कभी इन्हीं शेखावत की पीठ में छुरा भोंक रही थीं घड़ियाली आसुओं वाली वसुंधरा

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-तेजवानी गिरधर-

सौजन्य: इंडिया टुडे

जीते जी जो शख्स दुश्मन होता है, वहीं दिवंगत हो जाने के बाद कैसे महान दिखाई देने लग जाता है, इसका ताजा उदाहरण पेश किया है पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा सिंधिया ने। सीकर जिले के खाचरियावास गांव में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शेखावत की पुण्यतिथि पर आयोजित आदमकद मूर्ति अनावरण समारोह में उन्होंने इतना भावभीना भाषण दिया, मानो वे वाकई उनका आजीवन सम्मान करती रही थीं। तस्वीर का दूसरा रुख ये है कि ये वे ही वसुंधरा हैं, जिनकी वजह से राजस्थान के सिंह कहलाने वाले स्वर्गीय शेखावत जी अपने प्रदेश में ही बेगाने से हो गए थे। अगर ये कहें कि आज भी बेगाने हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पार्टी के स्तर पर अब भी उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं होता। यह कार्यक्रम भी राजवी परिवार की पहल पर आयोजित किया गया था।

आइये, देखते हैं कि मूर्ति अनावरण समारोह में वसुंधरा ने क्या-क्या कहा? शेखावत जी की महानता का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि स्वर्गीय भैरोंसिंह शेखावत ने राजस्थान में भाजपा का झंडा हमेशा बुलंद रखा। वे हमेशा रोशनी की पहली किरण उस जगह पहुंचाने की तरफदारी करते थे, जहां कभी उजाला पहुंचा ही न हो। सवाल ये उठता है कि अगर ऐसी ही उनकी मान्यता रही है तो आखिर क्या वजह थी कि उपराष्ट्रपति पद से निवृत्त हो कर जब शेखावत राजस्थान में आए तो भाजपाई उनसे कतराते थे?

वसुंधरा ने कहा कि 1996 में शेखावत अपना इलाज कराने अमेरिका गए थे, तब एक ओर से तो वे मौत से संघर्ष कर रहे थे और दूसरी ओर उनकी सरकार गिराने का राजस्थान में षडयंत्र चल रहा था। लेकिन जिसकी भगवान रक्षा करता है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। इसीलिये विदेश में उनका आपरेशन सफल हुआ और यहां राजस्थान में उनके खिलाफ रचा गया षडय़ंत्र असफल। उनके इस कथन से क्या यह सवाल उठता है कि क्या खुद वसुंधरा ने शेखावत का वजूद को समाप्त करने का षडयंत्र नहीं रचा था?

उन्होंने कहा कि अटल जी, आडवाणी जी, राजमाता विजयाराजे सिंधिया साहब और भैरोंसिंह जी शेखावत भाजपा की वो मजबूत शाखाएं थीं, जिन्होंने भाजपा को न केवल सींचा, बल्कि भाजपा के कमल को गांव-गांव, ढाणी-ढाणी और घर-घर खिलाया। सवाल उठता है कि क्या उसी मजबूत शाखा की जड़ों में छाछ डालने का काम वसुंधरा ने नहीं किया?

वसुंधरा ने कहा कि उनके जीवन में दो महत्वपूर्ण अवसर आए, जब उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई। पहला अवसर था, जब वे पहली बार 1985 में विधायक बनीं। शेखावत जी ने फरमान जारी कर दिया कि हिन्दी में बोलना है। हिन्दी में स्पीच देना बहुत कठिन था, पर डर था शेखावत जी का। तैयारी करके बोली तो मेरी पीठ थपथपाई और लड्डू बंटवाए। सवाल से उठता है कि क्या उसी महान शख्स की पीठ में वसुंधरा ने राजनीतिक खंजर भोंकने की कोशिश नहीं की?

वसुंधरा ने कहा कि 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने पैरिस के एफिल टावर पर चढ़ कर बता दिया कि अभी भी उनमें दम है। सवाल ये उठता है कि ऐसे दमदार शख्स का दम निकालने की कोशिश वसुंधरा ने नहीं तो किसने की थी?

