ये सब राहुल को आगे लाने के नाटक हैं

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हाल ही केन्द्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के बयान पर बवाल हो गया। खुर्शीद को अनुमान नहीं था कि मामला बहुत बढ़ जाएगा, सो बयान से पलटे भी। यह कह कर कि मीडिया से रचनात्मक चर्चा करना बेकार है, क्योंकि वह अर्थ का अनर्थ कर देता है। वे भले ही बैक फुट पर आ गए हों, मगर एक बार फिर राहुल की कांग्रेस पार्टी में अहमियत और कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर अंतहीन बहस जरूर छिड़ गई। कदाचित यही सलमान का साइलेंट एजेंडा हो। उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। एक तो राहुल के प्रति अपनी वफादारी को स्थापित कर दिया, दूसरा कांग्रेस को मौजूदा किंकत्र्वविमूढ़ स्थिति से निकालने की जरूरत पर भी जोर दे दिया। और सीधे सीधे राहुल को जिम्मेदारी वहन करने का आह्वान कर दिया। उन सहित अनेक नेता अब इस फिराक में हैं कि किस प्रकार राहुल को फ्रंट फुट पर लाया जाए। खुर्शीद ने यह छेडख़ानी की भी इसलिए कि इस पर पार्टी में बहस शुरू हो जाए। इससे कम से कम ये तो पता लग जाएगा कि राहुल से किस किस को तकलीफ हो सकती है।
हालांकि अब भी पार्टी और सरकार के अनेक मसलों पर बिहाइंड द कर्टन राहुल ही नंबर दो की भूमिका अदा कर रहे हैं, मगर खुल कर सामने नहीं आ रहे। या तो उनमें इतना साहस नहीं कि खुर्शीद जैसे कांग्रेसी नेताओं की कामना पूरी कर सकें या फिर अभी और समय का इंतजार कर रहे हैं।

