दानवों को मुंह चिढ़ाती मुस्लिम बेटियों से कुछ सीखेगा हिन्दू समुदाय?

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-शिवनाथ झा-

इंडिया टुडे के संपादक और बहुचर्चित फेसबुक ऐक्टिविस्ट दिलीप मंडल ने पिछले दिनों आमिर खान के कार्यक्रम सत्यमेव जयते के बारे में अपनी वॉल पर एक अपडेट छोड़ा. इस अपडेट में राजा राममोहन रॉय को अपनी कुलीन बिरादरी के बीच व्याप्त एक बुरी प्रथा को खत्म करने वाला बताया गया था. दिलीप मंडल ने आमिर खान का भी इसलिए सम्मान किया था कि वे भी इलीट में व्याप्त एक बुराई कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जनजागरण कर रहे हैं. अपडेट में आमिर की सफलता की कामना की गई थी, लेकिन जैसा कि फेसबुक पर अक्सर होता है, बहस मूल मुद्दे से भटक कर होने लगी और निशाने पर आ गया सती प्रथा.

दरअसल दिलीप मंडल मुस्लिम समाज पर इसलिए कुछ कटाक्ष नही कर पाए कि उसमें भ्रूण हत्या की समस्या बिल्कुल न के बराबर है. पैंसठ वर्षों से हम भारत के लोग विश्व के मुस्लिम देशों और मुसलमानों के प्रति “राजनितिक सिद्धि के लिए” भले ही अपने मन में प्रतिरोध और प्रतिशोध की भावना को पाल-पोस कर जीवित रखने की अनवरत चेष्टा करते हों, लेकिन भारत का हिन्दू समाज शायद इस बात को इंकार नहीं कर सकता है कि लड़कियों के मामले में भ्रूण-हत्या मुस्लिम समाज को ग्रसित नहीं कर पाई है.

क्या कहते हैं भारत के शैक्षिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक तथाकथित “ठेकेदार” या “तथाकथित प्रबुद्धजन”? यदि देखा जाये, तो भारत में नारी-भ्रूण-हत्या में समाज के शिक्षित और संभ्रांत वर्ग का जितना हाथ है, शायद अनपढ़ लोगों का नहीं.

पिछले दिनों दिल्ली के एक पॉश इलाके (दक्षिण दिल्ली) का सर्वेक्षण किया गया. हजारों शिक्षित और संभ्रांत वर्ग के पुरुष और महिलाओं से बात की गयी. दुर्भाग्य यह रहा की इस इलाके में रहने वाले 90 फीसदी से भी ज्यादा महिलाएं और पुरुष, जो अपने को “समाज का ठेकेदार” कहलाते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों में गला फाड़-फाड़ कर कन्या-भ्रूण हत्या के बारे में लोगों को संवेदनशील करने की कोशिश करते हैं ताकि उनके द्वारा चलाये जा रहे संस्थाओं को भारत सरकार के अलावे विश्व स्तर की अन्य सरकारी खजाने से लक्ष्मी का प्रवेश बना रहे, सबों को बेटा चाहिए, बेटी नहीं. उनके अनुसार “बेटियां तो पराये घर में जाएँगी, फिर इतने बड़े व्यवसाय, उद्योग का मालिक कौन होगा?”

पाश्चात्य देशों की तरह, भारत भी नारी-अपमान, अत्याचार एवं शोषण के अनेकानेक निन्दनीय कृत्यों से ग्रस्त है। उनमें सबसे दुखद ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ से संबंधित अमानवीयता, अनैतिकता और क्रूरता की वर्तमान स्थिति हमारे देश की ही ‘विशेषता’ है, उस देश की, जिसे एक धर्म प्रधान देश, अहिंसा व आध्यात्मिकता का प्रेमी देश और नारी-गौरव-गरिमा का देश होने पर गर्व है।

