हम भी आज के अर्जुन हैं… जो हमरे तरफ नज़र उठाएगा, उसी के आंख में तीर मार देंगे

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कहते हैं, “जल मे रह कर मगरमच्छ से बैर नहीं लेना चाहिए..” लेकिन मुकेशवा ने ले लिया। एक सूबे के मुखिया से उसी सूबे की राजधानी में बैठकर पंगा? अरे भाई मुख्यमंत्री पद की भी गरिमा होती है, उसका रुतबा होता है? मुकेशवा है कि मानने को तैयारे नहीं है? अब लो, सज़ा भुगतो।

पत्रकारिता क्या पढ़ ली, बड़े-बड़े बोल बोलने लग गए। आएं-बाएं-शाएं.. लेकिन हम भी सीएम हाउस में बैठते हैं। अपने-आप को बड़े से बड़ा पत्रकार कहने वाला शख्स भी हमारे यहां हाजिरी बजा कर खुद को ‘ऑबलाइज़्ड फील’ करता है। पूरी सरकार है अपने हाथ में। मीडिया वाले क्या हैं? कुत्तों सी औकात है इनकी.. वैसे तो खूब भौंकते हैं, लेकिन जिसके आगे विज्ञापन की रोटी फेंको, वही दौड़े-दौड़े दुम हिलाता चला आता है।

एक से एक नामी पत्रकार और मीडिया मालिक को हमने घंटो वेटिंग रुम में इंतज़ार करवाया है। मीडिया हाउस का मालिक केवल अख़बार या चैनल ही थोड़े चलाता है? बीसियों काम पड़ते हैं हमारे ऑफिस में। बिल्डर का लाइसेंस पास करवाने से लेकर खानों और सौदों की दलाली खाने तक। उसको एक घुड़की लगवाओ तो सब पत्रकार कहाने वालों को सेवा में जुटा देता है। सब दिन-रात जी-हुजूरी करने लग जाते हैं।

अभी पीछे मधु के टाइम देखा नहीं था? सब के सब नंगे हो गए थे.. हो क्या गए थे? वो तो हैं ही जन्मजात नंगे। कितनों को बेचारे ने खिलाया-पिलाया। यहां से लेके दिल्ली तक सबकी एक आवाज़ पर लाखों-लाख चंदा दे देता था। उपर से सब का खर्चा-पानी अलग से चलाता था, लेकिन जैसे ही बेचारा फंसा, सब नहा-धोकर पीछे पड़ गए। मानों वे तो दूध के धुले हों और हम पॉलिटिशियन गंदे। अरे भाई सीएम की कुर्सी पर था। चार पैसे कमाएगा नहीं तो बांटेगा कैसे?

अब मैं भी तो मीडिया की सेवा करने में ही जुटा था। दिल्ली के इतने बड़े पत्रकार का अखबार… यहां छोटे से शहर में चलवाने की कोशिश में था। ये बजाज को बीच में डाला। वो भी बेचारा अपना बिल्डिंग का काम छोड़ के जुटा है। पहले का क्रिमिनल बैकग्राउंड है तो थोड़ा-बहुत उसको बी फ़ायदा होगा। सीबीआई वाला सब पकड़ेगा तो वो खबर छपवाएगा उनके खिलाफ़.. “अखबार मालिक को सताए सीबीआई..”   लेकिन वो भी कोई अपना घर फूंक के तो अखबार के स्टाफ के घर वालों के लिए रोटी नहीं सेंकेगा न?

ये मुकेशवा… खुद को बड़का पत्रकार जनाता है। जब रिपोर्ट छाप के मन नहीं भरा तो आरटीआई लगा दिया। ई आरटीआई भी अलगे झमेला है। जो गड़बड़ी खुद किए हैं उसका जानकारी खुद ही दे दें…? ऐसा कहीं होता है क्या? हम सब जगह ख़बर मैनेज़ कर लिए तो अब वो कमीशन में जा रहा था। अरे बाबा, सबको कमीशने चाहिए?  हमसे मांगता न, हम भी तुरंते दे देते कमीशन।

खैर जो हुआ सो हुआ। अब मुकदमा डलवाइये दिए हैं। पुलिस वाला सब को साफ कह दिए हैं.. कोई पूछे तो बोलना, मीडिया वालों का आपसी लफड़ा है। चार-पांच भाड़े के टट्टू टाइप मीडिया वाले हैं ही। सब को सरकारी और प्राइवेट दुनो ऐड दिला देंगे.. फिर जो मन आए, करो। कोई नहीं पूछता…

लेकिन हम भी आज के अर्जुन हैं… जो हमरे तरफ नज़र उठाएगा, उसी के आंख में तीर मार देंगे। सब अभिए से समझ लो।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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