इंडिया टुडे में दिलीप मंडल के ‘उभार’ पर चौंकाता है अजीत अंजुम का व्यंग्यबाण

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दिलीप मंडल इन दिनों एक बार फिर चर्चा में हैं। पत्रकार नहीं, फेसबुक ऐक्टिविस्ट नहीं संपादक दिलीप मंडल। देश की सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिका के संपादक की कुर्सी पर बैठने के बाद वे एक बार फिर थर्ड मीडिया के निशाने पर हैं। इंडिया टुडे के ताज़ा अंक के कवर पर उन्होंने एक महिला के वक्ष की तस्वीर क्या लगा दी, बवाल मच गया।

फेसबुक पर तथाकथित मनुवादी (अभिसेक्स मनु से संबंधित नहीं) मीडिया का असली चेहरा सामने लाने के बाद और मीडिया का अंडरवर्ल्ड जैसी किताब लिखने के कारण दिलीप मंडल ने जो पहचान बनाई थी उसे उन्होंने खुद ही बदल डाला था इंडिया टुडे के संपादक की कुर्सी संभाल कर।

हमेशा 5000 मित्रों (निंदक भी) और हजारों फॉलोवर्स से लबालब भरे रहने वाला उनका फेसबुक अकाउंट जिसपर वे दिनरात अकड़ के साथ अपने मित्रों को अनफ्रेंड करने की धमकी देते, क्रांतिकारी बहस करते रहते थे, वो रातोंरात लापता हो गया। किसी ने कहा, हैक हो गया, किसी ने कहा फेसबुक ने बैन कर दिया तो किसी ने राज खोला कि दिलीप मंडल ने खुद ही उसे खत्म कर दिया। जितने अकाउंट उतनी चर्चाएं। उनके निंदकों ने तो यहां तक कह डाला कि जिस ब्राह्मणवाद के विरोध के दम पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई थी, उसी के प्रतीक एक ब्राह्मण संपादक की सिफारिश हासिल कर उन्होंने इंडिया टुडे में नौकरी पाई।

खैर तब की तब थी, अब ताज़ा खबर ये है कि दिलीप मंडल के संपादकीय नेतृत्व में इंडिया टुडे ने देश में तेजी से बढ़ते ब्रेस्ट इंप्लांट या प्लास्टिक सर्जरी के ट्रेंड पर एक अंक प्रकाशित किया है। खबर सरसरी तौर पर कुछ डॉक्टरों के ऐडवरटोरियल जैसा है, जिसमें मुद्दे पर कम, और डॉक्टरों के क्लीनिक पर ज्यादा चर्चा की गई है। ज़ाहिर सी बात है कि जब ब्रेस्ट सर्जरी की बात होगी तो फूल-पत्तियों या फिल्मस्टार अथवा संसद की तस्वीर तो नहीं ही छपेगी। उधर थर्ड मीडिया में ये अंक खूब प्रचारित है।

यहां तक कि न्यूज़-24 के सर्वेसर्वा अजीत अंजुम भी उनपर व्यंग्यात्मक टिप्पणी करने से पीछे नहीं रह पाए। अजीत अंजुम ने फेसबुक पर लिखा है, ‘‘आप क्यों चाहते हैं कि केबिन और कुर्सी से दूर रहने पर दिलीप जी जो बोलते रहे हैं , वहीं संपादक के पद पर पदायमान होने पर भी बोलें ….उनकी चिंता और चिंतन में देश है ..समाज है ..दलित विमर्श है …मीडिया का पतन है …कॉरपोरेटीकरण है …लेकिन आप क्यों चाहते हैं कि जब वो इंडिया टुडे निकालें तो इन्हीं बातों का ख्याल भी रखें ….और आप कैसे मानते हैं कि ‘उभार की सनक’ जैसी कवर स्टोरी इन सब पैमाने पर खड़ी नहीं उतरती….”

उन्होंने आगे लिखा है, ‘‘वैसे भी दिलीप जी इसमें क्या कर लेते …इंडिया टुडे में नौकरी करते हैं न , फेसबुक पर ज्ञान वितरण समारोह थोड़े न कर रहे हैं …हद कर रखी है लोगों ने ….विपक्ष से सत्ता पक्ष में आ गए हैं लेकिन आप चाहते हैं कि अभी भी नेता विपक्ष की तरह बोलें -लिखें …गलती तो आपकी है कि आप दुनियादारी समझने को तैयार नहीं …दिलीप जी का क्या कसूर ….. हमने तो दिलीप जी रंग बदलते देखकर भी कुछ नहीं देखा है और आप हैं कि पुराने रंग भूलने को तैयार ही नही हैं ….अरे भाई , वक्त बदलता है …मौसम बदलता है …मिजाज बदलता है …रंग बदलता है तो दिलीप जी न बदलें”

