छापों के बाद मौन कांग्रेस, भूरिया-कैलाश के रिश्तों की चर्चा?

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-मनोज सिंह राजपूत||

आयकर, प्रवर्तन निर्देशालय एवं सीबीआई का छापा मप्र भाजपा के दो दिग्गज नेताओं के यहां पड़ा है लेकिन शोक में कांग्रेस नेता दिखाई दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि इन छापों के बाद प्रदेश कांग्रेस पार्टी को सांप सूंघ गया है। कांग्रेस के एक दर्जन प्रवक्ताओं के मुंह सिल दिए गए हैं। इस छापे के बाद विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस की जो भूमिका रहना चाहिए वह दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे  रही। मप्र में विधानसभा चुनाव से सवा साल पहले केन्द्र के इशारे पर देश की तीन बड़ी एजेंसियों ने प्रदेश के भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा के नजदीकी लोगों पर शिकंजा कस दिया है। बुधवार को आयकर विभाग ने सीबीआई और प्रवर्तन निर्देशालय के अफसरों के साथ मिलकर मप्र के सबसे बड़े बिल्डर दिलीप सूर्यवंशी और सबसे बड़े खनिज व्यवसायी सुधीर शर्मा के 60 से अधिक ठिकानों पर छापे मारे हैं। छापे की कार्रवाई तीसरे दिन भी जारी है। छन-छन कर आ रही खबरों के अनुसार इन व्यवसायियों के परिसरों से 7 करोड़ से अधिक नगदी और 10 करोड़ से ज्यादा के जेवरात मिल चुके हैं।

