साढ़े तीन करो़ड़ भारतीय मांओं का नहीं कोई ठौर-ठिकाना, फिर भी हम मनाते हैं ‘मदर्स डे’

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-शिवनाथ झा-

“माँ मुझे तूं अपनी अंचल में छिपा ले, गले से लगा ले, कि और मेरा कोई नहीं….”

आज शायद बहुत कम लोग इस गाने को गुनगुनाते होंगे, बहुतों ने तो सुना भी नहीं होगा। सत्रह शब्दों के ये बोल  – बचपन में एक बच्चे का अपनी माँ के साथ अगाध्य प्रेम को दर्शाते हैं, लेकिन माँ का दिन ढलते-ढलते क्यों समाप्त हों जाता है बच्चों में यह प्रेम अपनी माँ के लिए ? पहले “मैय्या” थी, फिर “माँ” बनी, फिर “मम्मी” और अब “मॉम”. एक संतान को जन्म देने में “मैय्या” को भी उतनी ही तकलीफ हुई होगी जो आज “मॉम” को होती है, फिर क्यों नहीं “माँ के प्रति वही प्रेम” रख पता है संतान?

गाँव में एक कहावत है कि जब संतान, चाहे विश्व के किसी भी कोने में रहता हो, जब किसी कष्ट में होता है, या परिस्थितियां उसके अनुकूल नहीं होती है, तो इस बात का एहसास सबसे पहले माँ को होता है. माँ के स्तन में एक कम्पन सी होती है (भारतीय महिलाएं हमारी इस बात को मानेंगी) जो इस बात का संकेत होता है की उसका संतान किसी समस्या से जूझ रहा है. संतान चाहे कितना भी कपूत हों, एक माँ, अपने संतान के उज्जवल भविष्य, उसकी लम्बी और स्वस्थ आयु की कामना जरुर करती है. क्योकि उस पीड़ा को सिर्फ और सिर्फ वही महसूस करती है जब उसे संतान सुख प्राप्त हुआ होता है. लेकिन बच्चों में अपनी माँ के प्रति ऐसा प्रेम क्यों नहीं होता?

कल, 13 मई है. सम्पूर्ण विश्व “मदर्स डे” मनाने जा रहा है. अंग्रेजी सभ्यता का अनुपालन करते भारत में भी कई बच्चे अपनी माँ को उनके पसंद की बस्तुएं उपहार स्वरुप प्रदान करेंगे. कई बच्चे उसके कलेजे से वर्षों बाद वैसे ही चिपकेंगे जैसे दसकों पहले बचपन में पिता के मार के डर से उसके आँचल में छिप करते थे. कितने माताओं के वर्षों से सुखा स्तन एक बार अपने बच्चों की ममता और वात्सल्य के कारण फिर से उत्प्लावित हों जायेगा.

आप माने या नहीं परन्तु भारत की आबादी का तेरह फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जो कभी पत्नी भी थीं, आज माँ भी हैं लेकिन इस माँ, जो अपने संतानों को नौ महीने अपने कोख में रखी, को रखने के लिए उनके संतानों के आलीशान भवनों से लेकर एक कमरे वाले कोठरी में भी दो गज जगह नहीं है और अगर होता तो भारत के पैंतीस मिलियन माताएं भारत के विभिन्न धार्मिक शहरों में, विशेष कर मथुरा, वृन्दावन और बनारस के विधवा आश्रम के रहकर अपने जीवन की अंतिम साँसे नहीं गिनती. आंकड़ों के अनुसार भारत के प्रत्येक चौथे घर में एक विधवा है. एक समय यह पत्नी थीं, फिर माँ बनी, फिर सास, फिर दादी और फिर पर-दादी. इसे दुर्भाग्य कहें या नियति, या फिर बदलते वक्त का तकाजा, आज भारत के बच्चों का अपने माँ के प्रति प्यार भी बदले-बदले से नजर आते हैं.

