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क्या किसी में है कुव्वत माफ़िया डॉन अबू सलेम को फांसी पर लटकाने की?

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सी.बी.आई चाहे कुछ भी बोले, एक बात तो पक्की  है कि  भारत में हरेक जांच एजेंसी या फिर न्यायिक व्यवस्था के लोग “सरकार की इच्छा के विरुद्ध जाने की कुबत नहीं रखते है. कारण, हैं तो सभी सरकारी आदमी. सरकार के पैसे खाते हैं, मजे लेते हैं, फिर जनता के बारे में क्यों सोचें ? 
-शिवनाथ झा||

दो पाटन के बीच में बाकि बचे ना कोई. लेकिन न्यायालयों में, चाहे वह भारत का हो या पुर्तगाल  का, न्यायिक व्यवस्था लगभग एक ही तरह की है. निर्णय जल्द हों, यह सोचने का काम शायद ना तो न्यायिक व्यवस्था के लिए अहमियत रखता है और ना प्रशासकीय व्यवस्था के लिए.

भारत की जांच एजेंसी सी.बी.आई. वैसे दावा तो करती है कि वह 1993 मुंबई ब्लास्ट के मुख्य कन्सिपेरेटर अबू सलेम, जो कुछ अन्य अपराधों में भी लिप्त होने के कारण भारतीय जेल में पड़ें हैं, भारत सरकार और पुर्तगाल सरकार और पुर्तगाल के सर्वोच्च न्यायालय ने समस्या के तुरंत निबटान के लिए शीघ्र कदम उठाये, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि  सी.बी.आई. दोनों के मन को भांप कर वह कागज की कश्ती ज्यादा चला रही है. आखिर वह भी क्या करे. भारतीय सरकार से ऊपर तो नहीं है  सी.बी.आई. और इसके पदाधिकारी और किसी भी वरिष्ट पदाधिकारी में इतना दम तो नहीं ही है की वे नोर्थ ब्लोक और प्रधान मंत्री कार्यालय के इच्छाओं के विरुद्ध जाये.
पिछले महीने एडिशनल सोलिसिटर जनरल ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व में सी.बी.आई. की एक टीम पुर्तगाल  गयी थी. आम तौर पर सरकारी महकमे से सरकारी खर्च पर जो अधिकारी जाते हैं, वे इसे “मानसिक अवकाश” की संज्ञा देते है, चलो छुट्टी तो हुई, विदेश घूमेंगे. इन सभी अधिकारियों ने  वहां पुर्तगाल के मिनिस्ट्री ऑफ़ जस्टिस, एटोर्नी जनरल, और मिनिस्ट्री ऑफ़ फॉरेन अफेयर से बातचीत भी की और तत्कालीन उप-प्रधान मंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी द्वारा दिए गए गयी वचनों को दुहराने के अलावे अन्य क़ानूनी दावं-पेंच पर भी चर्चा किये, ऐसा कहते हैं.
सी.बी.आई. अब तक 1993 मुंबई ब्लास्ट केस के मामले में 20 सप्लिमेंटरी चार्जशीट मुंबई के ट्रायल कोर्ट में प्रस्तुत कर चुकी है. इस केस की सुनबाई घटना के लगभग दो वर्षों के बाद अप्रैल 1995 में शुरू हुई थी. अभी तो मात्र सत्रह साल हुए हैं. लगता है इस केस की भी त्रासदी भोपाल गैस कांड जैसे ही होने वाली है. वजह यह है की किसी को भी, यहाँ तक की भारत के प्रधान मंत्री कार्यालय को भी इस बात की जल्दी नहीं है कि दोषी को सजा मिले. मुंबई ब्लास्ट के समय भारत के प्रधान मंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव थे. इनके पश्चात अब तक पांच प्रधान मंत्री बने – अटल बिहारी वाजपेयी, एच. डी. दवेगौड़ा, इन्दर कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और फिर डॉ. मनमोहन सिंह. दुर्भाग्यवश सबों ने कागजी घोड़े अधिक दौडाए. परिणाम आपके सामने है. अब अबू सलेम का भारत आना भी एक “संदेह के घेरे में आ रहा है”, कहीं ऐसा तो नहीं की अंडर वर्ल्ड के दवाव के कारण और अपनी जान बचाने हेतु उसने भारत आना ज्यादा बेहतर समझा, बशर्ते पुर्तगाल में रहने के. अबू सलेम अंडर वर्ल्ड के निशाने पर है, इस बात को सी.बी.आई. भी मानती है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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