बॉस इज़ आलवेज़ राइट .. प्लीज़ डोंट फ़ाइट …

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-गिरीश मुकुल||

सरकारी गैर-सरकारी दफ़्तरों, संस्थानों के प्रोटोकाल में कौन ऊपर हो कौन नीचे ये तय करना आलमाईटी यानी सर्व-शक्तिवान  बॉस नाम के जीवट जीव का कर्म  है. इस कर्म पर किसी अन्य के

कैरीकैचर: भाई अजय झा

अधिकार को अधिकारिता से बाहर जाकर अतिचार का दोष देना अनुचित नहीं माना जा सकता. एक दफ़्तर का   बॉस   जो भी तय करता है वो उसके सर्वश्रेष्ठ चिंतन का परिणाम ही कहा जाना चाहिये.उसके किये पर अंगुली उठाना सर्वथा अनाधिकृत रूप से किये गये कार्य यानी “अनुशासनहीनता” को क़तई बर्दाश्त नहीं  करना चाहिये.
हमारे एक मित्र हैं गिलबिले  एक दिन बोले- बॉस सामान्य आदमी से भिन्न होता है ..!
हमने कहा -भई, आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ? प्रूव कीजिये ..
गिलबिले :- उनके कान देखते हैं.. हम आपकी आंखे देखतीं हैं.
हम:-“भैये तो फ़िर आंख ?”
गिलबिले:- आंख तो तिरछी करने के लिये होतीं हैं..सर्वशक्तिवान  बॉस
की वक्र-दृष्टि से स्वयम  बॉस  ही बचाते हैं.दूजा कोई नहीं. गिलबिले जी के ब्रह्म ज्ञान के हम दीवाने हो गए बताया तो उनने  बॉसों के बारे में बहुत कुछ पर हज़ूर यक़ीन मानिये खुलासा हम न कर पाएंगे बस इत्ती बात को सार्वजनिक करने की अनुमति हमको मिली थी सो कर दी. और आगे-पीछे की बात उनके रिटायर होने के बाद पेंशन केस निपटने के बाद खोल दूंगा वरना अब कोई दूसरे परसाई जी तो हैं नहीं जो  “भोला राम का जीव” की तर्ज़ पर गिलबिले जी का जीव लिखेंगे..

 एक मातहत अपने बास के मुंह देखे आचरण से क्षुब्द हो   बॉस   के  बॉस  यानी परबॉस के पास शिकायत लाया. परबॉस के साथ उसकी चर्चा  का संपादित अंश देखिये
मातहत:- सर, हमारे बॉस दोहरा व्यव्हार करते हैं..
परबॉस :- हमारे भी करते थे . कोई नई बात नहीं !
मातहत:- मान्यवर, भेद की दृष्टि की वज़ह से उत्पादन प्रभावित हो रहा है..!
परबॉस :- देश की जी.डी.पी. में हमारी कम्पनी के अवदान का परसेंटेज़ .0001 से भी कम है फ़िर आप काहे चिंता कर रहे हैं, शांति से काम कीजिये बॉस  इज़ आलवेज़ राइट .. प्लीज़ डोंट फ़ाइट …विद यौर बॉस. ही इस सहस्त्रबाहु अंडरस्टैण्ड मिस्टर.. कल्लू जी. डू यौर जाब ओ.के.
माथे पर तनाव लिये कल्लू जी वापस अपना सा मुंह लेकर कारखाने वापस लौटे तो बॉस ने मुस्कुरा कर उनका स्वागत किया यह पूछते हुए कि-“ब्रह्म-ज्ञान मिला कल्लू जी.”
 कल्लू जी की बीवी ने भी तो समझाया था माना नहीं मरदूद सोच रहा था उपर वाले कृपा करेंगें.. हुई क्या न .. होती भी कैसे “बॉस   इज़ आलवेज़ राइट ..!”
कल्लू भाई ने तत्क्षण जीने का तरीक़ा बदल दिया. बस फ़िर क्या था वो आनंद के सागर गोते लगाते हुए संस्थान का कामकाज सम्हाल रहे हैं.
कल्लू ने सहकर्मी महेश तिवारी के गुरुमंत्र को गांठ में बांध लिया कि- दुनिया के अधिकांश बॉस नामक जीव को व्यवस्था को चलाने दो तरह के के लोग चाहिये एक वो जो रुटीन के कामकाज निपटाएं..दूसरा वो प्रोटीन के कामकाज़ निपटाए.
रुटीन के काम वो जो संस्थान के लिये सेटअप के साथ ही तय कर दिये जाते हैं. प्रोटीन के कामकाज़ का अर्थ है.वो कार्य जो बॉस के वास्ते किये जाते हैं.  बॉस   को उससे ताज़गी और स्फ़ूर्ति हासिल होती है. अन्ना-टीम को क्या मालूम कि कि दुनिया भर की व्यवस्था चलाने के लिये कुपोषित बॉसों की नहीं सुपोषित बॉसों की ज़रूरत होती है. उनको कल्लू टाइप के मातहतों की ज़रूरत होती है जो प्रोटीन और अन्य सूक्ष्म-पोषक तत्व उपलब्ध कराते रहें.
लेखक मिसफिट ब्लॉग के करता धरता हैं.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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