सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं… बुत हम को कहे काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

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सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहे काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है ..

अकबर इलाहाबादी ने जब अपनी मशहूर गज़ल, हंगामा है क्यूं बरपा… के इस शेर को लिखा होगा तो शुद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि जब ये हक़ीकत बन कर सामने आएगा तो मीडिया की मेहरबानी से ये एक राष्ट्रीय इवेंट बन जाएगा। ये एक भौगोलिक घटना थी जिसे देखने के लिए करोड़ों देशवासियों ने आज तड़के अपनी नींद की कुर्बानी दी।

दरअसल, सोमवार को पूरी दुनिया में ऐसा सूर्य ग्रहण लगा, जो वाकई कई मायनों में अनोख़ा था। चंद्रमा से साढ़े तीन गुना बड़े शुक्र ग्रह ने पृथ्वी और सूर्य के बीच चक्कर लगाया। शुक्र सूरज के ऊपर एक छोटे से काले धब्बे की तरह दिखाई दिया जो खिसकता-खिसकता एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ चला गया। इस ग्रहण को दुनिया भर में ‘वीनस ट्रांजिट’ कहा जाता है। भारत में ये शुक्र-ग्रहण करीब साढ़े 4 घंटे तक दिखा। ऐसा इस सदी में आखिरी बार हुआ।

शुक्र यानी वीनस को दुनिया भर में प्रेम का देवता माना जाता है। भारत में भी शुक्र इस घटना को देखने के लिए काफी उत्सुकता देखी गई। पूर्वी भारत के लोग इस घटना को सूरज उगने के साढ़े 5 घंटे तक देख सके जबकि पश्चिम भारत में ये नजारा सिर्फ 4 घंटे तक नजर आया।

भारत में इस नजारे के देखने का सबसे बेहतरीन समय सुबह 10 बजकर 3 मिनट के बाद रहा। इस समय शुक्र ग्रह सूर्य के आभामंडल से बाहर आ रहा था। वैसे सूरज पर शुक्र ग्रहण के इस नज़ारे में 4 संपर्क बिंदु थे।

1. जब शुक्र ग्रह सूर्य की बाहरी परिधि को स्पर्श किया।
2. इसके तुरंत बाद जब शुक्र ग्रह सूर्य की परिधि के किनारे एक छोटे निशान के रूप में देखा गया।
3. तीसरा संपर्क बिंदु कई घंटे बाद तब आया जब शुक्र ग्रह सूर्य की आंतरिक परिधि के दूसरे छोर पर पहुंच गया और
4.अंतिम बिंदु- जब सूर्य की परिधि को स्पर्श करते हुए ये घटना खत्म हुई।

आसमान में हुई इस अद्भुत खगोलीय घटना को लेकर खगोलशास्त्री भी बेहद उत्साहित दिखाई दिए। मीडिया ने बताया कि आज होने वाली ये ऐतिहासिक खगोलीय घटना 105 साल बाद ही होगी। इस तरह का अगला नजारा एक सदी बाद 11 दिसंबर 2117 में दिखाई देगा जबकि टेलीस्कोप की खोज के बाद अब तक इस घटना को सिर्फ सात बार ही देखा जा सका है। सन् 1631, 1639, 1761, 1769, 1874, 1882 और 2004 में भी ‘वीनस ट्रांजिट’ हो चुके हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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