अखिलेश के जन्मदिन पर यशवंत को जेल की सौगात

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-मदन तिवारी||

एक जुलाई को यूपी के युवा मुख्यमंत्री जिनके चेहरे पर हमेशा मुस्कुराहट तैरती रहती है उनका जन्मदिन था. जब से यूपी के सीएम बने हैं अखिलेश, उनके चेहरे पर मुस्कुराहट और चौडी हो गई है (हालांकि इतना मुस्कुराना भी स्वास्थ्य के लिए ठिक नही ) उधर यूपी चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी के चेहरे से मुस्कुराहट गायब. लगता है दोनो में मुस्कुराने की प्रतियोगिता हो रही है. दावे तो अखिलेश ने बडे बडे किए लेकिन नाम बडे और दर्शन छोटे वाली तर्ज पर दावे सिर्फ़ दिखावटी बनकर रह गए. यशवंत ने सपा के मंत्री शिवपाल यादव से एक विशेष पोर्टल जो यूपी चुनाव के लिए उन्होने बनाया था उसका उदघाटन भी कराया, उदघाटन समारोह मे यशवंत ने पत्रकारो से अपील की सपा का साथ देने की. यह वादा उन्होने कर डाला कि अगर सपा के राज में कभी भी पत्रकारो के साथ ज्यादती होगी तो वे उस मामले को उठायेंगें और न्याय दिलवायेंगें. आज यशवंत खुद न्याय मांग रहे हैं. यह उदाहरण है राजनीति में आई गिरावट का. यह माना जा रहा है कि टीवी चैनल इंडिया टीवी को प्रसन्न  करने के लिए अखिलेश के आदेश पर यशवंत सिंह के उपर मुकदमा किया गया है. यशवंत की गिरफ़्तारी के बाद सपा के राष्ट्रीय सचिव ने राजेश दीक्षित ने इस बाबत पूछे जाने पर पार्टी की ओर से इस बात का खंडन किया गया है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राजेश दीक्षित ने इस बारे में पूछे जाने पर कहा कि यह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को बदनाम करने की साजिश है. जब मुख्यमंत्री मीडिया का सम्मान करते हैं तो उनके लिए आनलाइन या आफलाइन मीडिया में कोई भेद नहीं होता है.

आनलाइन मीडिया में यह चर्चा भी हो रही है कि भड़ास4मीडिया के संचालक को जिस तरह से पुलिस ने नोएडा से गिरफ्तार किया है वह पूर्वनियोजित लगता है. ऐसा लगता है मानों इंडिया टीवी के संपादक के दबाव में प्रशासन ने यह कार्रवाई की है. इस बारे में पूछे जाने पर राजेश दीक्षित का कहना है यह सब मुख्यमंत्री अखिलेश को बदनाम करने के लिए कहा जा रहा है. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री खुद नये मीडिया के विकास के समर्थक हैं और उत्तर प्रदेश में आईटी को बढ़ावा देने के लिए ही उन्होंने छात्रों को मुफ्त लैपटॉप देने का वादा किया है. जाहिर है वे प्रदेश में आईटी और नये मीडिया के विकास का काम कर रहे हैं ऐसे में उनके ऊपर यह आरोप लगाना कि मुख्यमंत्री कार्यालय के इशारे पर किसी वेब पत्रकार को परेशान किया जा रहा है यह सही नहीं है.

पूरे मामले में प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाये जाने पर राजेश दीक्षित ने कहा कि किसी की शिकायत मिलने पर प्रशासन अपना काम नहीं करेगा तो क्या करेगा? पुलिस के पास अगर शिकायत आई है तो वह कार्रवाई करेगी ही. यशवंत सिंह की गिरफ्तारी के बाबत उल्टे सवाल करते हुए कहा कि अगर प्रशासन कार्रवाई न करे तो यही मीडिया कहता है कि प्रशासन शिकायत करने के बाद भी कार्रवाई नहीं करता है. अब मामला न्यायालय के अधीन है और न्यायालय के अधीन किसी मामले में प्रशासन को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं होता है.

राजेश दीक्षित बडे मासूम बनते हुए यह सब कह गए लेकिन उनका जवाब हीं अखिलेश की संलिप्ता तथा मामले मे उच्च स्तर की साजिश को साबित करता है. राजेश दीक्षित का यह कहना कि आन लाईन और आफ़ लाईन मीडिया मे भेद नही है, गलत है, अगर ऐसा है तो फ़िर यशवंत सिंह के द्वारा दी गई एफ़ आई आर क्यों नहीं दर्ज हुई ? यशवंत के उपर जो आरोप है उसमे कहीं भी इंडिया टीवी के प्रबंध निदेशक विनोद कापडी ने यह आरोप नही लगाया है कि जान का भय दिखाकर उनसे रंगदारी मांगी गई, अब राजेश दीक्षित अपने मालिक अखिलेश से पुछकर बताए कि धारा 386 के तहत मुकदमा कैसे दर्ज हुआ.

यूपी के राजपूत समाज ने बहुत दिनो तक सत्ता से बाहर रहने का बदला लेने के लिए आगे बढकर सपा की मदद की थी. आज राजपूत समाज के लिए भी यह चुनौती है कि वह अपने नेताओं से पुछे राजा  भैया कैबिनेट में यशवंत सिंह जेल में, यह क्या है. वैसे सपा का असली चेहरा वही है गुंडो की पार्टी वाला. जेल में बंद विधायक मुख्यमंत्री आवास पर आकर राष्ट्रपति के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के साथ लंच लेते हैं और अखिलेश कानून के राज की बात करते हैं. यशवंत सिंह को जेल की सौगात देते समय अखिलेश ने यह भी नही सोचा कि एक जुलाई उनका जन्मदिन है.

उधर इंडिया टीवी के प्रबंध संपादक विनोद कापड़ी का कहना है कि यशवंत सिंह उनको और उनकी पत्नी को पिछले कई महीनों से फोन करके और एसएमएस करके परेशान कर रहे थे. उन्होंने कहा कि उन्होंने पुलिस से जो शिकायत की है, वह परेशान होकर की है. उन्होंने कहा वे जो कर सकते थे, उन्होंने कर दिया है. उन्हें पुलिस में शिकायत करने का पूरा अधिकार है और उन्होंने वही किया है. विनोद कापड़ी का कहना है कि जो लोग तरह तरह के सच झूठ का प्रचार कर रहे हैं इसके बारे में वे कुछ कहें इससे बेहतर होगा कि जांच एजंसियों और न्यायालय को अपना काम करने दे, जो सच्चाई होगी सामने आ जाएगी.

विनोद कापडी के इस बयान से इतना तो साफ़ है कि यशवंत सिंह ने जान से मारने की धमकी देकर रंगदारी की मांग नही  की थी. इस सारे प्रकरण मे पुलिस तथा सपा सरकार से न्याय की उम्मीद बेकार है.

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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