आखिर कब तक ऐसा होगा…? क्यों नहीं बनता मंदिरों के लिए नया कानून..?

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केरल के पदनाभास्वामी मन्दिर से निकला 90 हजार करोड का खज़ाना…… एक प्रश्नचिन्ह बन रहा है सब ये सोचने मे लगे हैं कि आखिर ये खज़ाना, ये संपत्ति किस राजा के काल का है और  कौन हैं उनके वंशज?

इस खबर से मेरे मन में भी एक ख्याल आया..

“आखिर क्या जरूरत है मंदिरों को इतने पैसों की?”

मंदिर की संपत्ति है या तो मंदिर के काम आए या फिर जनता के और मन्दिर के भी कितने काम आ सकती है एक दायरे मे ही ना तो उसके बाद उस पैसे का सदुपयोग देश और समाज के कल्याण के लिये होना चाहिये ना…? आखिर देश की संपत्ति है… बेशक जनता ने दी है… तो जनता के ही काम आयेगी ना…? वैसे भी हमारे देश से राजा महाराजाओ की परम्परा खत्म हो चुकी है ऐसे मे उनके वंशज से पूछना ना पूछना कोई मायने नही रखता…

सवाल यह भी उठता है कि आखिर कब तक ऐसा होगा…? आज जहाँ देखो, जिस मंदिर में देखो, हर जगह सिर्फ यही सुनने को मिलता है कि अमुक मंदिर में इतने किलो का मुकुट या इतने किलो की चेन चढ़ाई गई…

मंदिरों में इतना पैसा होना क्या आश्चर्य की बात नहीं है? सभी जानते हैं कि मंदिरों में श्रद्धालु अपनी कामना पूरी होने पर कुछ ना कुछ चढाते ही हैं लेकिन मेरा कहना है कि यदि इतना पैसा मंदिरों में है तो फिर हम सब क्यों सिर्फ इसी में लगे रह जाते हैं कि कौन सा मंदिर आगे हो गया और कौन सा पीछे , हमारी सोच सिर्फ यहीं आकर क्यूँ सिमट जाती है कि कौन सा मंदिर खजाने में आगे है और कौन सा पीछे….  हम ये क्यों नहीं सोच पाते कि ये पैसा भी काम आ सकता है…. क्या फायदा इतना पैसा मंदिरों में पड़ा सड़ता रहे और देश की गरीब जनता दो वक्त की रोटी के लिए तरसती रहे….. क्या भगवान पैसा चाहता है या बिना पैसे के खुश नहीं होता?

बेशक कहना ये होगा कि लोग चढाते हैं तो कोई क्या करे ? जिनके काम पूरे होते हैं तो वो चढाते हैं इसमें मंदिर का क्या दोष? मगर प्रश्न अब भी अपनी जगह है कि….. क्या मंदिर के कर्ताधर्ताओं का कोई फ़र्ज़ नहीं बनता? जितना मंदिर की देखभाल और जरूरी खर्चों के लिए जरूरी हो उतना रखकर यदि उस पैसे का सही सदुपयोग करें तो क्या उससे भगवान नाराज हो जायेंगे? क्या उस पैसे को समाज , देश और गरीब जनता के कल्याण के लिए प्रयोग नहीं किया जा सकता? और यदि ऐसा किया जाता है तो ना जाने कितने लोगों का भला होगा और मेरे ख्याल से तो इससे बढ़कर और बेहतर काम दूसरा कोई हो ही नहीं सकता…… मगर ना जाने कब हम ये बात समझेंगे….?

अब देखिये जम्मू कश्मीर के तीर्थ स्थलों में सरकारी श्राइन बोर्डों ने जनता की सुविधा के लिए वहाँ का नक्शा ही बदल दिया चाहे वैष्णो देवी जाना हो या अमरनाथ…… और सबसे बड़ी बात इस कार्य में सरकार ने भी सहयोग दिया…… जब वैष्णो देवी के रास्तों को संवारा गया तब श्री जगमोहन जी ने वहाँ की कायापलट कर दी.

तो क्या और मंदिरों या ट्रस्टों के लोग ऐसा नहीं कर सकते? अब चाहे पैसा भ्रष्टाचार के माध्यम से बाहर गया हो या देश के मंदिरों में सड़ रहा हो, क्या फायदा ऐसे पैसे का? क्या इस पैसे के बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता? क्या इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई जा सकती? मेरे ख्याल से तो मेरा देश कल भी सोने की चिड़िया था तो आज भी है। जिस देश के मंदिरों में आज भी इतना पैसा बरसता हो वो कैसे गरीब रह सकता है? ये तो हमारी ही कमजोरी और लालच है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है…. आखिर कब हमारी सोच में बदलाव आएगा? आखिर कब हम खुद से ऊपर उठकर देश और समाज के लिए सोचेंगे?

हम ये क्यो नही सोचते कि इस धन का सदुपयोग किस तरह हो…? इस तरह क्या किया जाए कि जन कल्याण हो और देश का विकास भी… सोचने वाली बात ये है कि हर मन्दिर या मठ मे इतना पैसा बरस रहा है तो क्यो ना एक ऐसा कानून बनाया जाए जिसके तहत एक सीमा तक ही मन्दिरो या मठों मे पैसा रखा जाए और उसके बाद का सारा पैसा जन कल्याण के कार्यक्रमों मे उपयोग किया जाए…?

इससे एक नई विचारधारा का जन्म होगा… बेरोजगारो को काम मिलेगा और देश मे अपराध, बेईमानी, भ्रष्टाचार का बोलबाला कम होगा और अपनी जरूरतो के लिए किसी की तरफ़ हाथ फ़ैलाने की जरूरत नही रहेगी… आज एक ऐसे कानून की जरूरत है जिसका सख्ती से पालन किया जा सके… वैसे भी हमारी जनता धर्मभीरु ज्यादा है और डर के मारे वहाँ तो पैसा चढ़ा देगी मगर कोई जरूरतमंद माँग ले उसे नहीं देगी… या किसी के काम आ जाये वो नहीं करेगी तो चाहे जिस कारण से पैसा आ रहा हो तो उसका सदुपयोग करने के लिए क्यों ना ऐसा कानून बने जिससे जान जान का कल्याण हो और देश और समाज में स्वस्थ वातावरण का निर्माण हो.

– वंदना गुप्ता

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4 thoughts on “आखिर कब तक ऐसा होगा…? क्यों नहीं बनता मंदिरों के लिए नया कानून..?

  1. मस्जिदों , दरगाहों और चर्चों के लिए भी पहले क़ानून बनवाओ फिर मंदिरों की बात करो , ऐसा लग रहा है की जैचंद के वशंज से है इसका लेखक

  2. control ya kanoon kewal hindu mandiron par hi kyon. Aur dharmon ke so called Headqurters main unlimitted cash aur sona para hai unke bare main loag kyon nahin bolte. Ultimately hindu hi apne aap ko khatam karne par tule hain.

  3. जब तक इस भारत देश के मंदिरों में झूठे देवी – देवता की पूजा होगी तब तक इनकी ये मंदिर ( दुकान ) चलती रहेगी और देश कब विकसित देश नहीं कहलाएगा , हमेशा विकासशील देश ही कहलाएगा |

  4. Mam… article is quite good but the main point is the valuables got from the temple does not come under”treasure”…these are only offerings made by different kings to lord sreepadmanabhaswamy…..& it should be carefully considered how 2 utilise the valuables bcoz it will create various feelings among public(devotees,public,society& nation& various orgs.)…so my viewpoint is that the decision should be taken after considering all the views of society&the betterment of all class of people…..

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