दरअसल शेखावत के राजस्थान लौटते ही दोनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया था। वसुंधरा अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक थीं कि भाजपाई शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। कई दिन तक तो वे सार्वजनिक जीवन में दिखाई ही नहीं दिए। इसी संदर्भ में अजमेर की बात करें तो लोग भलीभांति जानते हैं कि जब वे दिल्ली से लौट कर दो बार अजमेर आए तो उनकी अगुवानी करने को चंद दिलेर भाजपा नेता ही साहस जुटा पाए थे।

शेखावत जी की भतीजी संतोष कंवर शेखावत, युवा भाजपा नेता भंवर सिंह पलाड़ा और पूर्व मनोनीत पार्षद सत्यनारायण गर्ग सहित चंद नेता ही उनका स्वागत करने पहुंचे। अधिसंख्य भाजपा नेता और दोनों तत्कालीन विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी व श्रीमती अनिता भदेल ने उनसे दूरी ही बनाए रखी। वजह थी मात्र ये कि अगर वे शेखावत से मिलने गए तो मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया नाराज हो जाएंगी। पूरे प्रदेश के भाजपाइयों में खौफ था कि वर्षों तक पार्टी की सेवा करने वाले वरिष्ठ नेताओं को खंडहर करार दे कर हाशिये पर धकेल देने वाली वसु मैडम अगर खफा हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे।

असल में एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने तय कर लिया था कि अब राजस्थान को अपने कब्जे में ही रखेंगी। शेखावत ही क्यों, उनके समकक्ष या यूं कहना चाहिए कि उनके वरिष्ठ अनेक नेताओं को उन्होंने खंडहर बता कर हाशिये पर खड़ा कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं है कि उसी कब्जे को शिद्दत से अपने पास रखने की जिद में ही उन्होंने हाल में हाईकमान की नाक में दम कर रखा है। वे तब नहीं चाहतीं थीं कि शेखावत फिर से राजस्थान में पकड़ बनाएं।

यूं तो शेखावत के कोई पुत्र नहीं था, इस कारण खतरा नहीं था कि उनका कोई उत्तराधिकारी प्रतिस्पर्धा में आ जाएगा, मगर उनके जवांई नरपत सिंह राजवी उभर रहे थे। वसुंधरा इस खतरे को भांप गई थीं। इसी कारण शेखावत राजवी को भी उन्होंने पीछे धकेलने की उन्होंने भरसक कोशिश की। इस प्रसंग में यह बताना अत्यंत प्रासंगिक है कि शेखावत ने वसुंधरा राजे के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम की शुरुआत की थी। यही वसुंधरा को नागवार गुजरी। सब जानते हैं कि शेखावत की इसी मुहिम का उदाहरण दे कर कांग्रेस ने वसुंधरा के कार्यकाल पर सवाल उठाने शुरू कर दिए थे।

बहरहाल, मोहब्बात और जंग में सब जायज बताया जाता है। उस लिहाज से वसुंधरा ने जो कुछ किया व कर रही हैं, उनके लिहाज से वह जायज ही है। पार्टी के लिहाज से वह आज भी तकलीफदेह है। पार्टी आज भी दो धड़ों में बंटी हुई है।

तेजवानी गिरधर
7742067000
[email protected]

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7 thoughts on “कभी इन्हीं शेखावत की पीठ में छुरा भोंक रही थीं घड़ियाली आसुओं वाली वसुंधरा

  1. स्व.शेखावत जी के सहयोग से ही वसुंधरा को राजस्थान का मुख्यमंत्री पद मिला और इसने उनकी पीठ में खंजर घोंपा|

    सही निष्कर्ष निकाला आपने |

  2. Aap bilkul sahi kah rhi hain Neeraji…. Ye rajnetaon ka param dharm h ki jiske kandhe par chadho use hi laat maar kar neeche gira do…. Ganga hamesha upar se neeche ki or behti h…. Jo seekha wahi to kiya..

  3. तुम्ही ने दर्द दिया है , तुम्ही दवा देना …
    लगी है चोट कलेजे पे उम्र भर के लिए
    तुम्ही ने दर्द दिया है , तुम्ही दवा देना …

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