जब राजा ही नपुंसक और असंवेदनशील हो तो प्रजा कैसी होगी?

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नारी सम्मान की रक्षा को लेकर मीडिया दरबार ने अपने पाठकों से उनके विचार मांगे हैं, जिन्हें श्रंखलाबध्द रूप से बहस श्रेणी में प्रकाशित किया जा रहा है. इसी के तहत फेसबुक से सुमित कुमार ने अपने विचार भेजें है. जिन्हें जस का तस नीचे प्रकाशित किया जा रहा है. यह लेखक के अपने निजी विचार हैं तथा मीडिया दरबार इनके विरोधाभासों का कत्तई जिम्मेवार नहीं है.

फेसबुक से सुमित कुमार लिखते हैं….

पिछले  दिनों असम में एक बहन के साथ कुछ पुरुषों जो शायद पुरुषों के शक्ल में आदम खोर थे, ने घृणित एवं दंडनीय कृत्य किया है.

सरकार और पुलिस पर सवालिया निशान लगाने से पहले क्या हमे उन जन-दर्शको से सवाल नहीं पूछ लेना चाहिए जो तत्काल इस घटना को मूक दर्शक की भांति देख रहे थे. यद्यपि हो सकता की वो लड़की उस भरी जनता में से किसी की कोई आत्मीय संबंधी ना लगती हो परन्तु क्या इस देश में जहा के वेद हमे “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ” की शिक्षा देते है, जहाँ पर माँ को देवता से भी उपर का दर्जा प्राप्त है, जहाँ बहन की एक राखी के लिए उसका भाई अपनी जान तक दे देता है वहाँ के लोग आज इतने संवेदनहीन और स्वार्थी हो गए है.

लाज आ रही है मुझे खुद को पुरुष समाज का कहने में. वो पुरुष क्या जो लूटी जा रही अबला की लाज ना बचा सके? हो सकता है वो चार या दस की संख्या में उपद्रवी तत्व एक अकेले के लिए भारी पड सकते थे पर अगर संगठित हो विरोध किया गया होता तो आज ऐसा कुकृत्य नहीं हो पाता. खैर ये दोष जनता का नहीं है ये दोष है इस काल का महाभारत पुराण में लिखा है जैसा आचरण राजा करता है, जनता भी वैसी ही आचरण करती है. जब हमारा राजा ही नपुंसक और असंवेदनशील है तो प्रजा पर इसका बहुप्रभाव तो होना निश्चित ही है.

अब भी वक्त है अगर ऐसे अमर्यादित घटनाओ को रोकना है तो हमे प्रण लेना होगा किसी भी स्थिति में अपने सामने हो रहे ऐसे अत्याचार को हम रोक के रहेंगे शायद यही इस रक्षाबंधन अपनी बहिन को दिया गया सर्वश्रेष्ठ उपहार होगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “जब राजा ही नपुंसक और असंवेदनशील हो तो प्रजा कैसी होगी?

  1. But whenever and the criminals are badly beaten by mob it leads to small battle and media starts saying that lo for small incidence the group was beaten severely.Same media people remain busy in photography and do nothing to prevent such happenings.

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