शैक्षणिक संस्थाओं में क्यों हो रही है ख़ुदकुशी? पार्ट:1

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जनहित में: आयें एक स्वस्थ मानसिकता बनायें…

नियंत्रण-रेखा सिर्फ भारत  की सरहदों पर नहीं, घर  की चौखटों पर भी होती है, देखिये  कहीं आपके बच्चे आपकी आँखों में धूल झोंक कर उसे लाँघ तो नहीं रहे हैं?
-शिवनाथ झा||
सदियों पहले और आज भी गाँव के दालान पर बैठे बृद्ध माता-पिता शहरी दुनियां की चमक-दमक में मग्न अपने “ना मानने वाले संतान को” अक्सर कहते हैं: “अगर बाँध ना हों, यानि नियंत्रण का अभाव हों, तो पानी और संस्कार का बहाव नीचे की ओर होता है. अगर शक है, तो आजमा कर देखो.” बीस शब्दों का यह ग्रामीण विचार, शहरों क्या आने वाले दिनों में चन्द्रमा पर भी निवास करने वाले मानव के लिए भी “ब्रह्म वाक्य” ही माना जायेगा, चाहे आज की इस वैज्ञानिक और भाग-दौड की जिन्दगी में लोग कितने ही दलील दें. आप क्या कहते हैं?
नियंत्रण शब्द को आधुनिक भाषा में अनुशासन भी माना जा सकता है. अनुशासन, चाहे बच्चों का हों, या बच्चों के माता-पिता और अभिभावक का. अनुशासन और सामाजिक बंधन एक केश की तरह बारीक़ जो जीवन का मंत्र सिखाता है. अनुशासन का पालन करना सिर्फ शैक्षणिक संस्थाओं, जहाँ आये दिन बच्चे अपने जीवन जो दावं पर लगाकर आत्म-हत्याएं भी कर बैठते हैं, या कार्यालयों के लिए लागु नहीं होता, इसकी बुनियाद तो परिवार है जहाँ माता-पिता-और उनके बच्चे एक साथ रहते हैं. यही बच्चे स्कूल में अपने शिक्षकों और अधिकारीयों के साथ समय गुजारते हैं. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अनुशासन शब्द का दायरा इतना सिमट गया है, जहाँ जीवन और मृत्यु का सबाल हों.
मनोवैज्ञानिक और सामायिक दृष्टि से एक बच्चा छः से सात घंटे ही अपने शैक्षणिक संस्थानों में रहता है, शेष समय घर पर, यानि अट्ठारह घंटे घर या समाज के अन्य लोगों के सानिध्य में. मनोवैज्ञानिकों का मानना है की माता-पिता के व्यवहार और तौर-तरीके, जहाँ एक बच्चा अट्ठारह घंटे से अधिक समय बिताता है, बच्चों के मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक विकास पर गहरा छाप छोड़ते है.
मनोवैज्ञानिक यह भी कहते हैं की “अनुशासन का सीधा सम्बन्ध भय से होता है और जो भय “सकारात्मक” हों”. भय के बिना अनुशासन बनाये रखना मुश्किल ही नहीं, दुर्लभ है. कार्यालय में काम करने वाले कर्मी अपने सीनियर से इसलिए डरते हैं कि कहीं उनकी कलम से उनकी नौकरी पर सामत ना आ जाये. राजनेता अपने पार्टी के अध्यक्ष से इसलिए डरते हैं की कहीं नाराजगी में उन्हें पार्टी से निष्काषित ना कर दे. पुलिस की वर्दी पहनने वाले ठुल्ले अपने सीनियर अधिकारी को इसलिए नाराज नहीं करना चाहता है, चाहे उसे उस अधिकारी की पत्नी का “अंडर गारमेंट्स” ही साफ़ करना पड़े उसे या अपनी बीमार पत्नी की सेवा सुशुर्षा करने के वजाय अधिकारी की पत्नी के लिए बाज़ार से साग-सब्जी ही क्यों ना लाना पड़े. यही सत्य है.
दुर्भाग्य यह है की भारत के १२३ करोड़ आवाम (१०,००० राजनेताओं को छोड़कर जो दिल्ली के रायसीना हिल से उत्तर-पूर्वी राज्यों के विधान सभा और विधान परिषद् में बैठे हैं) मानसिक रूप से “नपुंसक” हों गए हैं, जिनके पास “जीवन जीने के अलावा  और कोई सूझ नहीं है, चाहे उनका संतान वर्तमान शिक्षा प्रणाली से त्रस्त हों कर, शैक्षणिक संस्थानों में दोस्तों के कटाक्ष सुनकर, सड़कों पर गोलगप्पे की तरह बिकने वाले ‘तथाकथित प्रेम’ के जाल में फंसकर/फंसाकर, या अपनी कमजोरी को दूसरों के मत्थे मढ़कर आत्म हत्या ही क्यों ना कर ले ? कहाँ  हैं माता-पिता या अभिभावक, जिन्हें इन सब बातों के बारे में सोचने और सुनने का फुर्सत ही नहीं है.
