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क्या पार्सिंग एरर के कारण हो रही थी इंडियन एक्सप्रेस की बदनामी?

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इन दिनों फेसबुक और सोशल मीडिया पर चर्चा का मुद्दा बना इंडियन एक्सप्रेस का वेबपेज किसी शरारत का भी असर हो सकता है। इंटरनेट के तकनीकी जानकारों का कहना है कि इंडियन एक्सप्रेस या कोई भी अखबार एक मामूली सी शरारत की वजह से ऐसी बदनामी का शिकार बन सकता है।

नौजवान इंटरनेट विशेषज्ञ मुदित ग्रोवर की कहना है कि ये सब फेसबुक के किसी मित्र की शरारत भी हो सकती है। दरअसल इंटनेट की अपनी शब्दावली होती है और इसे पढ़ने के लिए कुछ खास संकेत होते हैं। अधिकतर वेबसाइटों को उतने संकेत मिल जाने पर वेबपेज खुल जाता है। इस यूआरएल में वेबसाइट व फोल्डर के नाम और वेबपेज की आईडी संख्या के बीच कोई भी शब्द भर दिया जाए, वही पेज खुलेगा। उदाहरण के लिए अगर इन दोनों के बीच हिंदी या अंग्रेजी में कुछ भी लिख दिया जाए, वही पेज खुलेगा। ऐसा ‘parsing error’ नामक त्रुटि के कारण होता है।

अब उदाहरण के लिए दोनों के बीच अगर ‘कभी-गलती-मत-करना’ या फिर ‘never-commit-an-error’ लिखा हो तो भी लिंक डालने पर वही पेज खुलेगा। जैसे, नीचे दिए किसी भी लिंक पर क्लिक कीजिए, एक ही पेज खुलेगा।

http://www.indianexpress.com/news/कभी-गलती-मत-करना/947835/

http://www.indianexpress.com/news/never-commit-an-error/947835/

http://www.indianexpress.com/news/abcd/947835/

http://www.indianexpress.com/news/london/947835/

http://www.indianexpress.com/news/xxx/947835/

दिलचस्प बात ये है कि सभी वेबपेजों पर यूआरएल अलग-अलग हैं, लेकिन पेज एक ही है।

मुदित ग्रोवर का कहना है कि ऐसा सभी वेबसाइटों के साथ नहीं होता, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस की वेबसाइट की कूट भाषा में छेड़छाड़ संभव है। इस वेबसाइट की किसी भी खबर को मनचाहे ढंग से छेड़छाड़ कर प्रकाशित किया जा सकता है।

फेसबुक पर अब चर्चा ये भी है कि इस मामले को सबसे पहले प्रकाश में लाने वाले या सबसे ज्यादा फैलाने वाले अखिलेश ने क्यों किया। कुछ फेसबुकियों का कहना है कि अखिलेश खुद किसी मित्र के भुलावे का शिकार बने हैं तो कुछ का दावा है कि ये उन्हीं की शरारत है क्योंकि वे द हिन्दू में हैं और मामला एक्सप्रेस का।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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