वैसे तो प्राचीन इतिहास में नारी पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बहुत निचली श्रेणी पर भी रखी गई नज़र आती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान की उन्नति तथा सभ्यता-संस्कृति की प्रगति से परिस्थिति में कुछ सुधर अवश्य आया है, फिर भी अपमान, दुर्व्यवहार, अत्याचार और शोषण की कुछ नई व आधुनिक दुष्परंपराओं और कुप्रथाओं का प्रचलन हमारी संवेदनशीलता को खुलेआम चुनौती देने लगा है। साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध की सीमित समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक द्वारा भ्रूण-लिंग की जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेज़ी से फैलाता जा रहा है।

इस व्यापक समस्या को रोकने के लिए गत कुछ वर्षों से कुछ चिंता व्यक्त की जाने लगी है। साइन बोर्ड बनाने से लेकर क़ानून बनाने तक, कुछ उपाय भी किए जाते रहे हैं। जहां तक क़ानून की बात है, विडम्बना यह है कि अपराध तीव्र गति से आगे-आगे चलते हैं और क़ानून धिमी चाल से काफ़ी दूरी पर, पीछे-पीछे। नारी-आन्दोलन भी रह-रहकर कुछ चिंता प्रदर्शित करता रहता है, यद्यपि वह नाइट क्लब कल्चर, सौंदर्य-प्रतियोगिता कल्चर, कैटवाक कल्चर, पब कल्चर, कॉल गर्ल कल्चर, वैलेन्टाइन कल्चर आदि आधुनिकताओं तथा अत्याधुनिकताओं की स्वतंत्रता, स्वच्छंदता, विकास व उन्नति के लिए; मौलिक मानवाधिकार के हवाले से—जितना अधिक जोश, तत्परता व तन्मयता दिखाता है, उसकी तुलना में कन्या भ्रूण-हत्या को रोकने में बहुत कम तत्पर रहता है।

कुछ वर्ष पूर्व एक मुस्लिम सम्मेलन में (जिसका मूल-विषय ‘मानव-अधिकार’ था) एक अखिल भारतीय प्रसिद्ध व प्रमुख एन॰जी॰ओ॰ की एक राज्यीय (महिला) सचिव ने कहा था: ‘पुरुष-स्त्री अनुपात हमारे देश में बहुत बिगड़ चुका है (1000:840, से 1000:970 तक, लेकिन इसकी तुलना में मुस्लिम समाज में यह अनुपात बहुत अच्छा, हर समाज से अच्छा है। मुस्लिम समाज से अनुरोध है कि वह इस विषय में हमारे समाज और देश का मार्गदर्शन और सहायता करें।’

उपरोक्त असंतुलित लिंग-अनुपात (Gender Ratio) के बारे में एक पहलू तो यह है कि कथित महिला की जैसी चिंता, हमारे समाजशास्त्री वर्ग के लोग आमतौर पर दर्शाते रहते हैं और दूसरा पहलू यह है कि जैसा कि उपरोक्त महिला ने ख़ासतौर पर ज़िक्र किया, हिन्दू समाज की तुलना में मुस्लिम समाज की स्थिति काफ़ी अच्छी है। इसके कारकों व कारणों की समझ भी तुलनात्मक विवेचन से ही आ सकती है। मुस्लिम समाज में बहुएं जलाई नहीं जातीं। ‘बलात्कार और उसके बाद हत्या’ नहीं होती। लड़कियां अपने माता-पिता के सिर पर दहेज और ख़र्चीली शादी का पड़ा बोझ हटा देने के लिए आत्महत्या नहीं करती। जिस पत्नी से निबाह न हो रहा हो उससे ‘छुटकारा’ पाने के लिए ‘हत्या’ की जगह पर ‘तलाक़’ का विकल्प है और इन सबके अतिरिक्त, कन्या भ्रूण-हत्या की लानत मुस्लिम समाज में नहीं है।

