छात्र-छात्राओं द्वारा पंखे से लटककर जीवन समाप्त करने की बढती दर – Suicide: Part- 2

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अभिभावकों से अनुरोध 

बच्चों के परीक्षा-दवाव को ‘मित्र-वत’ बाटें  : चार साल में नौ हज़ार से अधिक जाने गयीं, पंखे से लटककर जीवन-अंत करने की प्रथा छात्र-छात्राओं में अधिक प्रचलित

मेरा मानना है: जिस तरह एक्स्केलेटर अधिक भार को उठाने में अपनी असमर्थता दिखाता है और एक अलार्म के साथ उपभोक्ताओं को सचेत करता है  कि एक्स्केलेटर पर वजन घटायें, संभव है, आने वाले दिनों में ,छात्र-छात्राओं द्वारा पंखे से लटककर जीवन समाप्त करने की बढती दर को मद्दे-नजर रखते कोई ऐसी तकनिकी का विकास हों, जिससे पंखे पर उसके उपयुक्त भार से अधिक भार होने पर वह टूट जाये और आत्म-हत्या का प्रयास विफल हों 

-शिवनाथ झा||
आप माने या नहीं लेकिन यह सच है की पिछले पांच वर्षों में नौ हज़ार से अधिक छात्र-छात्राओं ने सिर्फ परीक्षा में अपनी असफलता के कारण इश्वर द्वारा प्रदत्त अमूल्य तौह्फे को रौंद कर अपने जीवन का अंत कर लिया. इनमे नब्बे से अधिक फीसदी मामलों में मृतको ने पंखे का उपयोग किया और उससे लटककर आत्म-हत्याएं की हैं.
जाहिर है, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और अन्य शोधकर्ताओं का ध्यान इस ओर नहीं गया है अब तक, नहीं तो शायद यह कीमती जानें बच सकती थीं.
वैसे सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक (2000-2010) में कुल एक लाख चौंतीस हज़ार पांच सौ निनानबे लोगों ने आत्म-हत्या कर अपनी जीवनलीला को समाप्त किया, लेकिन इन आकंड़ों में पिछले पांच सालों में मात्र छात्र-छात्राओं का जो प्रतिशत है, वह माता-पिता और अभिभावक के अतिरिक्त सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और अन्य शोधकर्ताओं सहित देश के सभी शैक्षणिक संस्थाओं के लिए एक चिंता का विषय भी होना चाहिए.
भारत में आत्म-हत्याओं के विभिन्न कारणों में चाहे वह बीमारी हों, या सामाजिक प्रतिष्ठा का गिरना, या गरीबी, या बेरोजगारी या फिर पारिवारिक-कलह, आंकड़े  पारिवारिक-कलह के काफी ऊँचे हैं. पिछले 2008 से 2011 तक ज्यादा नहीं, सिर्फ एक लाख इक्कीस हज़ार सात सौ पंद्रह लोगों ने पारिवारिक-कलह के कारण आत्म-हत्याएं की है, जिनमे महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों की संख्या साठ से ज्यादा फीसदी है. यहाँ भी, मनोवैज्ञानि और समाज शास्त्री इस बात को मानने सेंकर नहीं करेंगे की पारिवारिक-कलह भी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से भारत के छात्र-छात्राओं में बढ़ते आत्म-हत्याओं की प्रक्रिया में सहायक होते हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के महा-निदेशक एन.के.त्रिपाठी आत्म-हत्याओं की बढती दर को एक “चिंता का विषय” मानते है. उनका मानना है कि यह न केवल समाज और नीति-निर्धारित करने वाले लोगों के लिए एक सोच का विषय है, बल्कि, इसलिए भी की सरकार इन व्यक्तियों को जीवन यापन करने के लिए एक स्वस्थ परिवेश देने के लिए प्रतिवद्ध और वचनवद्ध दोनों है, साथ ही, ऐसी आत्म-हत्याओं से समाज और परिवार को भारी नुकसान होता है.
क्यों करते हैं बच्चे आत्म हत्याएं? मनोवैज्ञानिकों का मानना है की आत्म-हत्या करने का निर्णय एक ‘फ्रिक्शन ऑफ़ सेकेण्ड का निर्णय’ है, जब बच्चों अथवा बड़ों का मन बिलकुल हताश हों जाता है. हताश होने के बहुत सारे कारण हों सकते हैं लेकिन किसी भी परिस्थिति में उनका आत्म-विश्वास टूटना या फिर परिस्थितियों का सामना करने की मानसिक विफलता अधिक महत्वपूर्ण होता है. उस वक़्त ‘अच्छे’ या ‘बुरे’ का निर्णय करने में वे विल्कुल नाकाम होते हैं. कभी-कभी वे यह भी सोचते है हों शायद ऐसा करने से सभी परिस्थितियां ‘अनुकूल’ हों जाएँगी. जब की ऐसा होता नहीं. “जीवन का अंत किसी भी स्थिति में समस्याओं का समाधान नहीं हों सकतापिछले दिनों दिल्ली में हुए एक कार्यशाला में वक्ताओं ने मूलरूप से इशारा परिवार और कार्यस्थल, चाहे वह शैक्षणिक संस्थाएं ही क्यों ना हों, की ओर इशारा किया. उनका मानना था कि ‘इस मनोदशा की उत्पत्ति अधिकाशतः परिवार से होती है, जहाँ विभिन्न परिस्थितियों में बच्चे या तो अपने आप को उपेक्षित पाते हैं, अथवा, उनपर परिवार (विशेषकर माता-पिता की अतृप्त इक्षाओं का) इतना दवाव होता है कि वे सही अथवा गलत का निर्णय लेने में बिलकुल असहाय हों जाते है. यही बात, बड़ों के साथ भी लागु होती है, लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर यह् होता है कि बड़ों में मानसिक दवाव अन्य कारणों से भी होता हैं, जिसमे पारिवारिक कलह एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.

