हवस के भूखों के बीच घिरी नारी…

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-शकील अहमद||

हर जगह, हर तरफ, हर तरह से महिलाएं अत्याचार, बलात्कार, ज़्यादती, पिटाई, अश्लीलता, हत्या, ऑनर किलिंग, जैसे खौफनाक और दर्दनाक स्थितियों का सामना कर रही हैं. औरत होने की सज़ा तो उसे बचपन में ही मिलनी शुरू हो जाती है, लेकिन कभी-कभी लड़की पैदा होते ही मार भी दी जाती है. यानी पैदा होने के बाद अगर बच गई, तो फिर जीवन भर भारी मुसीबतों का सामना करना उसकी किस्मत बन जाता है.

लगातार समाचार-माध्यमों में आग लगाते समाचार साबित करते जा रहे हैं कि हमारा समाज महिलाओं के प्रति सीमाएं लांघता जा रहा है, असहिष्णुता की हदों को पार करता जा रहा है. आए दिन होनेवाले बलात्कार तो जैसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं. बलात्कार के बाद बेदर्दी से होनेवाली हत्याएं जैसे आम बात हो गई है. छोटी-छोटी नाबालिग बच्चियों को हवस का शिकार बनाने वाले दरिंदों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है. उम्र का कोई लिहाज़ नहीं रखा जा रहा है और बच्चियों, किशोरियों के साथ-साथ बुजुर्ग महिलाओं को भी अपनी हवस का शिकार बनाने वाले राक्षस समाज में नज़र आने लगे हैं.

महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अत्याचारों की दास्तान अत्याचार, बलात्कार, ज़्यादती, पिटाई, अश्लीलता, हत्या, ऑनर किलिंग तक ही सीमित नहीं है, यह उसके खुशहाल जीवन में भी घुस आती है. आए दिन आनेवाले फतवे और फरमान उसे घर की चहारदीवार में कैद करने की तैयारी में रहते हैं. धर्म और समाज के ठेकेदारों को कभी उसका जींस पहनना नहीं भाता, तो कभी मोबाइल पर बतियाना उसकी आंखों को नहीं सुहाता. कभी वे चाहते हैं कि वह घर से बाहर ही नहीं निकले, तो कभी चाहते हैं कि घर की सारी ज़िम्मेदारियों को निभाकर वह घर से बाहर भी निकले और पैसा भी कमाए, कभी वे चाहते हैं कि बुर्के में रहे तो कभी कहते हैं कि बाजार ही न जाए. कभी उसे पढ़ने से रोका जाता है, तो कभी बाहर निकलकर काम करने से, कभी वे चाहते हैं कि सिर्फ बच्चे पैदा करे और और बच्चों में भी प्राथमिकता लड़कों को, कभी वे चाहते हैं कि पति की दीवानी और दासी बनकर रहे और कभी दिलो-जान से चाहनेवाले प्रेमी को उसके साथ ही मौत के घाट उतार देते हैं.

पैदा होने से लेकर मरने तक के सफर में एक औरत को न जाने कब, कैसे और किसके द्वारा ज़ुल्म और अत्याचार का शिकार होना पड़े यह वह भी नहीं जानती! कभी मां-बाप पैदा होते ही गला घोंट देते हैं, कभी जवान होने से पहले या जवान होते ही बाप, चाचा, मामा, शिक्षक, ट्यूटर से लेकर अड़ोस-पड़ोस का कोई भी पुरुष उसे अपनी वासना का शिकार बना लेता है, कभी भाई उसकी हत्या कर देता है, क्योंकि वह किसी लड़के को शादी से पहले दिल देती है, कभी पति इसलिए मार देता है कि बदचलन है, तो कभी इसलिए कि लड़का पैदा नहीं कर रही है और कभी इसलिए कि घर ठीक से नहीं संभाल रही है.

घरों, स्कूलों, कॉलेजों, अनाथालयों, होस्टलों, दफ्तरों, खेतों, खलिहानों, ससुरालों, सड़कों, गली-चौराहों, मैदानों, खेलों, फिल्मों, पबों, होटलों में बच्चियां, लड़कियां, किशोरियां, महिलाएं, विधवाएं सभी किसी न किसी तरह के अत्यारों और ज़ुल्मों को झेल रही हैं. आज जब सारी दुनिया इतनी आधुनिक हो गई है तब फिर क्यों दुनिया के किसी भी कोने में महिलाओं के कपड़ों पर फब्तियां कसी जाती हैं? फिर क्यों उन्हें ऐसे कपड़े पहनने के लिए कहा जाता है जिससे उनकी इज़्ज़त-आबरू पर हमला न हो और वे हिफाज़त से ज़िंदगी जी सकें?

इनमें सऊदी अरब, पाकिस्तान जैसे देश तो शामिल हैं ही चीन, कनाडा, अमेरिका जैसे देश भी पीछे नहीं हैं.

क्यों ऐसी प्रणाली, ऐसी सुरक्षा-व्यवस्था नहीं बनाई जा रही है जो औरतों को सचमुच सुरक्षित रख सके और खुले आसमान के नीचे खुले दिल से सुकून की सांस लेने दे?

क्यों औरतों के प्रति समाज का नज़रिया नहीं बदल रहा है? क्यों उसे दोयम और निचले दर्जे का माना जा रहा है? और क्यों उसे भोग की वस्तु बनाकर भोगा जा रहा है, इस्तेमाल किया जा रहा है?

इन सवालों का जवाब केवल समाज दे सकता है और एक ज़िम्मेदार प्रशासन समाज को उस दिशा में ले जा सकता है.

और अगर ऐसा नहीं होता है, तो हमें स्लट वॉक्स, बेशर्मी मोर्चा और इससे भी बड़ी किसी क्रांति के लिए तैयार रहना चाहिए, शायद उसके बाद ही समाज के औरतों के प्रति अत्याचारी रवैये में बदलाव आए!

(इन डॉट कॉम)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “हवस के भूखों के बीच घिरी नारी…

  1. without women we can’t imagine the world. if women are not respected then here is neither education nor educationists.womens are not the purpose of use but for learn from them.women are same as teacher as “lamp of the society”.if,lamp is not burn then how can be society lighted. in the same way the rights of the women are not given then how we can progress.Without women the society looks same as “the room without window”,”the books without house”,”the night without twinkling of stars”the country without the people” “the body without soul”,”the success without failure”.our mother is also women and we can’t define mother in the same way women can’t define. so,please come togeather and respect women,salute women ,motivate women,courage women,and learn from women. O GOD! thanks to you to give me the most precious thing in the world that is my mother and sister who is also a women .I learn daily every time from them that how’s the beautiful life and in this life a beautiful women———MOTHER, GRAND MOTHER,AUNTY, SISTER. O GOD ! again a lots of thanks to you.

  2. nari ke roop anek h , samaj ka astitvo nari se h vo ma h behn h beti h jivan sathi h premika h, ese b ghar h jaha aj b nari ka sthan ghar m sabse upar h, jaha unka samman n hota vaha sirf barbadi h hoti h, ek jamana vo b tha jab raja apne nam ke sath ma ka nam likhte the jese goutmi putar shatkarni.

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