मुस्लिम समाज यद्यपि भारतीय मूल से ही उपजा, इसी का एक अंग है, यहां की परंपराओं से सामीप्य और निरंतर मेल-जोल की स्थिति में वह यहां के बहुत सारे सामाजिक रीति-रिवाज से प्रभावित रहा तथा स्वयं को एक आदर्श इस्लामी समाज के रूप में पेश नहीं कर सका, बहुत सारी कमज़ोरियों उसमें भी घर कर गई हैं, फिर भी तुलनात्मक स्तर पर उसमें जो सद्गुण पाए जाते हैं, उनका कारण सिवाय इसके कुछ और नहीं हो सकता, न ही है, कि उसकी उठान एवं संरचना तथा उसकी संस्कृति को उत्कृष्ट बनाने में इस्लाम ने एक प्रभावशाली भूमिका अदा की है।

इस्लाम, 1400 वर्ष पूर्व जब अरब प्रायद्वीप के मरुस्थलीय क्षेत्र में एक असभ्य और अशिक्षित क़ौम के बीच आया, तो अनैतिकता, चरित्रहीनता, अत्याचार, अन्याय, नग्नता व अश्लीलता और नारी अपमान और कन्या-वध के बहुत से रूप समाज में मौजूद थे। इस्लाम के पैग़म्बर का ईश्वरीय मिशन, ऐसा कोई ‘समाज सुधर-मिशन’ न था जिसका प्रभाव जीवन के कुछ पहलुओं पर कुछ मुद्दत के लिए पड़ जाता और फिर पुरानी स्थिति वापस आ जाती। बल्कि आपका मिशन ‘सम्पूर्ण-परिवर्तन’, समग्र व स्थायी ‘क्रान्ति’ था, इसलिए आप (सल्ल॰द्) ने मानव-जीवन की समस्याओं को अलग-अलग हल करने का प्रयास नहीं किया बल्कि उस मूल-बिन्दु से काम शुरू किया जहां समस्याओं का आधार होता है। इस्लाम की दृष्टि में वह मूल बिन्दु समाज, क़ानून-व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बल्कि स्वयं ‘मनुष्य’ है अर्थात् व्यक्ति का अंतःकरण, उसकी आत्मा, उसकी प्रकृति व मनोवृत्ति, उसका स्वभाव, उसकी चेतना, उसकी मान्यताएं व धारणाएं और उसकी सोच तथा उसकी मानसिकता व मनोप्रकृति।

बेटियों की निर्मम हत्या की उपरोक्त कुप्रथा को ख़त्म करने के लिए पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰द्) ने अभियान छेड़ने, भाषण देने, आन्दोलन चलाने, और ‘क़ानून-पुलिस-अदालत-जेल’ का प्रकरण बनाने के बजाय केवल इतना कहा कि ‘जिस व्यक्ति के तीन (या तीन से कम भी) बेटियां हों, वह उन्हें ज़िन्दा गाड़कर उनकी हत्या कर दे, उन्हें सप्रेम व स्नेहपूर्वक पाले-पोसे, उन्हें (नेकी, शालीनता, सदाचरण व ईशपरायणता की) उत्तम शिक्षा-दीक्षा दे, बेटों को उन पर प्रमुखता व वरीयता न दे, और अच्छा-सा (नेक) रिश्ता ढूंढ़कर उनका घर बसा दे, तो पारलौकिक जीवन में वह स्वर्ग में मेरे साथ रहेगा।’

‘परलोकवाद’ पर दृढ़ विश्वास वाले इन्सानों पर उपरोक्त संक्षिप्त-सी शिक्षा ने जादू का-सा असर किया। जिन लोगों के चेहरों पर बेटी पैदा होने की ख़बर सुनकर कलौंस छा जाया करती थी (क़ुरआन, 16:58) उनके चेहरे अब बेटी की पैदाइश पर, इस विश्वास से, खिल उठने लगे कि उन्हें स्वर्ग-प्राप्ति का एक साधन मिल गया है। फिर बेटी अभिशाप नहीं, वरदान, ख़ुदा की नेअमत, बरकत और सौभाग्यशाली मानी जाने लगी और समाज की, देखते-देखते काया पलट गई।

