मीडिया दरबार के सहयोगी रहे लेखक ने मॉडरेटर पर लगाये फर्जी आरोप…

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सच पर गंदा और मैला फेंकने की कोशिशें अब कुछ पोर्टलों ने शुरू कर दी हैं। मामला है भड़ास4मीडिया के संपादक को फर्जी मामलों में जेल पहुँचाने के बाद उन्हें जेल में ज्यादा से ज्यादा दिन रखने की नापाक शुरूआतों का। इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक विनोद कापड़ी के इंटरव्‍यू को यू-ट्यूब से हटाने के बाद हुई मुकेश चौरसिया और मीडिया खबर डॉट कॉम की करतूत का  मीडिया दरबार डॉट कॉम ने जब राज फाश किया तो जवाब के तौर पर अब उसे लांछित करने की कवायद शुरू कर दी गयी है। अब इन्होने मीडिया दरबार के लेखक रहे धीरज भारद्वाज उर्फ़ धीरज श्रीवास्तव से मीडिया दरबार और उसकी पैतृक संस्था के खिलाफ बेबुनियाद आरोपों की झड़ी लगवा दी. जिसमें श्रीवास्तव होते हुए भी खुद को धीरज भारद्वाज के रूप में प्रस्तुत करने वाले इस व्यक्ति ने मीडिया दरबार के मालिक होने का फर्जी दावा तक कर दिया है इन कोशिशों का मकसद केवल मीडिया दरबार की निष्‍पक्षता पर दाग लगाने का घटिया प्रयास है और इस तरह यशवंत विरोधी दलाल मीडिया के संस्‍थान और वेब पोर्टल को मालामाल करने की साजिशें करना है। ऐसी ही करतूत आज कुछ पोर्टलों ने शुरू कर दीं। ताजा है मीडिया खबर नामक पोर्टल पर पोस्‍ट यह खबर। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे पोर्टलों का उद्देश्‍य केवल अफवाहें फैलाना ही है। आप भी पढिये और लानत भेजिए ऐसे पोर्टलों पर जिनके चलते ही समाचार संस्‍थानों की सच्‍ची खबरों की असल ख़बरों को अविश्वसनीय साबित करने की कोशिश में मनचाही गलत-सलत खबरों को प्रसारित कर पोर्टलों की विश्‍वसनीयता पर गहरा संकट खड़ा किया जा रहा है।

 

किसीने मुझसे पूछा, “क्या आपको इंडिया टीवी के संपादक विनोद कापड़ी से कोई निजी दुश्मनी है जो आप उनके खिलाफ़ अपने पोर्टल ‘मीडिया दरबार’ पर अभियान चला रहे हैं और अपने साथी पोर्टल ‘मीडिया खबर’ के संचालक पुष्कर पुष्प को दोषी ठहरा रहे हैं?” तो मैं आवाक रह गया।

मीडिया दरबार के मॉडरेटर के खर्च पर शिमला में सपरिवार मौज करते धीरज भारद्वाज जो कि वास्तव में धीरज श्रीवास्तव है…

मैंने उन्हें फ़ौरन जवाब दिया कि अगर विनोद कापड़ी और यशवंत के बीच मुझे किसी को चुनना होगा तो मैं बेशक यशवंत को चुनुंगा क्योंकि मैं कोई चोरी करके ‘ब्लैकमेल’ होने वाले की जगह ‘ब्लैकमेलर’ बनने वाले को ज्यादा पसंद करता हूं, लेकिन इसके लिए पुष्कर, अविनाश या संजय तिवारी जैसे सहयोगियों को दोषी ठहराने की मूर्खता मैं नहीं करूंगा, वो भी ऐसे वक्त पर जब हम सबको एक होने की और भी अधिक जरूरत है।

मीडिया दरबार के मॉडरेटर के खर्च पर शिमला में सपरिवार मौज करते धीरज भारद्वाज जो कि वास्तव में धीरज श्रीवास्तव है…

 

‘मीडिया दरबार’ एक ऐसा मंच था जिसे मैंने ही करीब साल भर की कड़ी मेहनत से खड़ा किया था। उसे मैंने राजस्थान के एक ‘बेस्ट वेब डिज़ाइनर’ नामक फर्म से बनवाया था। उस डिज़ाइनर ने बड़ी ही चतुराई से इसे अपने नाम से रजिस्टर करवा लिया और अचानक मेरा कंट्रोल पैनल डिलीट कर दिया। इतना ही नहीं, उसने न सिर्फ मेरे निजी फेसबुक और ई-मेल अकाउंट आदि हैक कर लिए बल्कि वेबसाइट प्रमोशन के लिए बनाए गए ‘रेया शर्मा’ जैसे कुछ अकाउंटों को भी हैक कर लिया। उसके कई अन्य अपराधों का भी मुझे पता है, जिनका ज़िक्र यहां करना उचित नहीं होगा।

उस डिज़ाइनर ने मेरे महीनों की मेहनत पर भी पानी फेरने की कोशिश की है और कई महीने पहले वेब के ज़रिए चलाए मेरे अभियानों के आलेखों पर से भी मेरा नाम हटा दिया है। इन दिनों वो डिज़ाइनर अखबारों से बलात्कार और सेक्स संबंधी अपराधों की ख़बरें कॉपी-पेस्ट कर पोर्टल को नया लुक देने की कोशिश में जुटा है। इन मामलों की शिक़ायत उचित ऑथारिटी को कर दी गई है और फिलहाल उनकी जांच चल रही है। उम्मीद है इंटरनेट कानूनों के तहत उसपर कार्रवाई भी की जाएगी, लेकिन तबतक वो पोर्टल शायद इस लायक न बचे कि उससे कोई सिद्धांतों वाला पत्रकार अपना नाम जोड़ने की हिम्मत करे।

