शिव मामा को भांजी का पत्र

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-दिलीप सिकरवार||

शिव मामाजी प्रणाम। आप तो कुशल होंगे ही क्योंकि आप सूबे के मुखिया जो ठहरे। उस पर आपके उपर ईश्वर मेहरबान है सो अलग। लक्ष्मी जी का  अपार आशीर्वाद आप पर है ही। आप कम आय मे कैसे जिया जाता है शायद भूल गये होंगे। अब आपसे क्या कहूं? आपने हमारे जन्म लेने पर इतना उपहार दिया है कि हमें पूरी उमर याद रहेगा। आपने एक अच्छे मामा की तस्वीर पेश की है। वैसे इस देश मे तो कंस मामा की चर्चा अधिक होती है।  हालांकि आपने भी कुछ गरीबी नही देखी। एक जमीनी व्यक्ति किस तरह से जिंदा रहता है, आप जानते हैं। सुबह से लेकर रात के बीच गरीब को कैसे जिंदा रहना होता है, वह हंसी-ठिठोली का किस्सा नही है। हम भले ही एसी मे बैठकर उस पर प्लानिंग कर लें परन्तु होता वही है जो सेठ- साहूकार चाहते हैं। खैर हमे उससे आपत्ति नही है क्योंकि यह लोग भी आपको चुनाव मे सपोर्ट करते हैं।

सहयोग का बदला असहयोग नही हो सकता। न तो आपकी सेहत के लिये बेहतर है ना ही इंसानियत के लिये। इस लिहाज से जो हो रहा है, ठीक है। आप बुरा न मानें तो एक बात बताती हूं। वैसे भी यह बात मामा- भांजी के बीच की है। सो बुरा- भला मानने का सवाल कहां पैदा होता है। मामाजी, आपके जानने वाले कुछ लोग हम पर बुरी नजर रखते हैं। स्कूल से आते- जाते वक्त छेडते हैं। ताने मारते हैं। कई्र बार तो हद पार कर देते हैं। आपकी पुलिस है। शहर मे गश्त लगाते दिखती है। हां, शिकवे- शिकायत मे वो भरोसा नही करती। शायद इसलिये वो समझौते की राह खुद भी अपनाती है और ऐसा ही करने के लिये प्रेरित करती है। अब मामाजी आपसे क्या छिपाएं। पापाजी को तो हमारे जन्म लेने पर टेंशन हो गया था। बिटिया की शादी कैसे होगी? स्कूल का खर्चा कैसे वहन करेंगे? पहनने- ओढने का खर्चा भी कम नही है। आजकल तो हाफ कपडे खूब महंगे आते हैं। कई तरह के विचार पापा के मन मे कौध रहे थे। वो तो अच्छा हुआ कि आपने उनका टेंशन कुछ कम किया।

किन्तु मामाजी महंगाई का भी तो कुछ कीजिये। देखिये ना। खाने से ज्यादा खर्च किताबों का है। हम तो पढना कब का छोड देते। लेकिन आप बुरा ना मान जाओ इसलिये किताबों मे सिर खपा रहे हैं। घरवालों को उम्मीद है बिटिया अफसर बनेगी। वो लोग यह सच को स्वीकारते नहीं कि अफसर बिटिया बनने के पहले जरूरी है बिटिया कुपोषित नही रहे। आपने हमारा बहुत ख्याल रखा। कम से कम आपकी पहल पर हम पेट मे तो नही मारे जा रहे हैं। बाहरी दुनिया तो आपकी ही दिखाई हुई है।

एक टीस है मामाजी। दुनिया मे तो आप ले आए। किन्तु यहां जीने से आसान मरना लगता है। गनीमत है रेलगाडी से कटने पर कोई टैक्स नही लगता। वरना बहुत दिक्कत होती। अभी तो थोडा टेंशन होने पर घर के पास रेल की पटरी पर सोने का ख्याल आ जाता है। हां, टेंशन की बात हो रही है तो आपकों इसका कारण बता देते हैं। मामाजी, पापा को एक सौ रूपये मजदूरी मिलती है। घर तो छोटा है। परिवार बडा है। अब सौ रूपये मे खर्च कैसे मेंटेन होंगे? आप ही सुझाएं। राशन दुकान मे गेहंू भी महंगा कर दिया है। कांग्रेस के लोग आपको दोश देते हैं। वैसे मामाजी, रेडियो पर आप कह रहे थे कि गेहूं की उपज बंपर हुई है तो आप इसे बारिश मे क्यों सडा रहे हैं? अपने प्रदेश मे गरीबों की संख्या अभी जस की तस है। उसे नही ज्यादा तो पांच रूपये किलो के भाव से उन गरीबों को बांट देते तो दुआं और राजनैतिक लाभ का पुण्य कमा लेते। भई मैं आपसे उमर छोटी हंू।

मेरे किसी सुझाव को आप दिल पर मत लेना। मैं तो बस अपने विचार आपको बता रही थी। गेहूं को सडाने की बजाये सस्ता बेच देने की बात तो सबको जंची। उन्होंने ही कहा था, मामाजी को कहो। शायद धरतीपुत्रों को उनकी मेहनत का फल मिल जाये। अगर अनाज सडता है तो उससे किसी का भला नही हो सकता। श्राप मिलेगा सो अलग। बात भी सही है। बेचारे किसान पसीना बहाकर अनाज उगाते हैं। अनाज पेट मे जाये  तो अच्छा है। वैसे मामाजी आपने जो हमारे जन्म लेने पर उपहार का आश्वासन दिया, वह अद्वितीय है। इसके लिये आपको धन्यवाद।

आपकी भांजी

अपेक्षा

About Post Author

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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