माफ करना आमिर, हमें दारू पीने, पोर्न क्लिप देखने और हराम की कमाई करने से फुर्सत न थी…

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-निमिष कुमार-

माफ करना आमिर, एक आम भारतीय नहीं जानता कि हर साल सरकारी खजाने के कितने हजार करोड़ रुपये स्वास्थ्य मंत्रालय और भारत सरकार आम भारतीय को जागरुक करने पर खर्च कर देती है। ये तो तब पता चलेगा जब इसका पर्दाफाश होगा कि इसमें कितने करोड़ का घोटाला हो रहा है। माफ करना आमिर, हमें तो पता ही नहीं था कि हम अब तक तीन करोड़ बेटियों को कोख में ही मार चुके हैं। दरअसल सरकारी जागरुकता का ठेका मंत्री-संतरी के किसी जानने-पहचानने वाले को मिल जाता है। और फिर वो अपने दो कौड़ी के महान दिमाग से जितना देश को जागरुक कर सके, कर देता है। यदि वाकई में सरकारी प्रयास इतने ईमानदार होते तो 6 मई, 2012 को रविवार की उस सुबह 11 बजे से साढ़े बारह बजे के बीच डेढ़ घंटे का वो टीवी कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ हम सबके ज़मीर को इस तरह लतियाकर नहीं उठा देता।

माफ करना आमिर, हम अपने मकान बनाने में, अपनी बीबी के गहने बनवाने में, सास और ससुराल की बुराई करने में, बॉयफ्रेंड और गर्लफ्रेंड के साथ सेक्स करने के जुगाड़ में, बॉस को मक्खन लगाने में, अपने कम्प्यूटर पर विदेशी पोर्न क्लीप देखने में, समाज से छिपकर दो-तीन पैग लगाने में और कैसे भी हो, खूब सारा हराम का पैसा कमाने में व्यस्त हो गए थे।

माफ करना आमिर, हमें नहीं पता था कि हमारे आस-पास खूब माल छापने याने पैसा कमाने की होड़ हमने ऐसी पैदा कर दी थी कि भगवान के समान जिंदगी देने वाले डॉक्टर्स यमराज को भी शर्मिंदा करने लगे थे।

माफ करना आमिर, तुम्हारा टीवी कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ देखकर हम हिंदुस्तानियों की आंखों से झूठ, दंभ और खालिस मूर्खता का चश्मा उतरा कि बेटियों को कोख में मारने का धंधा गांवों में चलता है और सारे के सारे अनपढ़, गरीब, मेट्रों से दूर लोग ये घृणित काम करते हैं। हमने बड़ी बेशर्मी से इस झूठ को बरसों से ना सिर्फ माना, बल्कि खुद को तीसमारखां समझते हुए, इतराकर गांवों में रहने वाले अनपढ़, गरीब लोगों पर अपने पापों की गंदगी से भरा घड़ा फोड़ दिया। माफ करना आमिर, कि तुम्हें हमारी तमाम झूठी दंभभरी बातों को सरेआम 6 मई, 2012 को पूरे देश के सामने नंगा करना पड़ा। बताना पड़ा कि हम दिल से, दिमाग से कितने काले हैं।

माफ करना आमिर, हम भूल गए थे कि हमारे आस-पास शहरों-कस्बों में कुकरमुत्तों की तरह उगने वाले क्लीनिक, निजी अस्पताल कैसे दिन-ब-दिन और आलिशान होते जा रहे थे।

माफ करना आमिर, वर्माजी, शर्माजी के नाती-पोते के नामकरण संस्कार में जाते वक्त हम ये पूछना तो भूल ही गए कि इस लड़के के लिए पहले कितनी बेटियां कोख में ही कत्ल कर दी गईं। हम तो गरम-गरम गुलाब जामुन खाने, उनके नए घर, उनके बेटे की नौकरी, उनके बेटे के लड़के का बाप बनने की चर्चा में ही मशगूल रहे।

माफ करना आमिर, उस लेडी डॉक्टर की कहानी सुनकर हम आम भारतीय दंग रह गए। जो बरसों से हमारे आस-पास होती रही और हम अपने घर की दीवारों के बाहर की दुनिया से पूरी तरह अलग बस अपने ही बारे में सोचते रहे। जिसका पति डॉक्टर, ससुर दिल्ली विश्वविद्यालय का प्रोफेसर, सास एक स्कूल की वाइस प्रिंसिपल, ननदें- एक डॉक्ट्रेट तो दूजी टीचर हो, ऐसे महा-सभ्य कहे जाने वाले महानुभाव भी दो मासूम नवजात बच्चियों से इतनी घृणा कर रहे थे कि उन्हें मार डालने पर उतारु थे।

माफ करना आमिर, हम नहीं जानते कि ग्वालियर की उस गरीब महिला जिसका पति दरिंदा हो गया था। शायद आज भी जिंदा होगा। समाज में बिना सजा पाए या थोड़ी बहुत सजा पाकर घूम रहा होगा। लेकिन उस महिला को जानने वाला समाज, पुलिस, प्रशासन और कानून व्यवस्था अब तक चने भून रहे थे।

माफ करना आमिर, कि तुम्हारी रविवार की वो डेढ़ घंटे की प्रस्तुति ने हमारे रोंगटे खड़े कर दिए। और अपने आलिशान घरों के एसी कमरों में अपने लैपटॉप पर बैठकर हमने सोशल मीडिया साइट्स पर अपनी खूब भड़ास निकाली।

माफ करना आमिर, हम सड़कों पर नहीं उतरे, हमने अपने सांसदों-विधायकों-पार्षदों से इस सबका हिसाब नहीं मांगा, हमने प्रवचन की डफली बजाकर करोड़ों कमाने वाले बाबाओं को नहीं कहा कि अपने अंधे हुए जा रहे करोड़ों भक्तों को कहो कि बेटियों को कोख में मारने का ये गंदा धंधा बंद करो। उसमें वो डॉक्टर्स भी होंगे, वो नर्स भी और दवाइयां बेचने वाले वो तमाम यमदूतों के सगे भी।

माफ करना आमिर, तुम्हारे प्रोग्राम के बाद हम सबने खूब गाल बजाए। सोशल साइट्स पर लिखा। टीवी चैनलों के पैनलों में जाकर अपना ज्ञान दिया। घर के बाहर और अंदर की बहसों में खूब गरजे। लेकिन हमेशा की तरह हम फिर चुप हो जाएंगे। क्योंकि हमें फिर याद आएगा हमारा घर, बीबी के गहने, सास-ससुराल की बुराई, वही बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड, वहीं सब।

माफ करना आमिर, क्योंकि हम, हमारी सरकारें, हमारा समाज, सब इतने साल से चने भून रहा था, वो भी ठंडे हो चुके भाड़ में।

एक भारतीय।

 

 (लेखक निमिष कुमार इन.कॉम की हिंदी शाखा के संपादक हैं।)

About Post Author

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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