ये कमेंट थोड़ा चौंकाने वाला था। ये वही अजीत अंजुम हैं जो कभी अपने कार्यक्रम ‘सनसनी’ में देश भर के ढोंगी बाबाओं की पोल खोल कर भारी प्रशंसा बटोर चुके थे और अब अपने चैनल के लिए निर्मल बाबा की टीआरपी के साथ-साथ विज्ञापन की भी ‘किरपा’ बटोर रहे हैं। कहने का यतलब ये नहीं कि अजीत अंजुम का व्यंग्य गंभीर नहीं था, लेकिन ये हर पाठक को सोचने को मजबूर जरूर कर रहा है कि खुद मौकापरस्ती की नाव पर सवार होने वाले को दूसरे की ‘अवसरवादिता’ पर उंगली उठाने का क्या हक़ है?

दिलीप मंडल पत्रकारिता ही नहीं, फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साइटों के पुराने खिलाड़ी हैं। वे तीनों मीडिया में काम कर चुके हैं। इंडिया टुडे में यह उनकी दूसरी पारी है। वे सीएनबीसी चैनल और एक बड़े मीडिया घराने के पोर्टल के लांचिंग टीम में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बार भी ये खेल बिना उनकी मर्ज़ी के नहीं हो रहा है। चाहे निंदा के तौर पर ही सही, इंडिया टुडे के इस ताज़ा अंक ने वो लोकप्रियता बटोर ली है जो पाठकों को बुक स्टॉल से पत्रिका खरीदने पर मज़बूर जरूर कर रही है। शायद यही दिलीप मंडल भी चाहते हैं।

About Post Author

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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19 thoughts on “इंडिया टुडे में दिलीप मंडल के ‘उभार’ पर चौंकाता है अजीत अंजुम का व्यंग्यबाण

  1. गलत कुछ नहीं होता हमारे विचार और हमारी सोच ही गलत होती है जिसे हम रात के अँधेरे में देखते हैं उसको दिन के उजाले में देखना क्यों पसंद नहीं करते और फिर हम उसको गलत ही निगाह से क्यों देखते हैं. सच तो ये हैं की हमारी मानसिकता ही ठीक नहीं है. पहले हम अपनी मानसिकता ठीक करें फिर किसी पर टिप्पड़ी.

  2. जिसमे आपका हमारा बहोत बड़ा हाथ है ????
    हम जितनी चर्चा करेंगे उतना ही पत्रिका को फैदा होगा … यही चीज़ पाठकों को बुक स्टॉल से पत्रिका खरीदने पर मज़बूर जरूर कर रही है। शायद यही दिलीप मंडल भी चाहते हैं।

    NARESH KUMAR SHARMA

  3. अब ताज़ा खबर ये है कि दिलीप मंडल के संपादकीय नेतृत्व में इंडिया टुडे ने देश में तेजी से बढ़ते ब्रेस्ट इंप्लांट या प्लास्टिक सर्जरी के ट्रेंड पर एक अंक प्रकाशित किया है। खबर सरसरी तौर पर कुछ डॉक्टरों के ऐडवरटोरियल जैसा है, जिसमें मुद्दे पर कम, और डॉक्टरों के क्लीनिक पर ज्यादा चर्चा की गई है। ज़ाहिर सी बात है कि जब ब्रेस्ट सर्जरी की बात होगी तो फूल-पत्तियों या फिल्मस्टार अथवा संसद की तस्वीर तो नहीं ही छपेगी। उधर थर्ड मीडिया में ये अंक खूब प्रचारित है।
    दिलीप मंडल पत्रकारिता ही नहीं, फेसबुक और सोशल नेटवर्किंग साइटों के पुराने खिलाड़ी हैं। वे तीनों मीडिया में काम कर चुके हैं। इंडिया टुडे में यह उनकी दूसरी पारी है। वे सीएनबीसी चैनल और एक बड़े मीडिया घराने के पोर्टल के लांचिंग टीम में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बार भी ये खेल बिना उनकी मर्ज़ी के नहीं हो रहा है। चाहे निंदा के तौर पर ही सही, इंडिया टुडे के इस ताज़ा अंक ने वो लोकप्रियता बटोर ली है….
    जिसमे आपका हमारा बहोत बड़ा हाथ है ????
    हम जितनी चर्चा करेंगे उतना ही पत्रिका को फैदा होगा … यही चीज़ पाठकों को बुक स्टॉल से पत्रिका खरीदने पर मज़बूर जरूर कर रही है। शायद यही दिलीप मंडल भी चाहते हैं।

    http://www.facebook.com/SHARMAJINGOWALE
    NARESH KUMAR SHARMA

  4. हम जितनी चर्चा करेंगे उतना ही पत्रिका को फैदा होगा … यही चीज़ पाठकों को बुक स्टॉल से पत्रिका खरीदने पर मज़बूर जरूर कर रही है। शायद यही दिलीप मंडल भी चाहते हैं।