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पिछले पांच वर्षों में विभिन्न कारणों से भारत में होने वाली आत्म-हत्याएं..
1. आर्थिक दिवालियापन            13,841
2. अवैध सम्बन्ध                     6140
2. परीक्षा में असफलता               9000
4. प्यार-मोहब्बत                    18,991
5. प्रोफेशनल/करियर समस्या         5396
6. बीमारी                           1,34,605
7. गरीबी                               14,530
डॉ. विनय अग्रवाल कहते हैं की “आम तौर पर परिवार में कलह, चाहे संयुक्त परिवार ही क्यों न हों, परिवार का कोई भी सदस्य अपनी किसी एक गलती को छिपाने के लिए एक अलग तरह का व्यवहार करने लगता है, जो सामान्य नहीं होता. उसका यह असामान्य व्यवहार प्रायः शक के दायरे में आ जाता है और फिर शुरू होती हैं कलह. यह क्रिया-कलाप अक्सर पति -पत्नी के बीच ज्यादा दिखता  है, जो न केवल बच्चों की मानसिक दशा को नकारात्मक तरीके से प्रभावित करता है बल्कि अंत में आत्म-हत्या करने की ओर भी उन्मुख करता है. इनमे अधिकांशतः पुरुष ही आगे होते हैं. पिछले वर्ष 2011 में कुल 33,000 ऐसी आत्म हत्याएं हुयीं जिसमे  पुरुषों की संख्या पैसठ फीसदी से ज्यादा था. इतना ही नहीं, यदि देखा जाये, तो महिलाओं द्वारा (छात्र-छात्राओं को छोड़कर) आत्म-हत्या करने की प्रवृति समाज में कम है.”
भारत में आत्म-हत्या करने की घटना में सड़कों पर गोलगप्पे की तरह उपलब्ध “प्यार-मोहब्बत” होने की प्रथा भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह मोहब्बत करने/होने का प्रचलन सिर्फ युवक और युवतियों में ही नहीं, बल्कि शादी-शुदा पुरुष और महिलाओं में भी प्रचलित है. एक ही बस/रेल में सफ़र करते-करते, एक ही दफ्तर में एक साथ कार्य करते-करते, किसी की परेशानी की स्थिति में मदद और उसके बाद उसे ‘अवांछित’ प्यार में परिवर्तित कर देना, और ‘अपेक्षित प्यार’ नहीं मिलने पर आत्म-हत्या कर लेना, यह आज के सामाजिक परिवेश में आम बात हों गयी है. भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2008 में कुल तीन हज़ार सैट सौ चौहत्तर लोगों ने “प्यार के लिए जीवन समाप्त किया’, जिसमे पुरुषों ने ज्यादा जाने (एक हज़ार नौ सौ दो) दीं, जबकि सिर्फ एक हज़ार आठ सौ बासठ महिलाओं ने प्रेम के लिए आत्म-हत्या की. अगले वर्ष, यानि 2009, में दोनों की संख्याओं में इजाफा हुआ: कुल एक हज़ार नौ सौ सत्ताईस पुरुषों ने आत्म-हत्या की जबकि मात्र एक हज़ार सात सौ चौरासी महिलाएं प्रेम के लिए बलिदान हुई. इस क्षणभंगुर प्यार ने धीरे-धीरे अपनी बढ़त बनाये रखी और 2010 में कुल चार हज़ार एक सौ छियासठ   लोगों (पुरुष: दो हज़ार दो सौ सोलह और महिलाएं:एक हज़ार नौ सौ पचास) लोगों की क़ुरबानी ली. काश, ये सभी “लैला-मजनू” जीवन से मुहब्बत करते !
भारत में लोगों का आर्थिक दिवालियापन भी एक महत्वपूर्ण कारण है जो लोगों को, विशेषकर पुरुषों को, मृत्यु की द्वार तक ले गया है. वैसे इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है की दिखावे की जिन्दगी जीने की इस होड़ में पिछले कई वर्षों में बहुमूल्य जाने गयी. आर्थिक समीक्षकों और मनोवैज्ञानिको का मानना है की भारत में औसतन सौ में से मात्र पांच ही व्यक्ति ऐसे होंगे जिनपर बित्तीय संस्थानों और बैंकों का कर्ज नहीं होगा. हालाँकि, इन बित्तीय संस्थानों और बैं%

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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