एस.पी के बाद टेलीविजन, दिग्गजों का जमावड़ा

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(राजेश राय की रिपोर्ट)

ऐसा नज़ारा सभा – संगोष्ठियों में कम ही दिखाई पड़ता है जब टेलीविजन के सारे दिग्गज एक ही मंच पर आसीन हों और टेलीविजन न्यूज़ पर मंथन कर रहे हों. मौका एस.पी.सिंह स्मृति समारोह का था. मीडिया खबर डॉट कॉम द्वारा आयोजित समारोह और संगोष्ठी में आजतक के संस्थापक संपादक एस.पी.सिंह को याद करते हुए, टेलीविजन न्यूज़ इंडस्ट्री के विकास क्रम और ताजा हालात पर गंभीर चर्चा हुई. गौरतलब है कि 27 जून को सुरेन्द्र प्रताप सिंह (एस.पी.सिंह) की पुण्यतिथि थी. इसी मौके पर मीडिया खबर की तरफ से इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें परिचर्चा का विषय ‘एस.पी.के बाद टेलीविजन’ था.

एस.पी सिंह समारोह की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई. आजतक के पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर कमर वहीद नकवी, वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव, अल्फ़ा मीडिया के सीईओ शैलेश, आजतक के चैनल प्रमुख सुप्रिय प्रसाद, ज़ी न्यूज़ की अल्का सक्सेना, एबीपी न्यूज़ के दीपक चौरसिया और आईबीएन-7 के आशुतोष ने दीप प्रज्ज्वलित किया. दीप प्रज्ज्वलन के बाद देश के जाने – माने फायनेंशियल एक्सपर्ट कवि कुमार ने मीडिया खबर की तरफ से न्यूज़ चैनलों के अर्थशास्त्र और बाजार और विज्ञापन के बीच ख़बरों के अस्तित्व की बात की.

सबसे पहले वक्ता के रूप में अल्फ़ा मीडिया के शैलेश आये. उन्होंने कहा कि टेलीविजन स्वांत सुखाय का माध्यम नहीं है,वो बाजार और दर्शक से चलता है इसलिए टीआरपी जरुरी चीज है. विज्ञापन और स्पान्सर्ड प्रोग्राम दिखाने चाहिए लेकिन न्यूज को इसके चक्कर में रिप्लेस नहीं कर देना चाहिए और न ही इसे खबर की शक्ल में दिखाया जाना चाहिए. ये बात निर्मल बाबा के मामले में साफतौर पर दिखाई दी.एस पी होते तो वो भी विज्ञापन दिखाते, कैम्पेन करते लेकिन साथ में मुहिम भी चलाते, हमने दरअसल बहुत आसान रास्ता खोज लिया है.

उनके बाद आजतक के पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर और वरिष्ठ पत्रकार कमर वहीद नकवी आये. उन्होंने आते ही साफ़ तौर पर कहा कि अब टीवी का रिमोट कंट्रोल दर्शक के हाथ में है. अब रीडर का हस्तक्षेप बढ़ रहा है जो कि अच्छी बात भी है और बुरी बात भी. ऐसा इसलिए कि सारे रीडर नहीं जानते कि क्या होना चाहिए, सबों को समझ नहीं होती लेकिन कंटेंट वही डिसाइड करता है.

वहीं दूसरी तरफ वरिठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि टीवी विमर्श का माध्यम नहीं है. अगर लोग घटिया चीज देखना चाहते हैं तो वही दिखाया जाएगा यह नाटकीयता का माध्यम है, अगर खबर में नाटकीयता नहीं है तो नहीं चलेगा. उसके बाहर हम नहीं जा सकते. अब वह मनोरंजन और मुनाफा इन दो पाटों के बीच फंसकर रह गया है. मुझे नहीं पता कि एस पी होते तो इस बाजार से कैसे लड़ते लेकिन हां ये जरुर है कि वो बहुत ही व्यावहारिक पत्रकार थे.

