धधक रहा है हमारा देश भारत… पर छाई है ख़ामोशी है इंडिया में…

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इंडिया बंद है आज… सुना तो मैंने ये भी है कि भारत को भी बंद रखा गया है, इंडिया गरीब लोगों का अमीर देश और भारत अमीर लोगों का गरीब देश। देश बंद आज इंडिया ग्रुप के लोगों की तरफ से है जिस में राजनीतिज्ञ,उन के चमचों के तरफ से है, जिन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं है की पेट्रोल कितना बढ़ा उन्हें सिर्फ अच्छा मुद्दा मिला है राजनीति करने का… मेरी इन बातों से मुझे भी कांग्रेसी मत समझ लेना,मै भी पेट्रोल के रेट बढ़ने से दुखी हूँ,क्यूंकि मेरा बजट भी बिगाड़ दिया है, गुस्सा मुझे भी है…

पर क्या गाड़ियों के सीसे फोड़ के,आगजनी कर के,पुलिस थानों में आग लगा के,पथराव कर के हमे हल मिल जायेगा?

सीधे सीधे कहूँ तो इस से इंडिया को तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्यूंकि उस के पास पैसा है अथाह पैसा जिसे रखने उसे स्विस बैंक तक में जाना पड़ रहा है पर उस भारत को फर्क पड़ेगा जहाँ की आबादी का एक बड़ा हिस्सा रोज कमाता है रोज खाता है…

कुछ दिनों पहले ही जब सर्राफा व्यापारियों की लम्बी हड़ताल चली थी, तो सोने के कारीगरों को मकानों,सड़कों पे मजदूरी कर के अपनी ज़िन्दगी का बसर करना पड़ा, और ये तो सिर्फ एक उदाहरण है ऐसे न जाने कितनी ही केस हमारे चारों और फैले हैं जिस का हमे ही नुकसान होता है   क्या ये सही तरीका है विरोध जताने का?

एक छोटी सी घटना है…हमारे ही बीच की है और इसे पढ़ के न जाने सब को अपने आसपास घटी ऐसे ही कितनी घटना याद आ जाये…

एक शर्मा जी है मेरे जानने वाले, बिजली की कटोती की वजह से लोगों ने फैसला किया कि बिजली ऑफिस के बाहर धरना देंगे,लोग गये वहाँ,पर अचानक भीड़ से लोगों ने दफ्तर पर पथराव करना शुरू कर दिया,हुआ क्या ? वहाँ भगदड़ मच गयी कई लोग कुचले गये…कई बहुत बुरी तरह घायल हुए,बिजली विभाग के कर्मचारियों को भी चोट आई|

शाम को जब हॉस्पिटल लोगों का हाल जानने पंहुचा तो पता चला कि शर्मा जी का बेटा दफ्तर के अन्दर था उसे भी पत्थर लगा और सर में 5 टांके आये थे,मै वहाँ हाल चाल पूछने गया तो वो काफी भड़के हुए थे,और बला..बला..बला..पता नहीं क्या क्या बोले जा रहे थे…मैंने सिर्फ एक बात कही,”आप भी तो पत्थर मार रहे थे,क्या पता आप का फेंका पत्थर ही आप के बेटे को लगा हो?” शर्मा जी चुप हो गये…

ये तो सिर्फ एक घटना है,इन दंगों में नुकसान किसी और का नहीं होता हमारा ही होता है पर फायदा एक कौम को होता है जिसे हम राजनीतिज्ञ कहते हैं….

मै प्रदर्शन का विरोधी नहीं हूँ पर ऐसे प्रदर्शन का विरोधी हूँ जिसे हमे ही नुकसान हो रहा हो… हम शांति के साथ धरने दे सकते हैं और एक बात हमेशा याद रखें कि शांत भीड़ पर लाठी चार्ज नहीं होता,गुस्सा सब में होता है… हम सब आम आदमी ही हैं,जज्बात सब के उबलते हैं,खून किसी का भी पानी नहीं है…पर आगजनी,हिंसा पथराव कोई हल नहीं है… क्यूंकि माना हम पुलिस पर पथराव कर रहे हैं तो वो क्या आसमान से टपकी है? वो भी किसी का बेटा,पिता,पति ही है…उस पे लगा पत्थर क्या किसी रिश्ते पे मरी गयी आप कि चोट नहीं है?

बसों,सरकारी चीजों पे आगजनी हम करते हैं… क्या हमे ये नहीं समझ आता कि हमे इन्ही बसों से सफर करना है,आप 100 बसें जलाओ होगा क्या? नई बसें आने तक हमे ही तो सफर करना पड़ेगा… हिंदी का नहीं इंग्लिश का… फिर बसें नहीं होंगी और तब हमारे पास एक नया गुस्सा होगा कि बसें नहीं,ये हम भूल जायेंगे कि बसें हम ने ही फूंकी थी  और अगर सरकार तत्काल भी नई बसें खरीदती है,तब भी टेंडर,सरकारी काम काज मै 7-8 महीने लगने ही हैं… नुकसान में कौन आप… आम आदमी… भारत का आदमी…

इंडिया और भारत कभी एक नहीं हो सकता… अगर ये ही हाल रहा तो… क्यूंकि इंडिया को इन सब छोटे मोटे मुद्दों से फर्क नहीं पड़ता,हाँ आजकल उसे भी फर्क पड़ रहा है क्यूंकि रुपये की कीमत गिर रही है… पर हड़ताल कर के… दंगे भड़का के…आगजनी कर के हम भारत को और पीछे ले जा रहे हैं….

गाँधी का समर्थन नहीं करने को कह रहा क्यूंकि मुझे पता है आप में से बहुतों को वो पसंद नहीं है,पर मै अहिंसात्मक आन्दोलन पे जोर दूंगा… और उस का एक जीता जगता उदाहरण अन्ना की अगस्त क्रांति है…

दंगों से, पथराव से, आगजनी से अगर हल निकला करते तो कश्मीर धधक न रहा होता,गोधरा की आग अब तक न जल रही होती… अब फैसला आप का भारत और इंडिया के बीच की खाई पाटनी है या ऐसे ही चलते रहने देना है….

मै तो चला टीवी देखने कि कहाँ कितने दंगे हुए? कितने मरे? कितनी आगजनी हुई…

किसी ने ठीक ही लिखा है….

“सोने की चिड़िया डेंगू मलेरिया… गुड भी है गोबर भी…

भारत माता की जय…”

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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2 thoughts on “धधक रहा है हमारा देश भारत… पर छाई है ख़ामोशी है इंडिया में…

  1. Agni Tatv apna kaam ker rha hai. Bahut jaldi hi chita ki agni apna kaarya poora ker degi and fir uski raakh ganga mei samarpit ker 1 nai subah se nayee shuraat ho jaayegi Shukracharya Paddhti ne hi Yogmaya disease ki chita jalaai thi jo ab dhadhak rahi hai

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