मनुष्य की कमज़ोरी है कि कभी कुछ काम लाभ की चाहत में करता है और कभी डर, भय से, और नुक़सान से बचने के लिए करता है। इन्सान के रचयिता ईश्वर से अच्छा, भला इस मानव-प्रकृति को और कौन जान सकता है? अतः इस पहलू से भी कन्या-वध करने वालों को अल्लाह (ईश्वर) ने चेतावनी दी। इस चेतावनी की शैली बड़ी अजीब है जिसमें अपराधी को नहीं, मारी गई बच्ची से संबोधन की बात क़ुरआन में आई हैः
‘और जब (अर्थात् परलोक में हिसाब-किताब, फ़ैसला और बदला मिलने के दिन) ज़िन्दा गाड़ी गई बच्ची से (ईश्वर द्वारा) पूछा जाएगा, कि वह किस जुर्म में क़त्ल की गई थी’ (81:8,9)।

इस वाक्य में, बेटियों को क़त्ल करने वावालों को सख़्त-चेतावनी दी गई है और इसमें सर्वोच्च व सर्वसक्षम न्यायी ‘ईश्वर’ की अदालत से सख़्त सज़ा का फ़ैसला दिया जाना निहित है। एकेश्वरवाद की धरणा तथा उसके अंतर्गत परलोकवाद पर दृढ़ विश्वास का ही करिश्मा था कि मुस्लिम समाज से कन्या-वध की लानत जड़, बुनियाद से उखड़ गई। 1400 वर्षों से यही धरणा, यही विश्वास मुस्लिम समाज में ख़ामोशी से अपना काम करता आ रहा है और आज भी, भारत में मुस्लिम समाज ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ की लानत से पाक, सर्वथा सुरक्षित है। देश को इस लानत से मुक्ति दिलाने के लिए इस्लाम के स्थाई एवं प्रभावकारी विकल्प से उसको लाभांवित कराना समय की एक बड़ी आवश्यकता है.

(लेखक शिवनाथ झा वरिष्ठ पत्रकार है और कई मीडिया घरानों रह चुके हैं।)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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32 thoughts on “दानवों को मुंह चिढ़ाती मुस्लिम बेटियों से कुछ सीखेगा हिन्दू समुदाय?

  1. iska sirf ek hi karan hai ki islaam mien aurat ka ekhtiyaar itana hi hai ki wo sirf kisi purush ki bibi ban kar rahe wahan usaka kuchh swatantra astitwa nahi hai aur char shadiyon ki sahooliyat bhi isame kuchh had tak sahaayak hai kyon ki uska purush ke zeewan par koi haq nahi. hindu samaaj ki sabase muskil yahi hai kanya ka vivaah, agar aurat ko sirf upyog ki wastu samajh liya jaaye to koi pareshani nahi ek ne bahar nikala to doosare ne rakh liya chahe wah bachchi ho budiya usake liye swatantra jeewan ki manaahi hai kyon ki usake paas aarthik aazadi nahi to fir akela zeewan kaisa.

  2. So, according to Jha, Hindus kill their female offspring before they are even born….Well, it can’t be denied that some Hindus do…….and what do Muslims do to their female offspring after they are born? They condemn to a suffocating life of burqa, parda, triple talaq, no education, female genital mutilation etc etc…….which is worse tha n othe other?

  3. किसी ने लिखा है की बुरखा पुरुषो की वासनात्मक नजरो से रक्षा करता है अरे भाई बुरखा तो केवल बदन ढकता है आँखों को नहीं और वासनात्मक नजरों से कौन औरत बच पाई है? वेसे एक बात तो है कि आज कल के फैशन वाले बुर्के पहन कर मुस्लिम महिलाएं और ज्यादा सेक्सी लगती हैं बुरखा आदमी की दबी हुई सेक्स भावना को और ज्यादा भड़कता है और उस पर यह काला रंग जो सिर्फ बुरे लोगो द्वारा ही प्रयोग किया जाता है बुरखा नजरों मैं वासना लाता है आधे चाँद का दीदार जो होता है – रक्षा करता है यह भूल जाओ

