आखिर कौन बनेगा भारत का राष्ट्रपति?

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-अजीत कुमार पाण्डेय||
राष्ट्रपति  के चुनाव में यूपीए की ओर से उम्मीदवारी की दौड़ में दो नाम महत्वपूर्ण रूप से सामने आ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी आखिर देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम व पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को राष्ट्रपति के नाम के लिए क्यों नहीं समर्थन कर रही है। इसके क्या मायने हो सकते हैं। ऐसा लगता है कि आगामी लोकसभा चुनाव में उसकी पार्टी को बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं है और न ही यूपीए गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में होगा। राष्ट्रपति का चुनाव इसी को टारगेट कर तकरीबन सभी दल अपने-अपने समीकरण बैठाने में लगे हैं।
वैसे प्रणब मुखर्जी ने स्वयं कमान संभाल ली है। यह तय मानिए कि प्रणब दा अपने मिशन में तकरीबन सफल होते जा रहे हैं क्योंकि सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव बातचीत के लिए न केवल राजी हो गये हैं अपितु उन्होंने यह ऐलान भी कर दिया है कि वह एनडीए के साथ किसी भी कीमत पर नहीं जायेंगे। इससे यह आसार प्रबल हो गये हैं कि कांग्रेस की डील मुलायम से लगभग पक्की हो चुकी है। फिलहाल प्रणब दा अपने मिशन फतेह में लगे हुए हैं। वैसे राजनीति का सौदेबाजी का खेल चालू हो गया है अब देखना है कि यह किस करवट बैठता है। उधर लेफ्ट पार्टियों के नेताओं ने भी कांग्रेस पार्टी के नेताओं से बैठकें शुरू कर दी हैं। इससे यह साबित हो रहा है कि एनडीए अपने मकशद में कामयाब हो जायेगी और प्रणब मुखर्जी को रायसीना के आलीशान बंगले में पहुंचाकर ही दम लेगी।
मालूम हो कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्षा व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव ने संयुक्त रूप से यह नाम सुझाकर न केवल यूपीए की मुखिया व कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी को सकते में डाल दिया बल्कि द्वय नेताओं यह साबित कर दिया कि कांग्रेस पार्टी के तारनहार वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के नाम पर उनकी सहमति नहीं है। इसके अतिरिक्त एक और संदेश देने का प्रयास किया गया कि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को वह लोग बतौर पीएम अब नहीं पसंद करते इसीलिए उन्होंने इनका नाम भी राष्ट्रपति पद के लिए समर्थन देने की बात कह डाली है। वैसे ममता और मुलायम का मिलन कांग्रेस के लिए खटक गया। इतना ही द्वय नेताओं द्वारा सुझाये गये तीनों नामों को कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने बृहस्पतिवार को एक प्रेस कांफ्रेंस कर यह जता दिया कि अपने सहयोगियों के नामों पर उनकी पार्टी की सहमति नहीं है। बहुत जोर देकर सख्त लहजे में एक और बात श्री द्विवेदी ने कही कि डॉ. मनमोहन सिंह 2014 तक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। अब ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी ने दबाव की राजनीति शुरू कर दी है। वैसे एक बात और हो सकती है कि ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ने आर्थिक पैकेज को और अधिक बढ़वाने के लिए यह दांव मिलकर खेला हो, इस पर भी कांग्रेस पार्टी में मंथन चल रहा है। क्योंकि ममता-मुलायम का इतिहास सौदेबाजी का रहा है। खासकर ममता बनर्जी ने तो यूपीए को समर्थन देने के नाम पर केवल और केवल सौदा ही किया है। इसलिए इसमें कोई दो राय नहीं कि दोनों नेताओं के बीच ऐसी कोई मंत्रणा हुई हो। वैसे राजनैतिक गलियारों से बात छनकर आ रही है कि ममता-मुलायम से सौदेबाजी के लिए सलमान खुर्शीद को लगाया गया है। ऐसे में अगले कुछ ही दिनों में एक बड़े आर्थिक पैकेज पर दोनों नेताओं की सहमति बन जाये। एक बात सूत्रों से पता चला है कि अगर कांगे्रस पार्टी ने ममता-मुलायम की शर्तों को मानने से इनकार किया तो अन्दर ही अन्दर ममता-मुलायम के उम्मीदवार पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम या पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ समर्थन करने की तैयारी कर चुकी है। इसका ताजा उदाहरण बता देना चाहता हूं कि कुछ दिनों पहले वरिष्ठ भाजपा नेता यशवंत सिंह ने समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव से मिले थे। इतना ही नहीं खबर यहां तक मिली है कि कांग्रेस पार्टी की पोल खोलने वाले सुब्रमणियम स्वामी की भी इस मसले पर मुलायम सिंह से बात हो चुकी है और मुलायम सिंह ने ममता बनर्जी को साथ लेने का वादा भी कर दिया है।
मैं एक और बात स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि यूपीए की गणित कमजोर नहीं है क्योंकि अगर ममता-मुलायम ने कोई ऐसा सियासी दांव खेला जिससे एनडीए समर्थन भी करे तो भी एनडीए के पास कई ऐसे विकल्प मौजूद हैं जिसकी बदौलत वह राष्ट्रपति पद का चुनाव अपने पसंदीदा उम्मीदवार को जिता सकती है। ममता-मुलायम के अलग सुर अलापने से यूपीए को एक लाख से अधिक वोट का नुकसान हो रहा है, लेकिन यूपीए इतना वोट जुटाने की स्थिति में है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यूपीए के पास अपनी मन पसंद को राष्ट्रपति बनाने में कोई खास दिक्कत नहीं आयेगी। यूपीए घटक सरकार में शामिल ममता बनर्जी और बाहर से समर्थन दे रहे मुलायम सिंह यादव 1.12 लाख वोट वैल्यू को घटा दिया जाये तो भी यूपीए के पास 4.13 लाख वोट वैल्यू बचते हैं।
यदि सर्वसम्मति से उम्मीदवार तय नहीं हो पाता है तब चुनाव की स्थिति निश्चित तौर उत्पन्न हो जायेगी और ऐसी परिस्थिति में अगर यूपीए के घटक दल टीएमसी और सपा एनडीए के आते हैं तो इन तीनों का मिलाकर कुल वोट वैल्यू 4.05 लाख वोट ही बनती है। बीजद और अन्नाद्रमुक ने पहले ही अपना उम्मीदवार पीए संगमा को घोषित कर चुके हैं फिर भी मान लेते हैं कि यह दोनों पार्टियां भी इनके साथ आ जाती हैं तो यह दोनों पार्टियां 66000 वोटों से कुछ ज्यादा राहत नहीं दे पायेंगी।
इन सब स्थितियों से निपटने के लिए यूपीए में राजनैतिक गठजोड़ और नये विकल्पों की तलाश हो चुकी है। खबर यहां तक मिली है कि बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती से कांग्रेस की डील तकरीबन फाइनल हो चुकी है। इतना ही नहीं लेफ्ट पार्टियों के नेताओं से भी एनडीए की बात अंतिम दौर में है। ममता और सपा के विरोधाभासी बयानों का फायदा उठाकर मायावती और लेफ्ट दलों के नेताओं ने एनडीए समर्थक प्रत्याशी को राष्ट्रपति बनाने का मन बना लिया है। आपको याद होगा कि लेफ्ट पार्टियां पहले ही प्रणब मुखर्जी की समर्थन कर चुकी हैं। ऐसे में एनडीए बहुत ज्यादा मुश्किल में नही है। ममता-मुलायम के वोट एक लाख से कुछ अधिक 1.12 लाख वोट वैल्यू है वहीं दूसरी तरफ बसपा और लेफ्ट पार्टियों का वोट भी तकरीबन एक लाख यानि 99995 वोट वैल्यू है। इस गणित से यह प्रतीत हो रहा है कि एनडीए डैमेज कंट्रोल कर लेगी या यूं कहें कि डैमेज कंट्रोल कर चुकी है।

