छोटी सी खबर बड़े बड़ों की चूलें हिला देने के लिए काफी हुआ करती थी. अकबर इलाहाबादी तो कहते थे कि “खीचों न कमानों को, न तलवार निकालो… जब तोप मुकाबिल हो तो, अखबार निकालो..” मगर बाजारवाद ने विज्ञापनवाद का ऐसा चक्कर चलाया कि बड़े बड़े अखबार सरोकारों को टाटा बाय बाय कर ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन बटोरने की फ़िराक में लग गये. सरकारों ने भी अख़बारों का मुंह विज्ञापनों से भर अपने खिलाफ लिखने वाले कलमकारों के मालिकानों को खरीदना शुरू कर दिया. इस विज्ञापन रुपी खून का स्वाद ऐसा लगा इन अखबार मालिकों के मुंह कि उन्होंने अपने पुरखों तक का इमान बेच डाला और बेईमान हो गए. ताज़ा मामला है देश का नम्बर एक अखबार होने का दावा करने वाले अखबार जागरण का. पढ़िए जागरण इस बेईमानी में कौन से नम्बर पर हैं.

 

देश का नम्‍बर वन बताने वाला अखबार फर्जीवाड़ा करके करोड़ों रुपये का सरकारी विज्ञापन डकार चुका है. इस बात का खुलासा एक आरटीआई के माध्‍यम से हुआ है. यह अखबार भी हिंदुस्‍तान की तरह एक रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर पर कई यूनिट लांच करके नियम कानून की धज्जियां उड़ा चुका है. मुजफ्फरपुर में जागरण के पूर्व कर्मचारी रमन कुमार यादव द्वारा मांगी गई जानकारी के आधार पर आरएनआई ने स्‍पष्‍ट किया है कि जागरण ने सिर्फ पटना के लिए अखबार का रजिस्‍ट्रेशन कराया था. इसके अलावा अन्‍य यूनिटों के लिए उसका कोई रजिस्‍ट्रेशन नहीं है.

इस आरटीआई के आधार पर यह तय हो गया है कि दैनिक जागरण प्रबंधन गलत तरीके से अखबार का संचालन काफी समय से बिहार में कर रहा है. मुजफ्फरपुर, भागलपुर समेत कई यूनिट पटना के आरएनआई नम्‍बर पर संचालित किए जा रहे हैं जो प्रेस एण्ड रजिस्ट्रेशन आफ बुक्स एक्ट् -1867 की धाराएं 8(बी), 14/15 के अनुसार सही नहीं है. इसी मामले में हिंदुस्‍तान पर बिहार में मुकदमा भी दर्ज हुआ है. पुलिस जांच में इन आरोपों को प्रथम दृष्‍टया सही भी पाया गया है.

जागरण के फर्जीवाड़े का पोल तो इससे भी खुलता है कि अब तक जागरण मुजफ्फरपुर के प्रिंट लाइन में रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर BIHHIN/2000/3097 तथा ईमेल में [email protected] का प्रकाशन करता था, परन्‍तु 29 जून से रजिस्‍ट्रेशन नम्‍बर की जगह आवेदित, memo no- 101 dated 23/6/2012 कर दिया गया है, जिसका प्रकाशन अब भी किया जा रहा है. इसके अलावा पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर तथा सिलीगुडी से प्रकाशित और पटना से मुद्रित लिखा जाता था. परन्‍तु 29 जून से मुजफ्फरपुर में अखबार का प्रिंट लाइन चेंज हो गया है. ईमेल भी बदल कर [email protected] कर दिया गया है. साथ ही अखबार का मुद्रण एवं प्रकाशन भी मुजफ्फरपुर ही लिखा जा रहा है. पहले सभी विवाद पटना कोर्ट में सुलझाए जाने की बात लिखी जा रही थी, अब इसे मुजफ्फरपुर कर दिया गया है.

प्रिंट लाइन में चेंज करके जागरण ने खुद साबित कर दिया है कि वे पिछले बारह सालों से अखबार का पटना के अलावा अन्‍य यूनिटों से अवैध प्रकाशन कर रहा है. रमन कुमार के प्रयास ने इस कथित नम्‍बर एक अखबार का असली चेहरा लोगों के सामने ला दिया है. अगर संबंधित इकाइयां इस मामले की इमानदारी से जांच-पड़ताल करती हैं तो अरबों का विज्ञापन घालमेल और घोटाला सामने आ सकता है. रमन कुमार कहते हैं कि वे जागरण के इस फर्जीवाड़े को अंजाम तक पहुंचा कर रहेंगे. जागरण भले ही रजिस्‍ट्रेशन के लिए अभी आवेदन कर अपने बचने की कोशिश शुरू कर दी हो, पर उसे पिछले बारह सालों का हिसाब तो देना ही होगा.

रमण कुमार ने पिछले दिनों पीसीआई टीम के सामने भी पूरे मामले की पोल खोली है. इसके बाद से जागरण प्रबंधन बदहवास तथा परेशान है. रजिस्‍ट्रेशन आवेदित करने से साफ है कि दैनिक जागरण भी पूरे बिहार में गलत तरीके से सरकारी तथा गैर सरकारी विज्ञापन वसूल रहा था. एक ही एडिशन के लिए अलग अलग रेट पर अब तक करोड़ों रुपये के घोटाला किए जाने का अनुमान लगाया जाने लगा है. यानी हिंदुस्‍तान की तरह जागरण ने भी गलत तरीके से अखबार का अवैध केंद्रों से प्रकाशन कर करोड़ों रुपये के सरकार विज्ञापन की हेराफेरी की है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. जिअसपेय भरोसा था उअसपर से भरोसा उठ गया देअस का क्या होगा मुझ कोअ समझ मय नहिय अ रहा है क्या लिखु जोअ लोअग अपना जमिअर बेच दिया छड सुअख के लिय जोअ साथ जाने वाला नहिय है ? फिअर भी .लोअग समझ नही रहै हय अगर मय इअक बात लिखता हु किय पयसा साथ लेकर नहिय जा सकत्य फिअर भी लालच करतय है .किव की हम्कोअ ज्ञान नहिय है . लालच करो लेकिन जिअस्मय किअसी का नुअक शान न होअ देस के साथ गदारिय न होअ इअक राजा थेय वह शभीय राजा कोअ जिअत लिईय जब मरने का समय अ गया तो कहे सब खजाना हमारय हाथ पर रखोअ मय लेकर जाउगा मंत्री बोअले आपका सरीर नहिय जय गा खजाना कहा जयेगा तब उअन्कोअ ओह गलत किया जब समझ ने मय देर होअ गया पँछिय खेअत खा गया अप्सोअस करन्य से क्या फायदा पहलेय सोचोअ बाद मे . शोअचने से क्या ख़तम होगया सब इअस लिय अपनय बारे मय न सोचय दूसरों केय बारय मय सोचय जोअ दुआसरो के बारय मय सोचता है उसके बारय मय परमात्मा सोचत्य है .

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