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प्रणब पर बन सकती है आम सहमति…

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-प्रणय विक्रम सिंह||

सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन के रणनीतिकार यदि आम सहमति की कोशिश बनाने की पहल करते तो टकराव के हालात से बचा जा सकता था। अगर 1969 के राष्ट्रपति चुनाव को अपवाद मानें तो देश के सर्वोच्च पद का चुनाव कब आया, कब गया, पता ही नहीं चला। लेकिन इस बार 19 जुलाई को होने वाले चुनाव के पहले जो कुछ घट रहा है, उससे लगता है कि राष्ट्रपति चुनाव के खेल में कहीं केन्द्र सरकार पर कोई खतरा न जाये। यूपीए की तरफ  से घोषित उम्मीदवार प्रणव की योग्यता और ईमानदारी पर विपक्ष क्या कोई भी सवाल खड़े नहीं कर सकता? यह सही है कि प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति का प्रत्याशी घोषित करने के बाद प्रधानमंत्री ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज समेत कई बड़े भाजपा नेताओं से फोन पर बातचीत कर उनसे समर्थन मांगा था। मनमोहन के इस कदम के सकारात्मक नतीजे सामने आने लगे हैं। शनिवार को हुई भाजपा कोर ग्रुप की बैठक में प्रणब मुखर्जी के पक्ष में माहौल बनता नजर आया। लालकृष्ण आडवाणी समेत तमाम पार्टी नेताओं का यह मानना था कि जब नंबरों का गणित यूपीए के पक्ष में हो तो महज विरोध के लिए अपना उम्मीदवार खड़ा करने का कोई मतलब नहीं है।लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रत्याशी चयन के पहले विपक्ष से कोई बातचीत करने की आवश्यकता नहीं समझी गई।

सवाल यह है कि एनडीए यूपीए उम्मीदवार को समर्थन देने के बदले क्या चाहेगा। ऐसा लगता है कि एनडीए उप-राष्ट्रपति पद के लिए अपने उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने की कोशिश करें। एक तो उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए जो अंक गणित चाहिए, वह यूपीए के पक्ष में नहीं है दूसरी बात बिना पूर्ण बहुमत के हर जगह यूपीए अपना उम्मीदवार जिता सके,  यह राजनीति में संभव नहीं। राष्ट्रपति के लिए इस बार मुस्लिम वर्ग या किसी दलित महिला के नाम भी सुझाए गए थे। भारत में कुछ ऐसे संवैधानिक पद जिन पर कोई महिला निर्वाचित नहीं हुई है, उनमें उप राष्ट्रपति एक है। संभव है कि एनडीए नजमा हेफ्तुल्ला का नाम आगे बढ़ाए, वैसे कांग्रेस की ओर से मोहसिना किदवई भी योग्य उम्मीदवार हो सकती हैं। एक बात तय लगती है कि प्रणब मुखर्जी का अगला पता रायसीना हिल्स राष्ट्रपति भवन होगा, लेकिन यूपीए तृणमूल कांग्रेस का पता होगा कि नहीं इसको लेकर संशय है। बनते-बिगड़ते हालात के बीच ऐसा लगता है कि कांग्रेस भी किसी तरह ममता बैनर्जी की ब्लैकमेल राजनीति से तंग आ चुकी है। आर्थिक स्तर पर कई नीति, योजनाएं व विधेयक लटके पड़े हैं। इसलिए यूपीए से ममता को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। जहां तक मुलायम सिंह यादव का प्रश्न है, तो उनकी नजदीकी कई औद्यौगिक घरानों से जगजाहिर है।

आज देश की बिगड़ती आर्थिक व्यवस्था में संभव है समाजवादी पार्टी कई कारणों से यूपीए का दामन को मजबूती से थाम लें। उत्तर प्रदेश में नई सरकार बनी है, वहां भी खजाना खाली है। ऐसी स्थिति में मुलायम सिंह का पैंतरा यूपीए को मदद करने के बदले किसी मोटे पैकेज लेने की इच्छा से जुड़ा हो सकता है। सत्तारूढ़ गठबंधन की तरफ  से मुखर्जी का नाम सामने आते ही समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जिस सक्रियता से उनके समर्थन में आ खड़ी हुई है, उससे चुनाव के निर्विरोध होने के आसार बनने लगे हैं। दो दिन पहले सपा के अध्यक्ष मुलायम सिंह और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी की तरफ  से पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आगे बढ़ाने से चुनाव में मुकाबले की संभावना बनती नजर आ रही थी। कलाम का नाम उछलते ही वोटों के अंकगणित के खेल ने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक बार तो हलचल बढ़ा ही दी थी। यह बात दीगर है कि राष्ट्रपति को चुनने का अधिकार 776 सांसदों और 4, 120 विधायकों के पास है। राष्ट्रपति के चुनाव में इन 4, 896 लोगों के वोट का मूल्य 10, 98, 882 है। जीत के लिए 50 फीसद से एक ज्यादा यानी 5, 49, 442 वोट चाहिए। अलग करने के बाद यूपीए, सपा, बसपा और लेफ्ट मिलकर 53 फीसद वोट बनाते हैं। यानी प्रणब मुखर्जी की जीत स्पष्ट दिख रही है। एनडीए अगर उम्मीदवार उतारता है तो उसे हार की तैयारी के साथ ही ऐसा करना होगा। किंतु ममता अभी भी कलाम की उम्मीदवारी पर कायम है, जब कि वह जानती है कि कलाम साहब की साठ फीसदी समर्थन की शर्त ही उनकी प्रत्याशिता पर मोहर लगाएगी।

अपने दल से चेतावनी मिलने के बावजूद संगमा अभी भी लडने का हौसला बरकरार रखे है। नवीन पटनायक व जयललिता का समर्थन उन्हें प्राण वायु प्रदान कर रहा है। इन सबके बीच राजग की बैठक बेनतीजा समाप्त हो गयी है। राष्ट्रपति पद के संप्रग के उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी के विरूद्ध प्रत्याशी उतारने या नहीं उतारने को लेकर राजग में मतभेद कायम है और इस बारे में आज विपक्ष के इस गठबंधन की बैठक में किसी निर्णय पर नहीं पंहुचा जा सका। ऐसा नजर आ रहा है कि विपक्ष और विशेष रूप से भाजपा और उसके कुछ सहयोगी इस बात के लिए इच्छुक हैं कि यदि सत्तापक्ष उपराष्ट्रपति के लिए उनके प्रत्याशी के नाम पर सहमत हो जाए तो वे राष्ट्रपति के लिए प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर सकते हैं। कुल घटनाक्रम देख कर लगता है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए दोनो पक्ष से आम राय के रास्ते पर चलने की पहल करने से बचा जा रहा है। हालाकि इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव आम सहमति से हो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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