इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

सोशल नेटवर्किंग साइटों पर लगाम कसने के जस्टिस मार्कंडेय काटजू के इरादों को लोग बेशक पागलपन बता रहे हों, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे बेहद सोचा-समझा और ‘मौके पर उठाया’ कदम मान रहे हैं। बताया जाता है कि छोटे कद के जस्टिस काटजू अब छोटी-मोटी कुर्सी से संतुष्ट नहीं हैं और उनका सपना राष्ट्रपति भवन की तरफ कूच करने का है।

देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 25 जुलाई को पूरा हो रहा है और अब कोई भी पार्टी उन्हें रिपीट करने के मूड में नहीं दिख रही है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बारे में कांग्रेस की ओर से 10 मई के बाद औपचारिक बातचीत शुरू की जाएगी जिसमें संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा की जाएगी। फिलहाल सरकार की प्राथमिकता आम बजट पारित कराने की है और वित्त विधेयक को पारित कराने के लिए 8 मई की तारीख तय की गई है।

फिलहाल जो संवैधानिक स्थिति है उसके मुताबिक कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने दम पर किसी उम्मीदवार को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठाने की स्थिति में नहीं है। साफ है कि यूपीए और एनडीए दोनों के नेता जिस उम्मीदवार के नाम पर एकजुट होंगे वो ही अगला राष्ट्रपति बनेगा। अभी तक सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की सूची तैयार करने और उन नामों के समर्थकों की संख्या पर गुना-भाग करने में ही जुटे हैं।

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों ने साबित कर दिया है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रभाव इन नेताओं के निजी वोटबैंक से ज्यादा असरदार और आक्रामक है। संसद में सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बेशक कीचड़ उछालने में जुटे हों, लेकिन कम से कम दो विषयों के विरोध पर सभी के विचारों में समानता है। ये दोनों विषय हैं- पहला अन्ना और दूसरा उनके आंदोलन को पंख देने वाले सोशल नेटवर्किंग साइट।

मुलायम हों, ममता हों या मायावती, जिनके भी हाथों में राष्ट्रपति भवन की चाबी है सब को हर तरह के मीडिया की परवाह है। इन सब नेताओं के साथ-साथ कांग्रेस और बीजेपी पहले ही सोशल नेटवर्किंग से परेशान रह चुके हैं। कभी किसी नेता का किस्सा आ खड़ा होता है तो कभी किसी का। चैनल और अखबार के रिपोर्टर, संपादक और मालिक तक तो मैनेज किए जा सकते हैं, लेकिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर न कोई संपादक होता है और न रिपोर्टर। सबको आज़ादी है, लेकिन आम आदमी के इस अधिकार पर सारे नेताओं को ऐतराज़ है।

बताया जाता है कि ऐसे में काटजू के एक करीबी मित्र ने उन्हें शिगूफ़ा दे दिया कि अगर वे किसी तरह इस समुद्र को बांधने में कामयाब हो जाएंगे तो उनका नाम देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए नामित हो सकता है। बस फिर क्या था? नीतीश, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यूपी, दिल्ली सब का मुद्दा छोड़ कर पिल पड़े सोशल नेटवर्कों के पानी को बटोरने की कोशिश में। बाकायदा मंत्री जी को पत्र लिखा गया। ख्वाब देखने लगे कि कानून भी बनवा देंगे और इसी सीढ़ी पर चढ़के राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी पहुंच जाएंगे। देखें काटजू जी के हसीन सपने कितने परवान चढ़ते हैं?

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
No tags for this post.

By admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.

3 thoughts on “क्या काटजू लाल को उनके ‘हसीन सपने’ में राष्ट्रपति भवन नज़र आ रहा है?”
  1. Devendra Surjan,Jabalpur,का कहना है:ये तीनो ही भावुक ज़्यादा है व्यावहारिक कम. अगर राष्ट्रपति चुनने दारोमदार इन तीनो पर ही है तो समझिए प्रतिभा पाटिल से भी अधिक घटिया राष्ट्रपति राष्ट्र को मिलने वाला है. वैसे इस बात की संभावना कम ही है कि इन टीनों में किसी एक नाम को लेकर सहमति बन पाएगी. मुलायम किसी मुसलमान के प्रति आग्रह दिखाएँगे और मायावती किसी दलित के प्रति. चंचल चित्त की मालकिन ममता मुलायम और माया के प्रस्तावित नामों से दुराव रखेंगी और गुस्से में इन दोनों का बायकाट कर देंगी. बेहतर हो सभी प्रमुख दल सुयोग्य राष्ट्रपति के लिए किसी एक ऐसे नाम पर सहमत हों जो निर्विवादित हो और उस गरिमा को वापिस ला सके जो राजेंद्र प्रसाद , सर्वपल्ली राधाकृष्णन और ज़ाकिर हुसैन के काल में इस पद की हुआ करती थी.

  2. वोह आम आदमी को बेवकूफ समझते हैं लेकिन ये पब्लिक है ये सब जानती है.लोग पर्लिअमेंट को कोई भी मंदिर क्यों न कहें पर जनता को पता है की ज्यादातर चोर या चाटुकार हे HAIN

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

×

फेसबुक पर पसंद कीजिये

Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son