स्वर्ण लोन देने वाली या स्वर्ण हडपने वाली कम्पनियाँ…

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-मुकेश प्रधान के साथ रेया शर्मा||

क्या आप अपने स्वर्णाभूषणों के बदले किसी गोल्ड लोन प्रदाता कम्पनी से कर्ज लेने जा रहे हैं? यदि हाँ, तो सावधान! हो सकता है कि आप के यह स्वर्ण आभूषण फिर कभी आपको वापिस न मिल पायें.

देश भर में गोल्ड लोन लेने और देने वालों की संख्यां लगातार बढती जा रही है. लेकिन देखने वाली बात यह है क्या गोल्ड लोन लेने वाला वापिस अपना सोना हासिल कर पाता है? जी, नहीं. ज्यादातर गोल्ड लोन देने वाली कम्पनियां, साहूकारों की तर्ज़ पर सोना हडपने में जुटी हुई हैं. कई बार तो गोल्ड लोन देने वाली कम्पनियां ग्राहकों को नकली सोना तक थमा देती हैं.
स्वर्ण आभूषण उद्योग के जानकार सूत्र बताते हैं कि प्रचलित ब्रांडों की ज्वेलरी की हुबहू नक़ल कर आभूषण बना लेना अब कोई बड़ी बात नहीं रही है. किसी भी ब्रांडेड आभूषण निर्माता कम्पनी का कोई नया डिजाइन बाज़ार में आते ही उस डिजाइन की डाई बनकर बाज़ार में आ जाती है. जिसके चलते ब्रांडेड आभूषण की हुबहू नक़ल कुछ समय में ही बन जाती है. इसी कारण गोल्ड लोन देने वाली कम्पनियां असल जेवर की हुबहू नकल का जेवर वापिस कर पाती हैं. ग्राहक को पता भी नहीं चलता कि उसे असली सोने से बने जेवर की जगह नकली सोने का जेवर थमा दिया गया है. ग्राहक को जब पता चलता है तो ज्यादातर मामलों में देर हो चुकी होती है. क्योंकि ग्राहक के पास कोई सबूत नहीं होता है.
स्वर्णाभूषणों की जालसाजी करने में यह कम्पनियाँ इतनी चतुराई बरतती हैं कि कम्पनी के सभी कर्मचारी जल्द से जल्द एक स्थान से दुसरे स्थान पर स्थानांतरित होते रहतें हैं और एक शहर में किसी शाखा में काम कर चूका कर्मचारी दुबारा उस शहर में नहीं लगाया जाता.
जयपुर में सोढाला स्थित एक प्रसिध्द गोल्ड लोन देने वाली कम्पनी की शाखा में एक ग्राहक ने जब अपना क़र्ज़ चुका कर गहने वापिस लिए तो वह भी इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार हो गया. जब उसे पता चला कि उसे नकली जेवरात वापिस किये गए हैं तो उसने गोल्ड लोन देने वाली कम्पनी में जाकर शिकायत की मगर कंपनी के कर्मचारियों ने कोई जिम्मेवारी लेने से इंकार कर दिया तथा किसी पुराने कर्मचारी के माथे आरोप मढते हुए कहा कि उस कर्मचारी ने ऐसा किया हो सकता है और वह कर्मचारी अब कहाँ गया पता नहीं.
इसी तरह हरदा के खेड़ीपुरा निवासी शब्बीर पिता इस्माइल खान ने बताया कि गोल्ड लोन स्कीम के तहत वह एक प्रतिष्ठित बैंक में दो सोने की अंगूठी, एक जोड़ी कान के कुंडल और एक सोने का हार गिरवी रखने पहुंचा था. उसने बताया कि सुनार द्वारा इन जेवरों की जांच की गई. इसके बाद फार्म भरकर वजन व कीमत लिखकर दी गई और मैनेजर ने हिसाब-किताब कर कहा कि जेवरों की एवज में उन्हें 45 हजार रूपए का ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है। मैनेजर रितेश यादव ने उन्हें शाम को आने को कहा. शब्बीर के मुताबिक जब वह शाम को पहुंचा तो जेवर वापस करते हुए मैनेजर ने कहा कि हार नकली है. उन्होंने बताया कि इसके पूर्व भी यही जेवर रखकर उसने बैंक से 40 हजार रूपए का ऋण लिया था. याने कि बैंक मैनेजर ने अपने स्तर पर ही हुबहू नकली जेवर बनवा कर शब्बीर को थमा दिए. इसी तरह का एक प्रकरण देहरादून में भी सामने आ चुका है.
यही नहीं यह गोल्ड लोन देने वाली कम्पनियां कर्जा लेने वाले ग्राहक के जेवर बेच भी देती हैं. ऐसा ही एक मामला सामने आया  सीकर के गोविन्द सिंह का. गोविन्द सिंह ने अपने स्वर्णाभूषणों के बदले जयपुर के खातीपुरा स्थित एक नामी गिरामी गोल्ड लोन देने वाली कम्पनी से स्वर्णाभूषणों के बदले क़र्ज़ लिया और जब गोविन्द सिंह अपना क़र्ज़ चुकाने  गया तो उसे जवाब मिला कि क़र्ज़ की समयावधि समाप्त होने कारण उसके जेवरात बेच दिए गए हैं. बाद में यह मामला पुलिस तक पहुंचा.
गौरतलब है कि छोटी सी पूंजी से ही शुरू होने वाली ऐसी गोल्ड लोन प्रदाता कम्पनियां कुछ समय में ही हजारों करोड़ की कंपनी में तब्दील हो जाती हैं. महंगे फिल्म स्टार अख़बारों और टी वी चैनलों पर इनका विज्ञापन करते नज़र आते हैं.

इसी के साथ पाठकों को सलाह दी जाती है कि आप यदि स्वर्णाभूषणों के बदले क़र्ज़ ले रहें हो तो जेवरात कि जाँच करवाने के बाद जेवरातों को सीलबंद करवाएं तथा उसकी चपड़ी वाली सील पर सावधानी पूर्वक हस्ताक्षर करें जो कि आधे सील पर हों और आधे लिफाफे पर और जो हस्ताक्षर आपने सील पर किये हैं वैसे ही हस्ताक्षर एक पर्ची पर अलग से करें और उस हस्ताक्षर को हाथों हाथ कम्पनी के कर्मचारी से प्रमाणित भी करवा लें. इस हस्ताक्षरयुक्त पर्ची को अपने पास संभाल कर रखें.

मीडिया दरबार की टीम इस विषय पर लगातार काम कर रही है और शीघ्र ही इन कम्पनियों का पूरा आर्थिक इतिहास और वर्तमान अपने पाठकों के समक्ष रखेगी कि किस कम्पनी की शुरुआत कितनी पूँजी से हुई और आज उसकी क्या स्थिति है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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