भारत में कुल साढ़े बारह लाख से अधिक शैक्षणिक संस्थाएं हैं जिसमे करोड़ों बच्चे अपने भविष्य के साथ होते खिलवाड़ को झेल रहे हैं लेकिन उनके इस कष्ट को सोचने या कम करने वाला कोई नहीं है, यहाँ तक कि उनके माता-पिता और अभिभावक भी नहीं. अगर आंकड़ों को देखा जाये, तो भारत के माध्यमिक स्तर तक के शैक्षणिक संस्थाओं में प्रतिमाह होने वाले शिक्षक-अभिभावक मीटिंग (पी.टी.ऍम) में १८ से ज्यादा फीसदी माता-पिता नहीं जाते हैं और बच्चों को “नोट” दिया जाता है. अस्सी से ज्यादा फीसदी मामलों में सिर्फ माताएं ही उपस्थित होती हैं. माता-पिता एक साथ इस मीटिंग में उपस्थित हों इसकी फीसदी चौदह फीसदी से अधिक नहीं है.
अब सोचिये, पिता कभी पी.टी.ऍम में नहीं जाता है, नब्बे से अधिक फीसदी मामलों में स्कूली डायरी में माता का ही हस्ताक्षर होता है, क्योकि पिता के पास ‘समय का अभाव है’, साठ से ज्यादा फीसदी मामलों में शहरी और मेट्रो पोलिटन क्षेत्रों में बच्चों को (विशेषकर सरकारी अधिकारीयों, मंत्रियों, राजनेताओं और अन्य गणमान्य व्यक्तियों के बच्चों को) या तो उनका ड्रायवर या फिर नौकर/नौकरानी स्कूलों तक छोड़ने जाते है. फिर कैसे उम्मीद करते हैं ये माता-पिता और अभिभावक की संतानों में उन सब गुणों का समावेश होगा तो उनके पुरुखों में थी.
आप माने या नहीं, लेकिन सत्य यही है: आज के बदलते युग में, जहाँ शिक्षा को “रंडी के स्तन” की तरह अपनी राजनितिक वासना की पूर्ति के लिए राजनेताओं द्वारा उपयोग किया जाता है और प्रत्येक वर्ष हजारों, लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्य के साथ किया जाता है खिलवाड़. लेकिन कभी भी माता-पिता या अभिभावक शिक्षा नियमों में होने वाले प्रयोग के विरुद्ध कभी चूं तक आवाज नहीं निकलते – यह अलग बात है की समाज के तथाकथित ठेकेदारों के आह्वान पर उन्ही छात्र-छात्राओं के माता-पिता और अभिवावक बच्चों के भविष्य की परवाह किये बिना दिल्ली के जंतर मंतर से लेकर मुंबई के मैदान तक लंगोटा कसकर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने पहुँच जाते हैं.
सन १९४७ में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में २८ शिक्षा मंत्री  हुए और २५ से अधिक बार शिक्षा के क्षेत्र में, विशेषकर माध्यमिक और उच्चत्तर माध्यमिक शिक्षा में विभिन्न प्रकार से प्रयोग किये गए. समाज शास्त्रियों, शिक्षाविदों  और समाज के अन्य  तथाकथित ठेकेदारों ने हमेशा अपने स्वार्थ  की सिद्धि के लिए सरकार और शासन का साथ दिया. इन ६५ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र  में जितने प्रयोग हुए सभी प्रयोग राजनितिक दृष्टि से किया गया ताकि  चुनाव  में वोट  मिल  सके.
यदि देखा जाये तो सन १९७१-१९७२ जब श्री सिद्धार्थ शंकर राय केंद्रीय शिक्षा मंत्री बने उनके पश्चात् सभी सिक्षा मंत्रियों ने शिक्षा जगत को नस्त्नाबुद कर दिया. कपिल सिबल और उनके चमचों द्वारा बनायी गयी नई शिक्षा प्रणाली ने तो भारतीय शिक्षा व्यवस्था के साथ इस कदर बलात्कार किया कि भारतीय संस्कृति की गुरु-शिष्य परंपरा सड़कों के चौराहे पर नग्न अवस्था में खड़ी है. लेकिन कहाँ चिंता है माता-पिता या अभिवावक को, जो अपने बच्चे के भविष्य और जीवन को देखकर सड़कों पर उतरें इस शिक्षा प्रणाली के खिलाफ?