    NARESH KUMAR SHARMA

  5. हम दलित तो पैदा होते ही शोषण के लिए हैं. दिलीप मंडल ने भी दलित मुद्दों का इस्तेमाल कर दलितों का शोषण ही किया. असलियत छुपाये नहीं छुपती, देर से ही सही लेकिन दिलीप मंडल की सच्चाई भी सामने आ ही गयी.
    रेखा जाटव

  6. "खबर सरसरी तौर पर कुछ डॉक्टरों के ऐडवरटोरियल जैसा है, जिसमें मुद्दे पर कम, और डॉक्टरों के क्लीनिक पर ज्यादा चर्चा की गई है।" Isko bolte hai ek teer aur kai shikaar. Mast dono hatho se paise bataoro aur desh jaaye tel lene.

  7. यह दिलीप मंडल की बहन का फोटो है क्या?

  8. गुस्ताखी मुआफ करें. इंडियाटुडे कोई धर्मादा ट्रस्ट नहीं चलाता बल्कि एक कारोबारी है और हर कारोबार का सिध्दांत होता है लाभ कमाना. इंडियाटुडे के मालिक अरुणपुरी अपने हर कर्मचारी (चाहे वोह संपादक हो या चपड़ासी) को अपनी कसौटी पर भलीभांति परखते हैं कि वह उनके बताये तरीके से काम करेगा या अपने ज़मीर से. अपने ज़मीर पर कायम रहने वालों के लिए इंडियाटुडे ग्रुप में कोई ज़गह नहीं होती और यदि ज़मीर अरुणपुरी के क़दमों में डाल दिया जाये तो बन्दे की किस्मत खुल गयी. किसी को भी औजार की तरह इस्तेमाल कर सकने की कला जानने वाले अरुणपुरी की पहली और आखिरी पसंद होते हैं. यदि कोई इस कला में पारंगत नहीं तो इंडियाटुडे ग्रुप में उसकी कोई जगह नहीं. अब आप लोग कुछ भी कहें लेकिन सच्चाई यही है कि मीडिया में अगर बाजारवाद का कोई सरमायेदार नम्बर एक है तो इंडियाटुडे और उसकी टीम. आप अजीत अंजुम को कोस सकते हैं लेकिन इतना ध्यान रखें कि विंडसर प्लेस वाले मामले में खुशवंत सिंह से बुराई अजीत अंजुम ने ही मोल ली थी, इनके अलावा मीडिया दरबार का साथ देने कोई दिग्गज पत्रकार आया हो तो बताएं. शहीदे आजम भगत सिंह के अपमान की साजिश से बड़ा मुद्दा इस देश के लिए नहीं हो सकता. तब आपके मंडल जी किस गुफा में थे? इलीट क्लास को सदा गालियाँ देने और कोसने वाले दिलीप मंडल आज खुद इलीट क्लास में शामिल हो चुके हैं तथा उनकी दलितों के मुद्दों को इस्तेमाल करने की क्षमता ही उन्हें इस जगह तक लाई है न कि पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गए किसी खास कारण से, जो कभी उनके बस की बात भी नहीं. थू थू के लायक भी नहीं समझता उनका और उनके मालिकान का चेहरा..

  9. India Today hi esi magzine hai jisne press ko Udyog gharanon ke yahan girvi rakhna shuru kiya, full page colour vigyapan dene ke saath interview chhapna (aaj ki paid news) ka chalan Mr.; Puri ne shuru kiya tha. Vigyapan mein. Ese bhrasta magzine malik ki naukari karna bhi…..tauba tauba.

  10. ये इंडिया टुडे का पुराना फंडा है। साल में कम से कम दो तीन कॉन्डोम कंपनियों के सेक्स सर्वे छापता है, एक दो गर्मागर्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के अंक छापेगा, फिर पत्रकारिता के कान्क्लेव में बड़े-बड़े भाषण झाड़ेगा.. इंडिया टुडे बेशक अपने बढ़ते सर्कुलेशन से खुश हो, लेकिन उसके लिए खतरनाक बात ये है कि अब वो क्लास का नहीं, मास का बनता जा रहा है… वो भी गंभीर लेख या विचारों के लिए नहीं, बल्कि फूहड़ता के लिए।

  11. सोच बदलें-जिश्म दिखाएँ नहीं, जिश्म छिपाएं.
    एक पुरुष किसी महिला के किसी “अंग” को उजागर और अपने समाचार पत्र / पत्रिका में प्रकाशित कर क्या बताना चाहता है समाज को? इश्वर ने वह अंग इस पृथ्वी पर उत्पन्न हुए सभी महिलाओं को दिया है – उनके माँ, बहन.