हालांकि एक हिम्मती पत्रकार कुमार सौवीर को वह डिज़ाइनर अपने झांसे में लेने में कामयाब हो गया है, लेकिन शायद वो भी यूट्यूब अपलोड और पोर्टल की खबर में फर्क़ नहीं समझ पाए हैं। दिलचस्प बात यह है कि वो यूट्यूब लिंक दो दिनों से बिहार के वकील मदन तिवारी के ब्लॉग पर लगा था, लेकिन तब किसी का ध्यान उस पर नहीं गया। इतना ही नहीं, यूट्यूब वीडियो डिलीट होने पर हंगामा मचाने वाले इतने बड़े-बड़े इंटरनेट के महारथियों को उसे डाउनलोड कर सुरक्षित रखने की बात क्यों नहीं सूझी थी?

खैर, मुझे उस वीडियो की संवेदनशीलता का पता पुष्कर पुष्प के पोर्टल मीडिया खबर से ही लग गया था, जहां उनका पोस्ट अब भी मौज़ूद है। उस वीडियो के डिलीट होते ही मैंने उसे तभी दोबारा दरबारीलाल पर अपलोड कर दिया। ज़ाहिर तौर पर मैं विनोद कापड़ी के झूठ को बेनकाब करने के लिए दिल और दिमाग दोनों से काम कर रहा हूं।

बहरहाल, एक बार फिर साफ कर दूं कि मैं चोरों की तरह चेहरा छुपा कर जीने की बजाय ‘ब्लैकमेलर’ की तरह सीना तान कर जीने वालों की क़द्र करता हूं। यहां हरिवंश राय बच्चन की एक कविता का मुखड़ा जोड़ना चाहूंगा, “मैं हूं उनके साथ खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़…”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. ये तो छपरा का लाला (कायस्थ) हई न, ब्राहमण कब से हो गया ये धीरज श्रीवास्तव?

  2. फर्जी लोगों का फर्जीवाड़ा सामने आकर रहेगा. पोल पट्टी खुलेगी.कमेन्ट बॉक्स का ऑप्शन बंद करने से क्या होगा. अभी आकर माफ़ी मांगेगे. रहम की भीख मांगेंगे. ऐसे लोग सलाखों के पीछे जाएँ उस दिन का मैं भी बेसब्री से इन्तजार कर रहा हूँ. अभी मैंने पोर्टल पर कहानी पढ़ी. बड़ी घटिया कहानी बताई है. बहुत कमजोर स्क्रिप्ट है. अबतक मीडिया दरबार का जब भी नाम आया तो संपादक के तौर पर धीरज भरद्वाज का नाम ही सामने आया. लेकिन अचानक से कहानी में यू टर्न. जुम्मा – जुम्मा चार दिन आये हुए इस वेबसाईट को और ये चले हैं चार साल पुरानी साईट को पाठ पढाने. वक्त का इन्तजार करें. अक्ल ठिकाने आ जायेगी.

  3. मेरे इस कमेंट के बाद उस कथित मॉडरेटर ने अपने सारे पोस्ट से फेसबुक कमेंट का ऑप्शन ही बंद कर दिया.. साफ है वो जवाब देने की स्थिति में नहीं है.. खैर, मुझे भरोसा है कि कानून जल्दी ही अपना काम करेगी और ऐसे क्रिमिनलों को सलाखों के पीछे पहुंचाएगी..

  4. हा हा हा.. आखिर ये 'मॉडरेटर' है कौन? क्या उसका कोई नाम नहीं है या वो सामने आने से डरता है? अगर मैं उस कथित मॉडरेटर के खर्चे पर शिमला गया भी था तो उस खर्चे/ मनी ट्रांसफर या तनख्वाह का कोई हिसाब भी तो देंगें? अभी कुछ दिनों पहले तक मेरा नाम आलेखों पर बतौर संपादक आ रहा था तब उस गुप्त मॉडरेटर को कोई चिंता नहीं हुई? मेरी और भी कुछ तस्वीरें हैं मेरे फेसबुक पर.. उन्हें भी छाप सकते हैं कथित मॉडरेटर साहब.. थोड़ा इंतज़ार कीजिए, पुलिस पहुंचती ही होगी.. अब अपने अपराध छिपाने के चक्कर में यशवंत का नाम मत ले लेना..

  5. 1959 में एक फिल्म आई थी "सट्टा बाज़ार" जिसमें एक गीत था "चांदी के चाँद टुकड़ो के लिए इमान को बेचा जाता है, मस्जिद में खुदा और मंदिर में भगवन को बेचा जाता है" यह गीत तो आज ज्यादा लागु होता है. पत्रकार के लिए पत्रकारिता ही खुदा या भगवान होता है उसे ही आज सरे आम बेचा जाता है. अभी तो गिरावट और आएगी क्यूंकि संस्कारो के पाठ में इन गंवारों को साम्प्रदायिकता की बू आती है.

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