इस बात की पुष्टि वर्तमान मानव संसाधन मंत्री कपिल सिबल ने अधिकारिक तौर पर कर दी. उनका कहना है “शिक्षा सभी को मिले, यह अलग बात है की वह छात्र-छात्र उस शिक्षा-व्यवस्था के अनुकूल है या नहीं. परिवार सबसे बड़ा स्कूल है, एक माता-पिता को सबसे पहले अपने बच्चों की काबिलियत का ज्ञान होता है, और उससे भी अधिक बच्चे स्वयं को माप सकते हैं. अगर कोई बच्चा इस लायक नहीं है लेकिन किसी अन्य कारणों से उस पर यह थोपा जाता है, तो इसका परिणाम भी भयावह ही होगा.” सुश्री संगमा द्वारा आत्म-हत्या इसका ज्वलंत उदहारण है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. जहाँ स्कूल प्रिंसिपल बच्चों को माइक पर सिखाते हैं ‌-” हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, बड़ों के पाँव छूना गुलामी की निशानी है…………”
    सच कहा मित्र आपने – पूरे देश का वही हाल है- गुजरात के रिलायंस टाउनशिप में आज(11-4-13) को हैदराबाद के मूल निवासी मि.अकबर नाम के के.डी.अम्बानी विद्या मंदिर में कार्यरत एक फिजिक्स टीचर ने आत्महत्या कर लिया है, पर रिलायंस वाले उसे हाइवे की दुर्घटना बनाने में लगे हैं, आसपास की जनतांत्रिक संस्थाएँ रिलायंस की हराम की कमाई को ड्कार के सो रही हैं। शिक्षक जैसे सम्मानित वर्ग के साथ जब ये हाल है तो आम कर्मचारी कैसे होंगे ? आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं ।पहले भी एक मैथ टीचर श्री मनोज परमार का ब्रेन हैमरेज स्कूल मीटिंग में ही हो गया थ। मैंने पहले ही सावधान किया था पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और 30 साल के एक नौजवान को हम बचा नहीं पाए सब उस कत्लखाने में चले आते हैं काश लोग लालच में न आते बात को समझ पाते………. पाकिस्तानी बार्डर के उस इलाके में जहाँ स्कूल प्रिंसिपल बच्चों को हिंदी दिवस के दिन माइक पर सिखाते हैं ‌-” हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है, बड़ों के पाँव छूना गुलामी की निशानी है, गाँधीजी पुराने हो गए उन्हें भूल जाओ, सभी टीचर अपनी डिग्रियाँ खरीद कर लाते हैं तथा आपके माँ-बाप भी डाँटें तो पुलिस में केस कर सकते हो।” असहमति जताने पर 11सालों तक स्थाई रूप में काम कर चुके आकाशवाणी राजकोट के वार्ताकार तथा सबसे पुराने योग्य-अनुभवी हिंदी शिक्षक/ शिक्षिकाओं व उनके परिवारों को बड़ी बेरहमी से प्रताड़ित करके निकाला जाता है। स्थानीय विधायकों, रिलायंस अधिकारियों के साथ-साथ धृतराष्ट्र की तरह अंधी राज्य सरकार भी बार-बार निवेदन के बावजूद भी कोई कार्यवाही नहीं करती है… हैं ना गाँधी जी के बंदर…और वे भी संसद की सबसे बड़ी कुर्सी के दावेदार ……… Contact For Detail :- 9428075674, [email protected]

  2. ~!~अब हमे विशलेषण कर लेना चाहिए कही हम वर्तमान शिक्षा से कही आर्थिक गुलाम तो नही बना रहे कही अपने लाडले को? जो शिक्षा स्वाभिल्मवी बनाने के वजाय बस गुलामी में ढकेलती हो कही? शिक्षा जो गुलाम बनाए , आधुनिकता में सब उसी को अपनाए….अपनाते -अपनाते बहुत समय बीत गया……अब एस के विशलेषण पर आ जाए……..इन माननीयों से कहो बंदर – बाट अब बंद करे अब शवेत पत्र लाये वो कब लायेगे? कही उल्टी दिशा में तो नही भेज रहे हम अपने नोनिहालो को? उदाहरण के लिए आज युवा MBA करके माल में खड़ा होकर टाई लगाकर सब्जी बेचना पसंद कर लेता है पर शायद उसे अपना ठेला लगाने में शर्म आती हो? वही दुसरी तरफ MBA भी करने वाले मुम्बई के डिब्बा वालो से उनका मैनेजमेंट सीखने आते हैं क्यों? दुसरा उदाहरण एक समय जब स्कूलों में क्राफ्टिंग (पुस्तक – कला )पठाई जाती थी जो लोगो का आज पेट पालने का काम कर रही हैं? इस कपिल सिम्बल की तो वो दुर्गत होगी की इस ने जो शिक्षा का बजारीकर्ड किया हैं इस की सजा मिलेगी जरूर मिलेगी बस समय का इंतजार करो?

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