भारत का सभ्य समाज और दर्शक मीडिया

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-प्रमोद रिसालिया||

पता नहीं क्यों यह घटना बार-बार सोचने पर मजबूर कर रही है कि एक या दो नहीं बल्कि पूरे 40 लोग एक साथ कुसंगति और कुविचार से कैसे प्रेरित हो सकते है। ऐसी क्या खराबी है हमारे लोकतंत्र में जो इस तरह के कुकृत्यों वाली प्रवृतियाँ समाज में इतनी तेजी से फैल रही है जैसे मानों किसी नए रिकार्ड को जन्म देना हो। किस समाज में हम लोग रह रहे है। उस समाज में, जिसमें 15-20 लोग सरेआम एक लड़की के कपड़े उतारते है और उसे बूरी तरह से नोचने की नाकाम कोशिश करते है। क्या हम इस समाज को सभ्य और विकसित समाज कह सकते है। क्या हमें हक है इसको सभ्य समाज कहने का। गुवाहाटी में हुए एक लड़की के साथ कुकृत्य ने समाज का कुसंस्कारी चेहरा हमारे सामने पेश किया है। ये कोई ऐसा पहला मामला नहीं जिसने सभ्य समाज को ठेस पहुंचाई हो। ना जाने कितनी ऐसी लड़कियां है जो हैवानियत की शिकार होती है कुछ को अखबार में जगह मिल जाती है और कुछ उन पन्नों कि तरह रह जाती है जिन पर लिखा तो बहूत कुछ होता है लेकिन पढ़ने वाले कोई नही। ये समाज में घटित होने वाली रोज की घटनाएं है। कहां रोक पा रही है लड़किया इस हैवानियत को और कहां रोक पा रहे है हम इन कुसंस्कारी लोगों के कुकृत्य को। क्या कसूर था गुवाहाटी की 11वीं में पढ़ने वाली लड़की का जिसे बीच बगाहै सड़क पर कुसंस्कारी लोगों ने नोचा, उसके कपड़े फाड़े, उसे बालों से पकड़ कर सड़क पर बेरहमी से खींचा, भीड़ इक्कठी होने पर जो जिसके मन में आया वो किया उस भीड़ ने। इन सब के बीच बहुत से ऐसे जागरूक लोग भी थे चाहते तो इस पूरे मामले को होने से पहले ही रोक सकते थे लेकिन नहीं अगर ऐसा करते तो शायद खबर नही बनती। क्या मीडिया सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए ही है। क्या मीडिया वालों के पास भी मानवता खत्म हो गई। जब यह कुकृत्य हो रहा था तो कैमरे में कैद करते उस रिपोर्टर का मानवता के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं बनता था। क्या वो सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है। क्या उस मीडिया की मानवता के प्रति सर्वोपरि ड्यूटी नहीं बनती। तो क्या अब मान लिया जाए कि हम उस मरे हुए समाज का हिस्सा है जो अपनी आंखों के सामने सब कुछ देख सकता है पर रोक नहीं सकता। लगता है हमारी मानसिकता कुसंस्कारी और पूरी तरह से विकृत हो गई। किसी ने भी विरोध नहीं किया। कोई भी बचाने वाला हाथ आगे नहीं आया। किसी की नजर शर्म से नही झुकी। वो सिर्फ उस मजबूर लड़की को हैवानियत की नजरों से देखते रहे।