डॉ मोहिनी गिरी कहती हैं कि “भारत के हरेक चौथे घर में एक वृद्ध महिला हैं, अधिकाशतः विधवा, जिनकी आयु पचास वर्ष से अधिक है. बहुत सारे मामलों में ये वृद्ध महिलाएं अपने अस्सी-नब्बे वसंत को भी पार कर चुकी हैं. ऐसे घरों में उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी भी आ गयी हैं और यह ज्यादा तर ग्रामीण क्षेत्रोंमे अधिक है. बहुत सारे ऐसी भी वृद्ध महिलाएं हैं जिनके बच्चे उन्हें छोड़कर शहरों की ओर कूच कर गए हैं. इश्वर की आराधना के अलावे उनके पास और कोई काम नहीं है और वही भी अगर पेट में दाना हों. लेकिन कौन देखता है उनकी यह दुर्दशा?”

वैसे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है की भारत में महिलाओं का जीवन शोषण, पीड़ित, क्रूर प्रथाओं और परम्पराओं से जकड़ा रहा है, और आज भी है. महिलाओं को अपने जीवन के सर्वांगीन विकास के लिए, अपनेजीवन को सुधारने और एक गरिमामय जीवन जीने के बहुत ही काम अवसर मिले हैं, इतिहास गवाह है. लेकिन विधवाओं और उपेक्षित माताओं के मामले में स्थिति अत्यंत ही शोचनीय है. पैंतीस मिलियन ऐसी माताओं को, चाहे वह विधवा ही क्यों ना हों, अपने जीवित संतानों की उपस्थिति में भी ऐसी “नारकीय जीवन” जीना पड़े, फिर कैसा मदर्स डे?

पिछले दिनों दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने भारत सरकार में पदस्थापित एक वरिष्ट अधिकारी अपनी अस्सी वर्षीय माता को सड़क पर छोड़कर इसलिए चले गए क्योकिं उनकी माँ को उनकी पत्नी से नहीं पटती थी. अधिकारी चुकि “प्रेम विवाह” किये थे और ससुराल से भी धन और ऐसो-आराम की बहुत सारी सुविधाएँ उपलब्ध कराये गए थे, स्वाभाविक है की बचपन में “मकई और बाजरे को रोटी खिलाकर, पाल-पोसकर, अपनेजीवन को अपने इस संतान के लिए न्योछावर करने वाली माँ के लिए उनके मन में वह आत्मीयता नहीं रहा होगा, वह चिंतन करने का सामर्थ नहीं रहा होगा तभी वे अपनी माँ के प्रति इतने “निष्ठुर” हों गए.

अट्ठारहवीं सदी के पूर्वार्ध में राजा राममोहन राय ने एक सामाजिक क्रांति लाने की चेष्टा की ऐसी अबलाओं, विशेषकर विधवा और विधवा-माताओं की स्थितियों में सुधार लाने के लिए, महात्मा गाँधी भी ऐसी माताओं और महिलाओं के गरिमामय जीवन जीने के लिए कई सारे प्रयत्नों का पक्षधर बने. समाज में धीरे धीरे परिवर्तन भी आने लगे. दुर्भाग्य यह रहा की स्वतंत्रता के पैसठ साल बाद भी हम भारतीयों की मानसिकता में परिवर्तन नहीं कर सके – जिसके सीधी सड़क माँ की ममता, माँ के प्रति स्नेह, माँ के लिए प्रतिवद्धता, माँ का सम्मान, माँ की रक्षा की ओर जाती है. फिर कैसा मदर्स डे.

भारत में “गौ” (गाय) को भी माता कहा गया है. सभी उसकी आराधना, उपासना करते हैं. गौ-रक्षा के लिए, या गाय की हत्या ना हों, इसके लिए सम्पूर्ण देश में अनेकों संस्थाएं हैं. लेकिन क्या अब भारत में रहने वाले इन पैतीस मिलियन “नपुंसक मानसिकता” के लोगों के दिलों में माँ के प्रति सम्मान जगाने, उसे घर वापस लाने या फिर उसके जीवन की अंतिम साँसों की टूटती कड़ी को जोड़ने के लिए फिर से आमिर खान सत्यमेव जयते बनाना होगा, यह बताना होगा की आप माँ के गर्भ में कन्याओं (भविष्य की माँ) की हत्या तो नहीं करें, जिस माँ ने आपको जन्म दिया है, जीते-जी उसे अमानवीय व्यवहार से उसे मृत्यु के द्वार पर ना धकेलें. उसे वापस लायें, उसे आपकी जरुरत है ठीक उसी तरह, जैसे बचपन में आप अपने पिता मी मर के डर से उसकी आँचल में छिप जाय करते थे.” अगर ऐसा नहीं है तो फिर कैसा मदर्स डे?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. घर के बटवारे में किसी के हिस्से में दुकान और किसी के हिस्से में माकन आई, मै सबसे छोटा था मेरे हिस्से मे माँ आई,

