दरकती अर्थव्यवस्था और गिरती साख

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-प्रणय विक्रम सिंह||


प्रख्यात रेटिंग एजेंसी एस.एंड.पी ने भारत की गिरती अर्थव्यवस्था की अत्यंत निराशाजनक समीक्षा की है। रेटिंग एजेंसी ने आशंका व्यक्त करते हुए कहा है कि यदि भारत ने अर्थव्यवस्था सुधार के मद्देनजर शीघ्र ही परिणामदायक कदम नहीं उठाये तो वह अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग घटा देगी। ऐसा होने से विदेशी निवेश की स्थिति पर पडने वाले प्रभाव का अनुमान लगाया जा सकता है। रेटिंग घटने से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) और अन्य निवेशकों की तरफ से भारत में किए जाने वाले निवेश पर सीधा असर पड़ेगा। गौरतलब है कि बीते तीन महीनों में ही एफआईआई ने देश से एक लाख करोड़ रुपये खींच लिए हैं। एसएंडपी की रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास दर के सुस्त पड़ जाने और अर्थव्यवस्था के झटके सहने की क्षमता इस बात को तय करेगी कि भारत की रेटिंग बरकरार रहती है या इसमें गिरावट आती है। गौरतलब है भारत की क्रेडिट रेटिंग गिरने की आशंका के बीच सप्ताह के पहले कारोबारी दिन ही सेंसेक्स ने लाल निशान के साथ अपना कारोबार समेटा।

30 शेयरों वाला बीएसई इंडेक्स 50.86 अंक नीचे गिरकर 16668.01 पर बंद हुआ। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का संवेदी सूचकांक निफ्टी 14.25 अंक नीचे गिरकर 5054.10 पर बंद हुआ। गिरती अर्थव्यवस्था की पैमाइश करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिक(ब्राजील,रूस,भारत,चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों में भारत ऐसा पहला देश होगा जिसकी रेटिंग में गिरावट आ सकती है। रुपये की गिरती कीमत और बिगड़ते वैश्विक माहौल के बीच जीडीपी के खराब आंकड़े बहुत निराश करने वाले हैं। इससे तो यही जाहिर होता है कि संप्रग-2 का नेतृत्व कर रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह न तो सरकार को ठीक से चला पा रहे हैं और न ही अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला पा रहे हैं। यह स्थिति किसी के हित में नहीं न देश के और न ही सरकार के। इसलिए बेहतर यही होगा कि सरकार स्थिति की गंभीरता पर ठीक तरह से विचार करे और तात्कालिक उपायों तक सीमित रहने के बजाय दीर्घकालिक कदमों पर जोर दे।

देश के बिगड़ते आर्थिक हालात को सुधारने और बढ़ते राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए सरकारी खर्चो में कटौती का अभियान छेडने का जो फैसला लिया गया है वह हास्यास्पद है। पांच सितारा होटलों में सम्मेलन बैठकें न करने,विदेश यात्राएं कम करने जैसे फैसलों से क्या होगा? जब जरूरत व्यापक बदलावों और बड़े नीतिगत फैसलों की है तो सरकार छोटे-मोटे कदम उठा रही है। दरअसल सरकार को समझ नहीं आ रहा है कि वास्तव में किया क्या जाए? यदि सरकार सोच रही है कि इस तरह के कदमों से राजस्व घाटे को कम किया जा सकता है तो यह उसकी भूल है। सरकार खर्चे को कम करने के नाम पर कुछ वैसा ही खेल कर रही है जैसा महंगाई के मोर्चे पर उसने किया। अब यह भी प्रश्न उठने लगे हैं कि क्या देश 1990 वाली स्थिति में वापस लौट रहा है। इसका सटीक उत्तर दे पाना बहुत आसान नहीं,मजाक में कहा जा रहा है कि वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी सरकार के लिए दर्जी की भूमिका निभा रहे हैं और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के लिए जो भी कपड़े सिलते हैं वह उन पर फिट नहीं बैठते। आशय यही है कि नेतृत्व ठीक से नहीं हो रहा। यही बात घपलों-घोटालों को लेकर भी है।

कुल मिलाकर स्थिति निराशाजनक है और सरकार अपनी नाकामी का ठीकरा किसी और के सिर फोडना चाहती है।अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह नीति विषयक मामलों में निर्णयहीनता,सुशासन का अभाव और सरकार चला पाने की विफलता है। सरकार ग्रीस संकट का हौवा खड़ा कर रही है,जबकि खुद वह कोई निर्णय नहीं ले रही। वैश्विक संकट का बहाना ठीक नहीं। यदि सरकार रुपये की गिरती कीमत को नहीं थामती है तो स्थिति बहुत बिगड़ सकती है। हमें अपने उपभोग का ज्यादातर तेल बाहर से मंगाना पड़ता है,रक्षा उपकरणों के मामलों में भी विदेशी निर्भरता ज्यादा है,इसलिए आयात का खर्च बढ़ता जाएगा। यह व्यापार घाटा बढने और चालू खाते के भुगतान संकट के रूप में सामने आएगा। हमें नहीं भूलना चाहिए कि महंगाई अभी भी उच्च स्तर पर बनी हुई है,जिस कारण रिजर्व बैंक के तमाम प्रयास नाकाम हो रहे हैं और घरेलू मांग बढ़ाए नहीं बढ़ रही। जीडीपी दर में गिरावट से सरकार की आय कम होगी,जिससे राजकोष पर भार बढ़ेगा। साफ है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय,दोनों ही मोर्चो पर आने वाले समय में दबाव बढ़ता जाएगा।

विश्व बाजार में खराब होती विश्वसनीयता के कारण विदेशी निवेशक भी दूरी बना रहे हैं। ऐसे में सरकार इन्वेस्टमेंट ट्रैकिंग सिस्टम बनाने और विनिर्माण क्षेत्र में बड़े सुधार जैसी बातें कह रही है ताकि अच्छे संकेत दिए जा सकें,लेकिन यह काफी नहीं,क्योंकि यह समय कुछ करने का है,कहने का नहीं। पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि के बाद अब डीजल और एलपीजी के दामों में वृद्धि का माहौल बनाया जा रहा है,लेकिन हम भूल रहे हैं कि आम आदमी अब और अधिक बोझ उठा पाने में सक्षम नहीं। आम आदमी की जरूरत की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। सरकार को इस तरफ बिना किसी देरी के ध्यान देना होगा। हमारे पास पर्याप्त गेहूं का उत्पादन हुआ है,लेकिन समस्या यह है कि उसे रखने के लिए गोदाम नहीं हैं। यह किसकी विफलता है? योजना आयोग ने गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए एक और समिति बना दी है,लेकिन आम चीजों और खाद्यान्न वस्तुओं की बढ़ रही महंगाई पर वह मौन है। कुछ ऐसा ही हाल दूसरी चीजों का भी है। सरकार वैश्विक मंदी की बात कर रही है,लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि भारत कैसे बचेगा और आम आदमी के हितों की रक्षा कैसे होगी? सरकार में न तो नेतृत्व बचा है,न उसकी अच्छी नीयत है और न ही उसके पास दीर्घकालिक नीतियां हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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