इस देश में सब कुछ निर्धारित है तो फिर क्यों हम बदलें। सुरक्षा सिर्फ मर्दा के हाथ में है और कसूर सिर्फ औरतों का है। इस घिनौने कांड में भी उस लड़की को दोषी ठहराया जाएगा। लोगों के जितने मुहं है उतनी बातें करेंगे। उसके बारे में कहेंगे कि उसे घर से अकेला नहीं निकलना चाहिए था। उसे कपड़े अच्छे पहनने चाहिए थे। कोई ऐसा इशारा किया होगा जिससे ये पूरी घटना घटी अगेरा-बगेरा।
ऐसा भी कहा जा सकता है लड़की रात को पब से निकली थी। शरीफ घरों की लड़कियां यूं अकेले घर से नहीं निकलती। तो क्या रात को सिर्फ शरीफ घरों के लड़के ही निकल सकते है। वो रात को पब से निकली थी तो क्या दिन के उजाले में लड़कियां को बख्श दिया जाता है।
क्यों वो लड़की मातृसत्तात्मक समाज होते हुए भी असहाय है। फिर क्यों मर्दों के सामने गिड़गिड़ाती है छोड़ने के लिए, क्यों घर में मां-बहनों की याद दिलाती है। जिस देश में सत्ता औरतों के हाथ में है तब भी इतना भंयकर कुकृत्य होता है तो मर्दों के देश का हम हाल समझ सकते है क्या हाल होता है। यहां 6 साल की बच्ची से लेकर वृद्ध तक कोई सुरक्षित नहीं है। हर किसी बच्ची के साथ दुष्कर्म करने के और हैवानियत के शिकार की खबरें आती रहती है। फिर इस देश में, इस सभ्य समाज में सुरक्षित कौन है। वैसे भी अब रिश्तो की कदर नहीं रही तो सुरक्षा की कौन गांरटी लेता है। जब सगा सम्बंधी ही मर्यादा को पार लड़की पर बूरी नियत रखते है और मौका मिलने पर जाहिर भी कर देते है और अपनी हवसी नजरों से, शरीर को सहलाते गंदे और लिजलिजा स्पर्श से जता देते है कि लड़की होना पाप है। स्कूल, कॉलेज, रास्तों में, ऑफिस में, सिनेमाहाल में, ट्रेन, बस, टेम्पो, ओटो कहीं भी तो सुरक्षा की गारंटी नहीं देता ये समाज लड़कियों को। माँ बहन की गलियां तो सभी देते है तो इज्जत कौन करेगा नारियों की। लड़की रूप में ही जन्म लेना मुश्किल हो गया है। अगर लड़कियां जन्म ले भी लेती है तो उसका दिनों दिन बढ़ना चिंता का विषय हो जाता है। जब तक लड़कियों को भोग्या समझा जायेगा तब तक दयनीय स्थिति बनी रहेगी हमारे समाज में लड़कियों की।
क्या आज चालीस दुशासनों द्वारा द्रौपदी के चीर हरण को हस्तिनापुर ऐसे ही देखती रहेगी। कहाँ गयी हमारी संवेदना। धृतराष्ट और गांधारी बनना छोड़ना होगा की हमारा पिता, पति, बेटा ऐसा नहीं कर सकता। सिखाना होगा परिवार से ही, सिखाना होगा लड़कियों-औरतों का सम्मान करना, आदर करना तभी जा कर बदली जा सकती मानसिकता और तभी जा कर हम अपने समाज को सभ्य समाज कह सकते है। इस घटना पर हर भारतीय को लज्जित होना चाहिये और इसका कठोरतम से भी कठोर प्रतिकार होना चाहिए।
समाज को शर्मसार करने वाली घटना कहते समय मीडिया से रिपोर्टिंग करने वाले चेहरे शर्मसार होते नही दिख पा रहे हैं। न उनके पास भर्त्सना के कठोर शब्द हैं न इस लड़ाई में कूदने का अपना कोई तरीका। मीडिया के माध्यम से घटना की निंदा करने वालोँ की मुखमुद्रा भी करुण से रौद्र रस की ओर बढ़ती नही दिख रही है। इस बीच मनोरंजन जगत एवं सामाजिक सरोकरियो से कुछ बहुत ही मार्मिक, सार्थक, सापेक्ष एवं संवेदनशील टिप्पणियां अवश्य आई हैं जो हम सभी को आईना दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। राजनेताओं की बात करना ही बेकार है। सब अपनी प्रतिक्रिया देने में व्यस्त है। कार्रवाई की बात करते है पर होती कभी नहीं है। वैसे भी उनके पास समय कम ही होता है ऐसे मुद्दों के लिए उन्हें तो ओलंपिक में कौन सा खिलाड़ी पदक जीतेगा, किस पर सबसे ज्यादा पैसा लगाया जाए उससे ही फुर्सत नहीं है। जब संसद काल शुरू होगा तब इन पर बहस कर लेंगे। अब अच्छा यही होगा की जब यह पीडि़त लड़की बालिग हो जाय तो इसे महिला आयोग का सदस्या या अध्यक्षा बनाया दिया जाए ताकि ऐसी परिस्थिति में उसकी सीधी प्रतिक्रिया आ सके। हाल ही मैं ऐसे मुद्दों को लेकर आमिर खान ने सत्यमेव जयते के जरिए खूब प्रयास किया है। अब आमिर खान को समझना चाहिए ये समाज आपको दिन में 1 घंटा देख तो सकता है, आपकी हां में हां मिला सकता है। लेकिन सभ्य नहीं बन सकता।

 

(लेखक प्रमोद रिसालिया टीवी पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी कर अब टीवी पत्रकारिता में ही सक्रिय है। लेखन कला में विशेष रूचि न होते हुए भी कभी कभी अपने मन की इच्छा को लेख के माध्यम से उजागर कोशिश करते रहते है। पत्रकारिता की पढ़ाई के साथ-साथ ही पंजाब केसरी, हरि भूमि और भास्कर में भी कार्य कर चुके है।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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