  12. “उभार की सनक” के बाद संभव है दिलीप मंडल साहेब “लम्बाई की सनक” पर भी कोई “कवर स्टोरी” करें, या फिर यहभी हो सकता है की उस अंक के बाद “रंगों की सनक” या “आकृति का भूत”, या फिर “पुरुषार्थ, पतन और महिलाओं की भूख”पर भी कवर स्टोरी तैयार कर पाइप-लाइन में रखे हो, ताकि आने वाले दिनों में इस देश के लोगों को, माँ, बहनों को, भाई-पिता को बताएं. मंडल साहेब कुछ भी कर सकते है. और यह दोष सिर्फ मंडल साहेब को ही क्यों? भारत से छपने वाले तमाम समाचार पत्र और पत्रिकाओं में जिस तरह की तस्वीरें छपती है, उसमे दिलीप मंडल ही नहीं देश के सभी घरों में जहाँ बेटियों की उम्र बढ़ रही है, उन सभी चित्रों को देख कर ही उम्र से पहले अपने यौवन को देखने लगेंगी और औभव भी करने लगेंगी, और करती हैं.
    यह पतन पत्रकारिता का ही नहीं, समाज का पतन को भी दर्शाता है. अंतर सिर्फ है की कुछ लोग रेड लाइट एरिया में अपने जिस्म को बेच कर पेट पलने वाली महिलाओं के पास कोई बिकल्प नहीं है अपने को बाज़ार में बेचने के सिबा, लेकिन दिलीप मंडल साहेब और उनके जैसे उस गरिमा मय पद पर बैठने वाले अन्य तथाकथिक संपादकों के पास “सोच की कमी है” इसलिए समाज की औरतों की “छाती”, “कमर” “जंघा” और अन्य सभी अंगों को प्रदर्शित कर बाज़ार में बेच रहे हैं इंडिया टुडे को. धिक्कार तो उस संसथान के मालिक को किया जाये. मेरी सलाह है की इस अंक या ऐसे प्रकाशित होने वाले किसी अंक की प्रति संबध समाचार पत्र/पत्रिका के संपादकों, लेखकों, मालिकों के बहु, बेटियों और पत्नियों को सबसे पहले दिखाया जाय और उसी के आधार पर उनकी “शारीरिक गठन को सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित भी किया जाय.” एक सामाजिक क्रांति की जरुरत है इस “मानसिक रूप से नपुंसक समाज में”

  13. उभारो की सनक इंडिया टुडे में तेज गति से फ़ैल रही है । आखिर क्या मकसद है थोडा सा समझ से परे है । मीडिया का गिरता ग्राफ -घटिया सोच उभारो की सनक पैदा कर रहा है । ऐसे लेखो का जन्मदाता कौन है । आखिर क्यों सनक पैदा हो जाती है । क्या यह पागलपन है । जब मैंने मीडिया दलाल शुरू किया , देश के बड़े बड़े पत्रकारों के फ़ोन आये अरे यार ये मीडिया के आगे दलाल क्यों लगा दिया कुछ और लगा लेते तो अच्छा भी लगता है आपने तो पूरी पत्रकार जगत को दलाल बना दिया ।.

    जब मीडिया दलाल के बारे में विचार कर रहा था तभी दिमाग में मीडिया के धूर्त पत्रकारों की छवि उभर कर सामने आयी थी जो पैसे के लिए अपने जमीर को नीलाम करने पर उतारू है । नेताओ ने तो देश को बेच रहे है मगर मीडिया अपने आप को ही बेच रहा है । हर बार बेचने का रूप बदलता रहा है । मीडिया की बाजार में हर बिकने को तैयार है मगर ग्राहक तो मिले यार? खैर शुक्रगुजार हु उन पत्रकारों का जो अपना जमीर नहीं बेच रहे है कम पैसे में जिन्दगी बसर कर रहे है?

    मुझे मालूम है आने वाला समय पत्रकारिता का नहीं बल्कि दलालों का होगा जो खुले आम मीडिया की कालाबाजारी करेगे ,चाहे उसके लिए अपना घर – सम्मान सब कुछ खोना पड़े । आखिर वो है तो दलाल पत्रकार । Read full article.. http://www.mediadalal.com http://www.sakshatkar.com http://www.bollywooddalal.com.

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