असल में खुर्शीद ने अपनी ओर से गलत कुछ नहीं कहा। यह बात दीगर है कि वह बयान गले पड़ गया। सच्चाई यही है कि अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी और प्रत्यक्ष रूप से मनमोहन सिंह का दूसरा कार्यकाल कांग्रेस के लिए बहुत ही निराशाजनक रहा है। चाहे भ्रष्टाचार के एकाधिक मामले उजागर होने का मामला हो या महंगाई पर काबू न पा सकने की विफलता, कांग्रेस सत्ता से विदाई के मुहाने पर खड़ी है। ऐसे में कांग्रेस को अब नए चेहरे की जरूरत महसूस हो रही है। कम से कम मनमोहन सिंह का चेहरा आगे रख कर तो कांग्रेस को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। रही बात प्रणब मुखर्जी की तो वे राष्ट्रपति की दौड़ में शामिल करके राजनीतिक बर्फ में लगा दिए जा रहे हैं। और जाहिर तौर वह अब तक सहेज कर रखे गए राहुल का चेहरा ही बाकी बचा है, और वे ही पार्टी की नियती हैं। सीधी सी बात है। एक बार प्रधानमंत्री पद पर न बैठ पाने के बाद सोनिया के लिए अब कोई चांस नहीं और परिवारवाद पर टिकी पार्टी के लिए राहुल के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मनमोहन सिंह कहने भर को प्रधानमंत्री जरूर हैं, मगर जाहिर तौर पर सारी ताकत का केन्द्र तो सोनिया गांधी ही हैं। अब या तो राहुल को प्रधानमंत्री पद पर आने की कवायद करनी होगी या फिर सोनिया की तरह ही रिमोट कंट्रोल पर हाथ रखने की भूमिका के लिए तैयार रहना होगा।
हालांकि राहुल ने उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में क्रीज से आगे आ कर खेलने की कोशिश की, मगर उसमें मिली परिस्थितिजन्य विफलता उनके आत्मविश्वास को तगड़ा झटका दे दिया। ऐसे में विपक्ष तो उनके अनाकर्षक चेहरे पर हमले कर ही रहा है, पार्टी के अंदर भी कसमसाहट हो रही है। हालांकि सभी कांग्रेसी आगे राहुल को झेलने की नियती को जानते हैं, मगर उसके लिए राहुल को ही आगे आना होगा। वे तो फिलहाल मांद में बैठ कर वक्त का इंतजार कर रहे हैं।
खुर्शीद के बयान में कहा गया है कि समकालीन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हमें एक नई विचारधारा की जरूरत है। ये विचारधारा-वारा कुछ नहीं है। पार्टी को नए चेहरे की दरकार है। विचारधारा तो वही पुरानी रहने वाली है। हां, अलबत्ता यदि राहुल के हाथों में सीधे कमान दी जाती है तो जाहिर तौर पर उनके साथ नई टीम होगी, उसे ही नई विचारधारा मान लीजिए। मगर उस विचारधारा को पुराने खूंसट कांग्रेसी नेता आसानी से स्वीकार कर लेंगे, इसमें पूरा संदेह है। यानि कि राहुल के आगे आने के साथ ही जहां पार्टी नई ऊर्जा के साथ बढऩे की उम्मीद कर सकती है, वहीं पार्टी में टूटन का खतरा भी मोल लेना ही होगा। वजह साफ है। राहुल के प्रति मानसिक और भावनात्मक रूप से आदर व लगाव रखने वाले नेता कम ही हैं।
हालांकि पिछले दिनों जब सोनिया गांधी बीमारी का इलाज करवाने विदेश गईं तो राहुल को चार दिग्गजों के कार्यवाहक ग्रुप का सदस्य बना कर यह संदेश दिया गया था कि उन पर निकट भविष्य में बड़ा बोझ डाला जा सकता है। उत्तरप्रदेश चुनाव के बहाने यह बोझ डाला भी गया, मगर वह प्रयोग विफल हो गया। तब से राहुल चुप हैं। ऐसे में मजबूरी में ही सही सोनिया को फिर पूरा काम संभालना पड़ रहा है। मगर यह कितने दिन चलेगा। आखिर तो राहुल को जिम्मेदारी लेनी ही होगी। खुर्शीद इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
जहां तक राहुल के व्यक्तित्व का सवाल है, प्रोजेक्ट भले ही यह किया जा रहा है कि राहुल युवाओं के आइकन के रूप में उभरेंगे, मगर सच ये है कि उनके व्यक्तित्व में राजीव और सोनिया की तरह की चमक और आकर्षण नहीं है। इसी कारण चर्चा उठती रही है कि कांग्रेस का बेड़ा पार करना है तो प्रियंका को आगे लाना होगा, जो कि कांग्रेस का तुरप का आखिरी पत्ता है, मगर सोनिया अभी इसके लिए तैयार नहीं हैं। उनकी रुचि राहुल में ही है। वे जानती हैं कि प्रारंभिक दौर में ही यदि प्रियंका को आगे कर दिया तो राहुल में जो भी संभावना मौजूद होगी, उसकी भ्रूण हत्या हो जाएगी।
कुल मिला कर सोनिया सहित पूरी कांग्रेस आगामी आम चुनाव व राहुल की भूमिका को लेकर भारी कशमकश में है। मौका तलाशा जा रहा है, कब और कैसे राहुल के कंधों पर भार डाला जाए। संभव है उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बना कर इसकी शुरुआत की जाए।
-तेजवानी गिरधर
7742067000
[email protected]

About Post Author

tejwanig

अजमेर निवासी लेखक तेजवानी गिरधर दैनिक भास्कर में सिटी चीफ सहित अनेक दैनिक समाचार पत्रों में संपादकीय प्रभारी व संपादक रहे हैं। राजस्थान श्रमजीवी पत्रकार संघ के प्रदेश सचिव व जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ राजस्थान के अजमेर जिला अध्यक्ष रह चुके हैं। अजमेर के इतिहास पर उनका एक ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। वर्तमान में अपना स्थानीय न्यूज वेब पोर्टल संचालित करने के अतिरिक्त नियमित ब्लॉग लेखन भी कर रहे हैं।
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