मप्र में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री बनने से पहले इन व्यवसायियों के हैसियत बेहद सामान्य थी। आज ये अरबों की सम्पत्ति के मालिक हैं। तय है कि छापे की यह कार्रवाई केन्द्र के इशारे पर मप्र में भाजपा को कमजोर और कांग्रेस को मजबूत करने के मकसद से की गई होगी। लेकिन छापों के बाद यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि इन भाजपा नेताओं की कमाई में प्रदेश के कई कांग्रेसी नेता भी मलाई खाते रहे हैं। यही कारण है कि छोटी-छोटी बातों पर बयान जारी करने वाले कांग्रेस के बयानवीर छापों के बाद कम्बल ओढ़कर सो गए हैं।
मजेदार बात यह है कि इन छापों के बाद भाजपा के अंदर ही कुछ दिग्गज नेताओं ने पार्टी के इन नवोदय अरबपति नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। वरिष्ठ नेता मेघराज जैन, पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा व कैलाश जोशी ने सार्वजनिक बयान जारी कर इन छापों से पार्टी की छवि खराब होने पर चिंता जाहिर करते हुए ऐसे व्यवसायियों को संगठन से दूर रखने की सलाह दी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जापान दौरे पर हैं। उनकी अनुपस्थिति में प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा ने व्यवसायियों के पक्ष में मोर्चा खोलते हुए बयान दिया है कि राजनेताओं का व्यवसाय करना अपराध नहीं है। यानि कह सकते हैं कि इन छापों के बाद प्रदेश भाजपा के नेता दो खेमों में बंटे दिखाई दे रहे हैं।
अब प्रदेश कांग्रेस के बारे में जान लें, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और उनके पीए प्रवीण कक्कड़ के भाजपा नेताओं से संबंध अब छुपे नहीं हैं। भूरिया के गृह जिले झाबुआ में पहचान करना मुश्किल है कि कौन कांग्रेसी है और कौन भाजपाई। भाजपा से जुड़े खनिज व्यवसायी सुधीर शर्मा की झाबुआ की खदान से ही लगभग 2 करोड़ रुपए रोज की कमाई उजागर हुई है।
शर्मा ने यह खदान कैसे ली ?
इसकी कहानी कई बार मीडिया में छपी। कांग्रेस के सबसे सक्रिय प्रवक्ता रहे केके मिश्रा ने जब खनिज व्यवसायी सुधीर शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला तो उन्हें न केवल प्रवक्ता पद से हाथ धोना पड़ा, बल्कि कांग्रेस नेताओं ने ही उन पर कई मनगढ़ंत आरोप लगा दिये। छापों के बाद केके मिश्रा विजयी मुस्कान के साथ कहते हैं कि सत्य न झुक सकता है न पराजित हो सकता। मिश्रा का दावा है कि कांग्रेस के प्रवक्ता पद से हटने के बाद उन्होंने सुधीर शर्मा और उन से जुड़े कांग्रेस के नेताओं की काली कमाई के बारे में प्रमाणिक शिकायत सीबीआई और आयकर विभाग के साथ-साथ कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को भेजी थी। मिश्रा कहते हैं कि यह सारी कार्रवाई उनके द्वारा जुटाए गए प्रमाणों के आधार पर हुई है। केके मिश्रा के दावों में कितनी दम है, यह तो नहीं मालूम लेकिन भाजपा में भी यह माना जाता है कि पिछले विधानसभा सत्र के बाद उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को झाबुआ का प्रभारी मंत्री कांतिलाल भूरिया के कहने पर ही बनाया गया था। बताते हैं कि केके मिश्रा ने लगभग एक हजार पेज के दस्तावेज अपने 17 पेज के कवरिंग लेटर के साथ कांग्रेस हाईकमान को भेजें हैं जिसमें यह प्रमाणित होता है कि कांतिलाल भूरिया और कैलाश विजयवर्गीय के व्यवसायिक रिश्ते हैं। इनके साथ वे लोग भी जुड़े हैं जिन्हें मुख्यमंत्री के नजदीक माना जाता है। केके मिश्रा के इन दस्तावेजों को लेकर भोपाल से दिल्ली तक हल्ला मचा हुआ है। कांग्रेस में चर्चा है कि विधानसभा चुनाव से पहले यदि प्रदेश में पार्टी अध्यक्ष बदला जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। मप्र भाजपा के मीडिया प्रभारी विजेश लूनावत की बात में दम नजर आता है। लूनावत का कहना है कि भाजपा नेताओं के पड़ रहे छापों पर उन्हें आश्चार्य नहीं है। वे वर्ष 2003 को याद दिलाते हैं जब प्रदेश में दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री के रूप में 10 साल पूरे कर रहे थे और केन्द्र में भाजपा की सरकार थी तब चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह के नजदीकी कई व्यवसायियों पर आयकर विभाग ने शिकंजा कसा था। इनमें शराब व्यवसायी जगदीश अरोड़ा एवं इंदौर के व्यवसायी गुप्ता आदि शामिल थे। लूनावत कहते हैं कि छापे रूटीन प्रक्रिया नहीं, केन्द्र के इशारे पर हो रही कार्रवाई है। यहां बता दें कि आयकर, प्रवर्तन निर्देशालय, सीबीआई ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के अत्यंत नजदीकी लोगों को घेरे में लिया है। इनमें उनके सबसे विश्वस्त निजी सहायक हरीश सिंह के सगे बड़े भाई भरत सिंह, मुख्यमंत्री के बालसखा दिलीप सिंह सूर्यवंशी, भाजपा को आर्थिक मजबूती देने वाले आईपीएस अधिकारी उपेन्द्र जैन के भाई देवेन्द्र जैन, सुधीर शर्मा आदि शामिल हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “छापों के बाद मौन कांग्रेस, भूरिया-कैलाश के रिश्तों की चर्चा?

  1. hum log kewal coment hi de sakte hai paisa to be log legaye kamaaye un ki ho gayee hai naitikta ka certificat vo bhi uneh hi denge jo hooya hai apni. / apni yojana se horaha hai janta to tamashvin hai hum tamasha dekha hi rahe hai.

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