आखिर चाहती क्या है सरकार..?

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अभय कालरा (मीडिया दरबार साप्ताहिक आलेख प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित)

आज देश में हर आदमी चाहे छोटा हो या बड़ा, महंगाई से बुरी तरह त्रस्त है। न सिर्फ बुनियादी जरूरत की चीजें बल्कि लग्ज़री और कम उपयोग में आने वाली चीजें भी बेइंतहा महंगी हो गई हैं। यह दाम जिस तरह बढ़ रहे हैं उसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है.

महंगाई की मार झेल रहे आम आदमी की जेब हर रोज हल्की होती जा रही है और वह हैरान-परेशान है. खाने-पीने की हर एक चीज.. रोटी, दाल, सब्जी, तेल, चीनी सब इतनी महंगी हो गई है कि वह इसे पूरा करने में ही परेशान है. महंगाई डायन खाए जा रही है. हर चीज पहुंच से बाहर होती जा रही है. इसका कोई विकल्प सामने नहीं दिख रहा है. इसी महंगाई पर समय की मुहिम है ‘सातवां आसमान’

जिस तेजी से पिछले तीन-चार महीनों में पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस के दाम बढ़े हैं अगर उसी रफ्तार से कीमतें बढ़ती रहीं तो हर चीज के दाम सातवें आसमान पर होंगे और आम आदमी की पहुंच से जरूरत की चीज भी बाहर हो जाएगी. पेट्रोलियम पदार्थों, खास कर डीज़ल की कीमतें बढ़ने से ट्रक भाड़ा और सामानों की ढुलाई की दरें बढ़ गईं। नतीज़ा ये निकला कि हर चीज की कीमतों में उछाल आ गया है.

हालांकि महंगाई से पूरा देश त्रस्त है और जनता के साथ विपक्ष भी विरोध में खड़ा है, पर सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. सरकार बनाने की ताकत रखने वाली जनता हाथ मल रही है. चुनाव में अभी तीन साल की देरी है और सरकार इसका भरपूर फायदा उठा रही है. वह हर जरूरत की चीज पर दाम बढ़ा कर भरपूर फायदा कमा लेना चाहती है. बड़ी-बड़ी कंपनियों को रियायतें दी जा रही हैं. आम जनता पर इसका बोझ डाला जा रहा है. गणित और समीकरण दोनों साफ है. मगर जनता लाचार है.

हैरानी की बात यह है देश की सबसे बड़ी मुश्किल पर जब प्रधानमंत्री ने पहली बार जुबान खोली तो जनता के लिए राहत नहीं बल्कि शामत की तारीख निकली. 29 जून को राजधानी नई दिल्ली में मीडिया के संपादकों से हुई मुलाकात में प्रधानमंत्री ने महंगाई पर बस इतना ही कहा कि देश में बढ़ रही महंगाई पूरी दुनिया से जुड़ी है और इससे निपटने के लिए अगले साल के मार्च तक का समय लगेगा.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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One thought on “आखिर चाहती क्या है सरकार..?

  1. kya chathi hai wo hub sub dikayay gayyy 16 august koo bahar aa kar desh kaa tringa lay kar desh kay Anna kay support may aap sub bahar aaya office ki cutti lay kar sarkar dhara 144 bhi laga too bhi is sadii galli sarkar koo jana hooga anti corruption bill lana hooga.

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