  4. झा जी का लेख अच्हा है पर शायद उन्होने हमारे वेदों को नहीं पढ़ा, जिन वेदों से ही कुछ शिक्षा लेकर रसूल ने कुरान की रचना आज से १४०० साल पहले की. हमारे वैदिक धर्मं मैं स्त्रियों के लिए बहूत कुछ लिखा गया है रिग्वेदा मंडल १० सूक्त ६३ मैं बेटियों की देख भाल व शिक्षा के लिए लिखा गया है जिससे वो अच्छी माताएं बन सकें. हाँ ये दुख की बात है कि हिन्दू अपने धर्म ग्रंथो को नहीं पढ़ता इसलिए गलत रास्ते पर ज रहा है. १४०० वर्ष की गुलामी ने हिन्दू की सोच कुंठित कर दी है. झा ने अच्छा विषय लिया है पर जैसा उन्होने इस्लाम को जान कर लिखा है थोडा वेदों को भी पद कर लिखना चाहिए. धन्यवाद

    1. तुमने कहा क वेदों से लेकर कुरान की रचना की गई.. यह एक मजाक है .. वो कभी सौदिया अरबिया से बहार ही नहीं गए.. कुरान में पिछले काफी धरम का जीकर किया गया है .. उसमे वेदों का कोई नाम ही नहीं है … और न वेद कुरान से ठीक से मेल खाते ह… सारे वेदों में जो बात कही गई ह कुरान से उससे भी ठीक तरीके से और कम सब्दो में कही गई ह. उसमे कोई सक नहीं ह क वो अल्लह की तरफ से है .. और उसमे साफ़ साफ़ लिखा है “क अगर तुमको कोई सक हो इस किताब में तो इसमें लिखी एक बी सूरत जैसी तुम बना क ले आओ .. दुनिया से सारे इंसान भी मिल जाये तो ऐसी कोई सूरत ने बना पाओगे” और इतिहास गव्ह है क काफी लोगो ने कोसिस बी की पर वो बर्बाद तो हो गए पर बना ने पाए..

  5. kuch log kehte hai islaam me aurato ki halat sahi nahi hai…woh ab apne girewaan me jhaanke phir feshla kare….aur study kre ki islaam me womans ki values kiya hai logo pr aur dikhaawe pr na jaaye

  6. Isme naya kya hai. South India main Shudroon ko aaj bhi mandir main prevesh ki anumati nahi. Raha sawal samjhane ka to samjhaya use jata hai jo samajhna chahe. Kyon ki print media main Togadia ji aur Modi ke liye to jagah hoti hai lekin Islamic Shiksha ke liye nahi.

  7. आपका कहना सही हैँ
    हालाँकि इस्लाम में औरतों की हालत बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती.पिछले दिनों ‘बोल’ नामक फिल्म में इस बात पर भी रोशनी डाली गई थी.पर फिर भी कम से कम भ्रूण हत्या जैसी घिनौनी हरकत को रोकने के लिए हमें मुस्लिमों से सीख लेनी ही चाहिए.
    अच्छा लेख! धन्यवाद!

    1. प्यारे राजन जी,
      मै आप के विचारों से सहमत नहीं हूँ. यदि आप मुस्लिम महिला की स्थिति को पर्दे के सन्दर्भ मै आंक रहे हैं तो यह विचार पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं. पर्दा व्यवस्था की आलोचना करने से पहले आप उन महिलाओं से पूछे जो बुर्का ओढती हैं की क्या वह बुर्का उतारना चाहती हैं. मैं कई मुस्लिम महिलाओं से मिला हूँ जो पुरुषसत्तात्मक समाज के अंदर पर्दे को एक सुरक्षा कवच की तरह देखती हैं जो उन की पुरुषो की वासनात्मक नजरो से रक्षा करता है. मै अमेरिका मै रहता हूँ यहाँ के समाज मे स्त्री का स्वतंत्रता के नाम पे किस तरह शोषण किया गया है वो वर्णन से बाहर की चीज़ है. स्त्री के हर अंग को एक कमोडिटी बना दिया गया है. पर्दा स्त्री के कमोडि फिकेशन के विरुद्ध एक प्रदर्शन है.

