एक्टिविज्म,जर्नलिज्म और कनखजूरे या फिर इन सबके नाम पर धब्बे…?

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-आवेश तिवारी

शाजिया इल्मी का नाम यूपी या फिर दिल्ली की पत्रकारिता में गैर-नामचीन है. चाहे स्टार न्यूज की एंकरिंग हो या फिर अपने घर के अखबार “सियासत जदीद ” की पत्रकारिता, शाजिया कोई बड़ा करिश्मा करके नहीं दिखा पायीं, लेकिन प्रधानमन्त्री कार्यालय द्वारा  मनमोहन सिंह की मैक्सिको और ब्राजील यात्रा में मीडिया दल की सदस्य के तौर पर उनका नामांकन खारिज किये जाने से वो अचानक सुर्ख़ियों  में आ गयी हैं .  शाजिया ने कम समय में शोहरत हासिल करने के लिए टीम अन्ना का दामन पकड़ा, लेकिन जब इस आंदोलन से भी उन्हें वो शोहरत नहीं मिली तो वो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आरिफ मोहम्मद खान के साले की बेटी के तौर पर दिल्ली के राजनैतिक गलियारों में होती हुई  पीएम कार्यालय में पहुँच गयी.| लेकिन यहाँ उनके परिवार का झगडा, उनकी काबिलियत और एक्टिविस्ट का लबादा ओढकर पत्रकारिता करने का दंभ उन्हें नुक्सान पहुंचा गया. शाजिया इस पूरे मामले को साजिश बताते हुए दैनिक छत्तीसगढ़ को कहती हैं कि कांग्रेस पार्टी के कई नेता जिनमे  सलमान खुर्शीद भी शामिल हैं, मेरे भाई एजाज के साथ मिलकर अखबार  पर कब्ज़ा ज़माना चाहते हैं, ऐसा वो लोग इसलिए कर रहे हैं क्योंकि मैं टीम अन्ना की सदस्य हूँ. शाजिया के  नामांकन का रद्द होना अन्ना और मनमोहन सिंह के बीच की तल्खियों से जोड़कर देखा जाना लाजिमी है. लेकिन ये भी सच है कि शाजिया के इस किस्से में पत्रकारिता और एक्टिविज्म की आड़ में हो रही धोखाधड़ी के साथ – साथ दिल्ली के राजनैतिक गलियारों से से लेकर रालेगन सिद्धि तक मौजूद उन चेहरों का सच भी उजागर होता है, जो कई तरह के मुखौटे लगाकर अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं.

इस  पूरे मामले से प्रधानमंत्री के साथ विदेश यात्राओं पर जाने वाले पत्रकारों के कुनबे की योग्यता पर भी सवाल खड़ा होता है. शाजिया कहती हैं कि ”मैं टीम अन्ना की सदस्य हूं लेकिन मैं टीम अन्ना की सदस्य के रूप नहीं जा रही बल्कि पत्रकार के रूप में जा रही थी. मैं आंदोलन से जुड़ी हूं, इसका मतलब यह नहीं कि मैं बतौर पत्रकार अपना कार्य नहीं कर सकती. दिल्ली के पत्रकार साथी बताते हैं कि अभी कुछ ही दिन पहले  शाजिया दिल्ली में अन्ना समर्थकों की एक बैठक में प्रधानमंत्री को पानी पी -पीकर गाली दे रही थी और अगले ही कुछ घंटों बाद मैंने उन्हें पीएमओ में चाय की चुस्कियों के साथ प्रधानमंत्री की विदेश नीति और खुद प्रधानमन्त्री  की तारीफ में कसीदे पढते पाया. शायद वो प्रधानमंत्री के साथ अपनी यात्रा सुनश्चित करने की कोशिश कर रही थी. गौरतलब है कि  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 16 जून से जी-20 सम्मेलन में भाग लेने मैक्सिको तथा द्विपक्षीय यात्रा पर ब्राजील जा रहे हैं. शाजिया वरिष्ठ पत्रकार पंकज पचौरी का उदाहरण देते हुए कहती है कि ये तो कुछ ऐसा है कि कि मनमोहन सिंह के पर्यकाल में पचौरी  उनके मीडिया सलहाकार रहें और सत्ता बदलते ही उनको प्रधानमंत्री के आस-पास भी फटकने नहीं दिया जाए.