  2. माँ का दर्द उसकी संतान समझ ले तो शायद इस दुनिया में कोई बेटा या बेटी दुखी और परेशान न हो क्योंकि माँ ही इस धरती पर साक्षात् भगवान इस धरती भेजने वाले को हमने नहीं देखा लेकिन इस धरती पर लाने वाली माँ को हने देखा है.लेकिन ईसका मतलब ये नहीं कि सभी मातायें ऐसे ही जीवन गुजार रही हैं !!
    मातृ दिवस तो एक बहाना है, अपना प्यार जताने का !! वैसे हमें हर दिन मातृ प्रेम दिखाना चाहिये !!

  3. Maa ek aisa sabd jiska har dharm me bade aadar ke sath zikr kiya gaya hai. Mai chuki Islam dharam ka follower hun isliye mai Islam me Maa ki ahmiyat ka zikr yun karna chahunga ki har Musalman chahe wah Amir ho ya Gharib JANNAT me jana chahta hai aur us JANNAT ko MAA ke qadmo me bataya gaya hai. Mai khud aaj tak is baat ko samjh nahi paya ki ek MAA jo apne bachche ko 9 mahene apne pet me rakhti hai aur bachche ka wajan (Minimum 2.5 KG) ko bardast karti hai fir usko is duniya me lane ke waqt dard jhelti hai (agar maa dard bardast na ho paye to operation ka dard). Fir bachche ke bachpan me parwarish aur unka FUTURE banane me apni tamam sukh subidha ko bhool jati hai. Umr ke 25-28 sal baad ek larki uski biwi ban kar zindagi me aati hai aur wah apne MAA ke tamam ehsano ko bhool apni biwi ka GULAM ban jata hai. Kaya MAA apne bachche ko isi liye palti hai ki jab use sahare ki zarurat ho to uska lal kisi aur ke pallu be chup kar NA-MARD ban jayee.

  4. लानत है ऐसे बेटो पे, जिनकि मातओं का ये हाल है !!

    लेकिन ईसका मतलब ये नहीं कि सभी मातायें ऐसे ही जीवन गुजार रही हैं !!
    मातृ दिवस तो एक बहाना है, अपना प्यार जताने का !! वैसे हमें हर दिन मातृ प्रेम दिखाना चाहिये !!
    जय मां भारती !!

  5. माँ ही जननी.
    माँ ही पोषक.
    माँ ही रक्षक.
    माँ ही पथ प्रदर्शक.
    माँ स्नेह सरिता.
    माँ करूणा का सागर.
    माँ का
    आशीष पारस मणी.
    माँ की गोद चैन की.
    पराकाष्ठा
    माँ का वर्णन असंभव है.
    माँ तो केवल माँ है.
    ना हुआ है कोई.
    उसके जैसा
    ना ही होगा कोई कभी.
    जिसने जान लिया सच.
    जीवन हुआ उसका तर.

  6. जबकि हर सांस मेरी , तेरी वजह से है माँ,
    फिर तेरे नाम का दिन एक मुक़र्रर क्यूँ हो..

  7. माँ का दर्द उसकी संतान समझ ले तो शायद इस दुनिया में कोई बेटा या बेटी दुखी और परेशान न हो क्योंकि माँ ही इस धरती पर साक्षात् भगवान इस धरती भेजने वाले को हमने नहीं देखा लेकिन इस धरती पर लाने वाली माँ को हने देखा है.

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