      1. कामरान जी मैं आपकी बात से सहमत हु पर्दा जब तक हमारी ओरतो को ढंक कर रखता ह वो सेफ रहती है कोई उनपर गलत निगाह नही डालता और जैसे ही ये पर्दा हटता है वैसे कितनी भूखी निगाहें औरत के जिस्म को खाने को दौडती है मै खुद पर्दा पर्था के हक मै हूँ

        1. बुर्के और पर्दे के इन रूपों को भी देखिए.. शायद आपलोगों की बहस को एक नई दिशा मिलेगी…
          नीचे दिए लिंकों पर क्लिक करें-

          http://legalizeislam.tumblr.com/tagged/veil

          http://thedaleygator.wordpress.com/2010/04/10/richard-mcenroe-is-really-going-to-po-some-radical-muslims-and-i-support-him/

      2. koi burka utaarana bhi chaahe to wo utaarane ki himmat bhi nahi kar sakti kyon ki unhe zahhnum aur gunaah ka dar pahale hi dikha diya to waicharik swatantrata kahan rahi ek baar kah kar dekho burka utaarana haraam nahi fir dekho

        1. इस सोच को कहेते ह काल्पनिक नेगेटिव विचार.. कभी ठीक से पता कीजिये.. अब तो बड़ी बड़ी सिटी में बी हिन्दू लेडी बुरखा की तरह दुपट्टा पहें कर घुमने लगी ह.. कुछ तो फेसन की वजह से ह. पर काफी ज्यादा अपनी और से इंसान की बुरी नज़र से हटाने को पहेनती ह… आप सब क दिमाग में एक बात भर दी गई ह क जो लड़की बुरखा फेन कर आये तो वो पीछे की ह.. जबके वो बी पढ़ सकती ह और जॉब बी कर सकती ह.. इस्लाम श्रीफ लेडी को ही नहीं कहेता बुरखा पहेनो.. वो जेंट्स से बी कहेता ह क अपनी बॉडी को कवर करो.. इसका मतलब ह क तहजीब से रहो… आज हिन्दू लड़की तिलक लगा कर अपने कल्चर को फॉलो कर क जॉब कर रही ह.. तो क्या वो बी पिछड़ी हुई ह .. या उनको डराया गया ह जहेंनुम से… ये सब मजाकिया बाते ह…

  8. Amit Singh Saheb: We, the journalists and people of India make any issue 'burning' or 'cool'. Time is knocking on the door of people of this country when a person (like Aamir Khan or you) will ask a male 'don't establish sexual relation withyour mother or sister". Its a matter of time. क्योंकि भारत के लोग मानसिक रूप से नपुंशक हैं, सोच नहीं सकते

  9. bohat khushi hui jha ji ….Apke vichaar jankar …..Magar islam ne Sirf kanya bhroon hatya ko he Nahi tham diya or b bohat se pahloo hain jisme islamic ideology bohat acchi hai Agar samj or maanav jaati uska anusaran kare to bohat se saamajik kurityon ka Nidaan sambhav hai

    Dhanyavad

    1. हुजुर, एक पत्रकार होने के नाते मैं अपना धर्म और कर्म कर रहा हूँ. मैं बहुत ही अदना सा व्यक्ति हूँ, नाचीज हूँ इस समाज में, लेकिन सोच अलग है, सोचता भी अलग हूँ. शायद एक भी कन्या का भ्रूण हत्या मैं बचने में सफल हुआ, हमारा यह लेख उस माता-पिता को समझा पाया, प्रभावित कर पाया तो अल्लाह के पास नजर मिला सकूँगा, नहीं तो समाजमे कुत्ते भी जीते हैं मनुष्य के भेष में.

      1. हम में सच को सच कहने का उत्साह है तो फिर हम झूठ को झूठ कहने में क्यों झिझकते है ,,,आपकी सकारात्मक सोच अच्छी है

    1. जी हुजुर, यही सत्य है, अगर इसका “राजनीतिकरण” न लिया जाये “लाभ के लिए”

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