सरकार की अनदेखी से खफा एक जासूस

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महबूब इलाही – भारत के पूर्व जासूस

 

मैं लगभग 20 साल तक पाकिस्तान की जेल में कैद रहा. मुझे 23 जून 1977 को गिरफ्तार किया गया और मेरी रिहाई एक दिसंबर 1996 को हुई.

मैं पूर्वी कमान के सेना मुख्यालय फोर्ट विलियम के सैन्य खुफिया विभाग के साथ जुड़ा हुआ था.

महबूब इलाही ने कई साल तक पाकिस्तान में भारत के लिए जासूसी की.

पहले मुझे 1968 में ढाका भेजा गया. वहां मैंने कई साल तक काम किया और वहीं से पाकिस्तान गया.

ढाका में हालात तेजी से बदल रहे थे. भारतीय सेना के लोग वहां थे. हमारे जैसे जासूस भी थे. बहुत सावधानी से काम करना पड़ता था.

1971 में बांग्लादेश युद्ध शुरू होने से दो महीने पहले मुझे कराची जाने का आदेश मिला. मुझे कहा गया था कि मैं वहां जाकर पाकिस्तानी सेना में भर्ती हो जाऊं.

पाक सेना में भर्ती

आदेश मिलते ही मैं चटगांव पहुंच गया और वहां से विमान के जरिए कराची पहुंचा.

एक महीने तक मैंने कराची में लोगों से संपर्क बनाए. इलाके को पहचाना और इसके बाद पाकिस्तानी सेना की इंजीनियरिंग शाखा ईएमई में भर्ती हो गया.

मुझे ऊर्दू बोलना और पढ़ना आता था. कायदे कानून भी पता थे. मैंने सेना में भर्ती होते समय बताया कि ढाका में मेरे सारे कागजात नष्ट हो गए.

बंटवारे के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास का माहौल रहा है.

जब मेरा पता पूछा गया तो मैंने अपने एक मामा का पता दे दिया. उस समय कोई ये जांच नहीं करता था कि पता सही है या गलत.

मैं ईएमई की वर्कशॉप में काम करता था. वहां मैं ज्यादा कुछ जासूसी नहीं कर पाया. जासूसी करने के लिए तो कुछ फाइल वगैरह हाथ लगनी चाहिए.

मैंने जनरल ड्यूटी ब्रांच में अपना तबादला करवा लिया. मैं खत लाने-ले जाने और फाइलों को संभालने का काम करता था. इन सब कामों को करते हुए मुझे खबरें भी मिलने लगीं.

पेशावर, सरगोदा और मियांवली जैसी कई सारी जगहों पर मेरी तैनाती हुई. खबर जुगाड़ने के बाद मुझे काबुल के पास तोरखाम सीमा तक जाना पड़ता था. वहीं पर हमारा मूल दफ्तर था.

आईएसआई को शक हुआ

पाकिस्तानी सेना और वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई को मुझ पर उस वक्त शक हुआ जब मैं चीन सीमा पर काम रहा था. वहां पर एक सड़क बन रही थी.

एक दिन बटालियन में आईएसआई का एक पत्र आया जिसमें मुझे छुट्टी न देने का निर्देश था. वे लोग छानबीन के लिए आने वाले थे.

बटालियन का हेड क्लर्क एक मुहाजिर (बंटवारे के बाद भारत से जाकर पाकिस्तान में बसने वाले लोग) थे. उन्होंने मुझे बताया कि क्या हुआ है और आईएसआई के लोग क्यों आ रहे हैं.

मैं रातोंरात वहां से भाग निकला और कुछ दिनों में सीमा पार करके वापस कोलकाता पहुंच गया. दो महीने के बाद मुझे फिर जाने के लिए कहा गया.

भारत और पाकिस्तान में अकसर एक दूसरे की जासूसी के आरोपों में गिरफ्तारियां होती रहती हैं.

कसूर सीमा से कुछ खबरें भी लाने थीं. इसके अलावा मेरे कुछ कागजात वहां रह गए थे जिन्हें लाना था.

जब मैं कसूर वाले काम को लगभग पूरा करने वाला था, उस समय हमारे एक एजेंट कश्मीर लाल शर्मा के घर में मुझे तीन आदमी मिले. मुझे शक हुआ कि वे आईएसआई के लोग हैं और कश्मीर लाल डबल एजेंट हैं.

मैंने बीएसएफ की चौकी पर खबर भेजी, लेकिन शर्मा ने उन तीनों को भगा दिया था.

लाहौर में पकड़ा गया

इसके बाद जब मैं खबर जुटाने के लिए लाहौर गया तो वहां कश्मीर लाल ने मेरी पहचान उजागर कर दी. मैं पकड़ा गया. ये बात 20 जून 1977 की है.

मैं 619 फील्ड इन्वेस्टिगेशन यूनिट (एफआईयू) को सौंपा गया. लाहौर छावनी के पास उसकी यूनिट थी. वहीं पर पूछताछ भी हुई और मुझे यातनाएं भी दी गईं.

मेरी कोठरी में कई गार्ड्स आए. मेरे सारे कपड़े छीन लिए गए. मुजे नंगा रहना पड़ा. मेरी बुरी तरह पिटाई भी होती थी. और मेरे शरीर को जलाया गया.

जब वे लोग मुझे पीटते थे तो मैं उन्हें गालियां देता था. इसमें दो फायदे होते थे. एक तो जो आदमी पीट रहा था, वह थोड़ा सा डर जाता और दूसरा, मुझे दर्द कुछ कम महसूस होता था. लेकिन बाद में दर्द का पता चलता था.

लगभग छह महीने तक मझे यातनाएं दी जाती रहीं.

उसके बाद मुझे 16वीं पंजाब रेजिमेंट भेज दिया गया. उस रेजीमेंट के क्वॉर्टर गार्ड में मैं बंद था.

इलाही ने पाकिस्तान के कई शहरों में जासूसी की.

तीन साल के बाद मुझे अदालत में पेश किया गया. 1980 में मेरा मुकदमा खत्म हुआ और मुझे 14 साल की सजा सुनाई गई.

सरकार से नाराजगी

सजा मिलने के बाद ही मेरे वरिष्ठ अधिकारियों को मेरे बारे में पता चला. कोलकाता में अपने परिवार के पास मैंने चोरी छिपे एक पत्र भेजा.

कराची जेल में ही मुझे दो और जासूस मिले. कई और भी थे. वहां 1965 और 1971 के कई युद्ध बंदी भी थे. अब वे लोग जीवित हैं या नहीं, यह कह पाना मुश्किल है.

कई लोग तो जेल में ही मर गए और कई पागल हो गए थे.

विदेश में जासूसी करते हुए अगर कोई पकड़ा जाता है तो भारत सरकार उससे पल्ला झाड़ लेती है. यहीं हम पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता, तो यह कैसे सोचा जा सकता है कि सरकार विदेश में पकड़े जाने पर कुछ करेगी.

मैंने इतने बरसों तक जेल की सजा काटी है लेकिन मुझे अब भी कोई पेंशन नहीं मिलती है.

मैं एक दिसंबर 1996 को रिहा हुआ. उस दिन 15 भारतीयों को छोड़ा गया. उनमें एक महिला जासूस और चार एजेंट भी शामिल थे. दो दिसंबर को सीमा पार करके हम लोग भारत पहुंचे थे.

(बीबीसी संवाददाता अमिताभ भट्टासाली से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी)

 

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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