ज़ी न्यूज़ की कंसल्टिंग एडिटर अल्का सक्सेना ने सवाल उठाते हुए कहा कि लोग जो ये बात कहते है कि टीवी पर दर्शकों का कब्जा है, वही तय करता है कि क्या देखा जाएगा. मेरा उनसे सीधा सवाल है कि क्या दर्शकों को कार्यक्रम दिखाने के पहले पूछा जाता है, उनसे कोई राय ली जाती है ? ये बात सही है कि टेलीविजन का तेजी से विकास हो रहा है, आर्थिक रुप से मजबूत हो रहा लेकिन कहीं ऐसा न हो कि टेलीविजन बहुत आगे निकल जाए और खबरें पीछे छूट जाए, हम छूट जाएं.

आईबीएन- 7 के आशुतोष ने अपने चिरपरिचित आक्रामक अंदाज में कहा कि मीडिया सेमिनार अक्सर स्यापा करने का मंच हो जाता है और हम बात करते हुए ग्लानि और कुंठा से भर जाते हैं जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. एक तो सबसे पहले हमें जो टेलीविजन का ग्रे एरिया है, उस पर भी बात करनी चाहिए, जो क्रिटिकल फैकल्टी है, उन्हें भी तबज्जों देनी चाहिए और फिर उनके संदर्भों को शामिल करते हुए सोच कायम करनी चाहिए. मुझे नहीं पता कि आज एस पी होते तो क्या करते लेकिन इतना जरुर जानता हूं कि पिछले दो-तीन सालों में टेलीविजन ने जो पत्रकारिता की है, एस पी उस पर गर्व जरुर करते.

एबीपी न्यूज़ के एडिटर (नेशनल एफेयर) दीपक चौरसिया ने कुछ हटकर बोलते हुए कहा कि अब पत्रकार का मतलब है- जो लिखता है, दिखता है औऱ बिकता है. एस पी के बाद से अब तक का टेलीविजन बहुत बदल गया है. लेकिन एक बात जरुर है कि जो काम टेलीविजन कर रहा है, ऐसा नहीं है कि वही काम अखबार नहीं कर रहे. वो सब कुछ कर रहा है. एस पी की खास बात थी कि वो अपने दर्शकों को एक निष्कर्ष तक ले जाते थे. जब सारे भगवान ने दूध पिया की खबर आयी तो एस पी ने बताया कि मोची के औजार ने भी पिया. वो सामाजिक संदर्भों को बेहतर समझते थे लेकिन अब हम ऐसा नहीं कर रहे.

सबसे अंत में ज़ी न्यूज़ के कंसल्टिंग एडिटर पुण्य प्रसून बाजेपयी बोले. उन्होंने कहा कि मैंने एस पी की बात हमेशा इसलिए मानी कि मुझे लगा कि ये मंत्री और नेता तो आते जाते रहेंगे, बदलते रहेंगे लेकिन एस पी तो पत्रकारिता में रहेंगे. हमने एक पत्रकार की बात मानी. मुझे एक बात खटकती है. वे टेलीविजन के आदमी नहीं थे, उन्हें सिर्फ टीवी तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए. वो दरअसल एक पत्रकार थे और जिस भी माध्यम में रहे, उसे एक खास एंगिल से देखने की बात करते थे. एस पी टीवी पत्रकारिता को, हिन्दी पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्तर पर देखना चाहते थे. लेकिन टेलीविजन सिमटता चला जा रहा है, सिकुड़ता चला जा रहा है.

संगोष्ठी का संचालन डॉ. वर्तिका नंदा ने किया. इस मौके पर न्यूज़24 के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम, इंडिया टुडे के कार्यकारी संपादक दिलीप मंडल, बीबीसी हिंदी.कॉम की सलमा जैदी, वरिष्ठ पत्रकार और लोकसभा टीवी के पूर्व कंसल्टिंग एडिटर अजयनाथ झा, न्यूज़ एक्सप्रेस के प्रमुख मुकेश कुमार, महुआ ग्रुप के न्यूज़ डायरेक्टर यशवंत राणा, छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन साहब, वेबदुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक, आजतक के सीनियर एंकर सुमित अवस्थी और अंजना कश्यप और इन.कॉम के एडिटर निमिष कुमार समेत कई हस्तियाँ, मीडियाकर्मी, पत्रकार और छात्र भारी संख्या में मौजूद थे. संगोष्ठी का आयोजन फिल्म सिटी, नोयडा में किया गया था.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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