रोमानियत के बादशाह राजेश खन्ना दुनियाँ छोड़ गए…

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सत्तर के दशक के सुपर स्‍टार राजेश खन्ना ने इस संसार से हमेशा के लिए विदा ले ली. राजेश खन्ना ने अपने बंगले आशीर्वाद में जिंदगी की अंतिम सांसें ली. लीलावती अस्पताल से आने के बाद राजेश खन्ना को  ड्रिप के जरिए दवाएं दी जा रही थी लेकिन उनका कोई असर नहीं हो रहा था. उनकी हालत इतनी नाज़ुक थी कि वे खाना भी नहीं खा रहे थे. आज सुबह से ही उनकी हालत बेहद खराब थी.

राजेश खन्‍ना को सोमवार को ही अस्‍पताल से छुट्टी मिली थी. दामाद अक्षय कुमार और बेटी ट्व‍िंकल उन्‍हें घर लेकर आए थे. उनका परिवार लगातार यही कहता रहा है कि उन्‍हें कमजोरी की शिकायत है, चिंता की कोई बात नहीं. लेकिन उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही है.  परिवार की ओर से कभी उनकी बीमारी के बारे में नहीं बताया गया.

29 दिसंबर 1942 को अमृतसर में जन्मे राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था. 1966 में उन्होंने पहली बार 24 साल की उम्र में आखिरी खत नामक फिल्म में काम किया था. इसके बाद राज, बहारों के सपने, औरत के रूप जैसी कई फिल्में उन्होंने की लेकिन उन्हें असली कामयाबी 1969 में आराधना से मिली. इसके बाद एक के बाद एक 14 सुपरहिट फिल्में देकर उन्होंने हिंदी फिल्मों के पहले सुपरस्टार का तमगा अपने नाम किया.

1971 में राजेश खन्ना ने कटी पतंग, आनन्द, आन मिलो सजना, महबूब की मेंहदी, हाथी मेरे साथी, अंदाज नामक फिल्मों से अपनी कामयाबी का परचम लहराये रखा. बाद के दिनों में दो रास्ते, दुश्मन, बावर्ची, मेरे जीवन साथी, जोरू का गुलाम, अनुराग, दाग, नमक हराम, हमशक्ल जैसी फिल्में भी कामयाब रहीं. 1980 के बाद राजेश खन्ना का दौर खत्म होने लगा. बाद में वे राजनीति में आये और 1991 में नई दिल्ली से कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा के लिए उन्होंने लालकृष्ण आडवानी के विरुद्ध चुनाव भी लड़ा मगर पराजित हो गए. 1994 में उन्होंने एक बार फिर खुदाई फिल्म से परदे पर वापसी की कोशिश की. आ अब लौट चलें, क्या दिल ने कहा, जाना, वफा जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया लेकिन इन फिल्मों को कोई खास सफलता नहीं मिली.

आनन्द फिल्म में उनके सशक्त अभिनय को एक उदाहरण का दर्जा हासिल है. एक लाइलाज बीमारी से पीडि़त व्यक्ति के किरदार को राजेश खन्ना ने एक जिंदादिल इंसान के रूप जीकर कालजयी बना दिया. राजेश को आनन्द में यादगार अभिनय के लिये वर्ष 1971 में लगातार दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड दिया गया. तीन साल बाद उन्हें आविष्कार फिल्म के लिए भी यह पुरस्कार प्रदान किया गया. साल 2005 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया था. वैसे तो राजेश खन्ना ने अनेक अभिनेत्रियों के साथ फिल्मों में काम किया, लेकिन शर्मिला टैगोर और मुमताज के साथ उनकी जोड़ी खासतौर पर लोकप्रिय हुई. उन्होंने शर्मिला के साथ आराधना, सफर, बदनाम, फरिश्ते, छोटी बहू, अमर प्रेम, राजा रानी और आविष्कार में जोड़ी बनाई, जबकि दो रास्ते, बंधन, सच्चा झूठा, दुश्मन, अपना देश, आपकी कसम, रोटी तथा प्रेम कहानी में मुमताज के साथ उनकी जोड़ी बहुत पसंद की गई.

संगीतकार आर. डी. बर्मन और गायक किशोर कुमार के साथ राजेश खन्ना की जुगलबंदी ने अनेक हिंदी फिल्मों को सुपरहिट संगीत दिया. इन तीनों गहरे दोस्तों ने करीब 30 फिल्मों में एक साथ काम किया. किशोर कुमार के अनेक गाने राजेश खन्ना पर ही फिल्माए गए और किशोर के स्वर राजेश खन्ना से पहचाने जाने लगे. राजेश खन्ना ने वर्ष 1973 में खुद से उम्र में काफी छोटी नवोदित अभिनेत्री डिम्पल कपाडि़या से विवाह किया और वे दो बेटियों ट्विंकल और रिंकी के माता-पिता बने.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “रोमानियत के बादशाह राजेश खन्ना दुनियाँ छोड़ गए…

  1. आम आदमी और हर संवेदनशील आदमी का सुपर स्टार आज पञ्च तत्व में विलीन हो गया।
    राजेश खन्ना अपनी सुपर स्टार फ़िल्में आनन्द, आराधना,रोटी, बावर्ची,हाथी मेरे साथी,नमक हराम जैसी अनेकों फिल्मो से एक बड़ी छाप छोड़ गये ।उनके चाहने वाले एक लम्बे समय तक उनकी कमी महसूस करेंगे और उनकी अच्छी फिल्मों को याद रखेंगे।उन्होंने बीमारी, मौत और गरीबी को फिल्म के माध्यम से सहज रूप में स्वीकार करना सिखाया।उनके सच्च से परिपूर्ण कुछ डायलोग:-
    जिन्दगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में हैं जहाँ पनाह !
    हम सब रंगमंच की कठपुतलिया हैं ..,जिनकी डोर ऊपर वाले के हाथ में हैं!
    कौन कब केसे उठेगा कोई नहीं बता सकता !
    “I HATE TEARS “कहने वाले “काका”दूसरों की आँखों में आंसू दे गए।।
    आर एम मित्तल
    मोहाली

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