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि  शाजिया ने अपने पारिवारिक अख़बार  “सियासत जदीद”  के  पत्रकार के रूप में यहाँ  जाने को लेकर   अपनी अर्जी दी थी, जिसका अनुमोदन उनके भाई इरशाद इल्मी ने किया था, जो अखबार के संपादक हैं. लेकिन उसके बाद उनके दुसरे भाई एजाज ने संपादक मंडल के अध्यक्ष के तौर पर विदेश मंत्रालय से उनका नाम हटा देने की सिफारिश कर डाली. एजाज ने लिखा कि शाजिया  अब पूरी तरह से एक एक्टिविस्ट है और वे न्यूज़पेपर को रिप्रजेंट नहीं करती. ऐसे में उनकी दावेदारी को रद्द किया जाना चाहिए. हालाँकि शाजिया ने भी अपने भाई को जवाब देते हुए कहा है कि वे न्यूज़पेपर के एडिटर नहीं  है और वे यह फैसला नहीं ले सकते हैं. शाजिया कहती है कि अखबार का आर एन आई नंबर मेरे भाई इरशाद इल्मी के नाम से हैं, मैं इस मामले में मानहानि का मुकदमा करुँगी. प्रधानमन्त्री की विदेश यात्रा से अपना नाम बाहर हो जाने पर खेद  जताते हुए शाजिया कहती है प्रधानमंत्री भी सरकार के पैसे से विदेश यात्रा करने जा रहे हैं और हम भी सरकारी पैसे से विदेश यात्रा करने जा रहे हैं, इसमें कोई किसी पर एहसान नहीं कर रहा था. लेकिन इन लोगों ने मेरे भाई एजाज के साथ मिलकर मेरा नाम हटवा कर मुझे अपमानित करने की कोशिश  की है. शाजिया से जब हम पूछते हैं कि आप प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में क्या राय रखती हैं तो वो साफ़ लहजे में कहती है “हम उनके बारे में कुछ नहीं कहेंगे,हमारी मांग सिर्फ लोकपाल है” लेकिन जब उनसे ये पूछा जाता है कि एक एक्टिविस्ट  जर्नलिस्ट कैसे हो सकता है? तो वो जवाब देने से कतराते हुए कहती हैं “मैंने हमेशा ईमानदार पत्रकारिता की है “. उधर जब टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविन्द केजरीवाल से इस पूरे मामले के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जानकारी न होने की बात कह कर किसी भी किस्म की टिपण्णी करने से इनकार कर दिया.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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6 thoughts on “एक्टिविज्म,जर्नलिज्म और कनखजूरे या फिर इन सबके नाम पर धब्बे…?

  1. सिर्फ देहली ही नहीं, हर राज्य की राजधानी में भटैती करने वाले पत्रकारों का गिरोह सक्रिय है. ये वास्तव में पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता और दलाली करते हैं. ये पत्रकार शुद्ध रूप से एक ऐसे गुलाम श्रेंणी के होते है जो राज्य की सत्ता बदलते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं. जैसे जंगली कुत्ते को जो रोटी डालता है, कुत्ता उसके पीछे दम हिलाकर कैसे चलने लगता है.
    संपादक- प्रिय पाठक, महू, जिला इंदौर.

  2. सिर्फ देहली ही नहीं, हर राज्य की राजधानी में भटैती करने वाले पत्रकारों का गिरोह सक्रिय है. ये वास्तव में पत्रकारिता के नाम पर चाटुकारिता और दलाली करते हैं. ये पत्रकार शुद्ध रूप से एक ऐसे गुलाम श्रेंणी के होते है जो राज्य की सत्ता बदलते ही गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं. जैसे जंगली कुत्ते को जो रोटी डालता है, कुत्ता उसके पीछे दम हिलाकर कैसे चलने लगता है.
    संपादक- प्रिय पाठक, महू, जिला इंदौर.

  3. आवेश तिवारी जी आपको इस लेख और जानकारी के लिया बधाई. कुछ हद तक यह जानकारी थी लेकिन आपने तोह पूरा कच्चा-चिटठा ही पेश कर दिया. आपके सवाल एकदम सही है. हमे भ्रष्ट नेता और दोगले पत्रकार दोनों ही नहीं चाहिए.

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