कांग्रेस और सहयोगी दलों की स्थिति (यूपीए)
कांग्रेस        330485
टीएमसी         45925
डीएमके         21780
एनसीपी         23850
आरजेडी          10350
नेकां                5556
मुस्लिम लीग      4456
जेवीएम          3352
एआईएमआईएम      1774
बोडो पीपुल्स फ्रंट      2808
केरल कांग्रेस      2076
आरएलडी          6220
एलजेपी           881
टोटल वोट वैल्यू    4,59,483

भाजपा और सहयोगी दलों की स्थिति (एनडीए)
भाजपा        225301
जेडीयू         40737
शिअद         11564
शिवसेना          18495
जेएमएम          4584
एजीपी          3284
हजका           881
टोटल वोट वैल्यू    3,04,785

गैर यूपीए व एनडीए सहयोगी दल
सपा        66688
एआईडीएमके    36920
सीपीएम        36725
सीपीआई        11200
बीजद        29507
बसपा        45473
टीडीपी        19808
जेडीएस         6138
पीडीपी         1584
फारवर्ड ब्लॉक     3785
आरएसपी         2777
टीआरएस         3192
टोटल वोट वैल्यू    2,63,८२४
अजीत कुमार पाण्डेय, वरिष्ठ पत्रकार
लोकसत्य मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के लोकसत्य हिंदी दैनिक समाचार पत्र में समाचार संपादक है

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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5 thoughts on “आखिर कौन बनेगा भारत का राष्ट्रपति?

  1. आज के हिसाब से ए. पी. जी. कलाम के सिवा दूसरा कोई योग्य नहीं दिख रहा है।

  2. डॉ. कलाम राष्ट्रपति पद के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं…….

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