एक भस्मासुर बन गया है निर्मल बाबा, जिससे पीछा छुड़ाने में जुटा है मीडिया

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‘‘कौन कहता है  आसमां में सुराख  नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों..” कवि दुष्यंत कुमार की लिखी ये लाइनें पूरी तरह सच साबित हुईं निर्मल बाबा के मामले में और अब उनका विशाल एंपायर भरभरा कर गिरने लगा है।

फेसबुक पर ऐसी तस्वीरें खूब प्रचलित हो गई हैं

अभी कुछ ही दिनों पहले की बात है। पूरी मीडिया इस जालसाज़ बाबा की मुट्ठी में समाई हुई थी। देश-विदेश के 39 चैनलों पर इस ढोंगी बाबा का प्रवचन 25 घंटे टेलीकास्ट होता था। धार्मिक चैनल तो दूर, न्यूज, हिस्ट्री और यहां तक कि इंग्लिश मूवी के चैनलों में भी हर जगह बाबा ही बाबा छाए हुए थे। बाबा के खिलाफ़ कोई खबर दिखाना तो दूर उनके विज्ञापन को टीआरपी में शामिल कर ये चैनल अपनी लोकप्रियता भुनाने में जुटे थे।

यही हाल प्रिंट मीडिया का भी था। बाबा के मैनेजरों ने हर अखबार के संपादकों और मालिकों तक को इस कदर ‘प्रभावित’ कर रखा था कि उनके खिलाफ कोई सिंगल कॉलम खबर तक नहीं आ पाती थी। ये शख्स सरेआम जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर उनसे वसूली कर रहा था और मीडिया या तो इसमें भागीदार बना था, या फिर खामोश तमाशा देख रहा था। वो तो थर्ड मीडिया ने मोर्चा संभाला, तब जाकर इस बाबा के कारनामों की पोल खुल सकी।

बाबा जी हर चैनल पर खुलेआम धमकी देते थे कि दसवंद नहीं देने पर किरपा रुक सकती है। वे अपने 2000 के टिकट वाले समागमों में लोगों को प्रलोभन दे कर बुलाते और भक्त उनके खाते में अपने गाढ़े पसीने की कमाई बाबा के चरणों में समर्पित करने को मजबूर हो रहे थे। न्यूज एक्सप्रेस के एडीटर इन चीफ मुकेश कुमार का कहना है कि ये भाषण और प्रवचन दिन-रात टीवी चैनलों पर चल कर लोगों के दिमाग में मास-हिस्टीरिया पैदा कर रहे थे। ग़ौरतलब है कि न्यूज एक्सप्रेस ऐसा इकलौता चैनल है जिसने बाबा के प्रवचनों के विज्ञापन का मोटा ऑफर सिद्धांतो के लिए ठुकरा दिया था।

पाखंड और आडंबर के खिलाफ़ हमारी इस मुहिम में अहम योगदान रहा भड़ास4मीडिया का, विष्फोट.कॉम का, न्यूज एक्सप्रेस टीवी का और तमाम छोटे बड़े बलॉगरों का और उन सब से बढ़ कर लाखों पाठकों और दर्शकों का। देश भर में जागरुक लोग बाबा की ठगी के खिलाफ खुल कर सामने आने लगे। यहां तक कि निर्मलजीत नरुला के सगे जीजा और राजनेता इंदर सिंह नामधारी ने भी इस ढोंग के खिलाफ खुल कर बयान दे डाला। मजबूर होकर विज्ञापन चलाने वाले चैनलों को भी जन भावनाओें के साथ उतरना पड़ा।

आज देश के सभी अखबार और उनकी वेबसाइटें निर्मल बाबा के नाम से रंगी हैं। कुछ दिनों पहले तक जहां गूगल पर निर्मल बाबा सबसे हॉट सर्च की-वर्ड था, वहीं आज निर्मल बाबा फ्रॉड की-वर्ड सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। हर रोज अंग्रेजी और हिंदी में कम से कम 70-80 न्यूज़ में लिस्टेड पोर्टल निर्मल बाबा की जड़ें खोदने वाले आलेख पोस्ट कर रहे हैं। बाबा की कम चर्चित रही पिछली जिंदगी का राज खोलने की कोशिशें तेज हो गई हैं।

अब हर चैनल, हर अखबार, हर पोर्टल निर्मल बाबा की बखिया उधेड़ने में जुटा दिख रहा है। लेकिन सवाल ये उठता है कि ये चैनल, ये अखबार, ये मीडिया क्या सचमुच नैतिकता के समर्थक हैं? क्या ये अब दोबारा भेड़चाल में नहीं चल रहे हैं? हक़ीकत ये है कि ये निर्मल बाबा एक ऐसा भस्मासुर है जिसे इसी लालची मीडिया ने खड़ा किया था और अब वही इससे पीछा छुड़ाने के लिए भागता फिर रहा है।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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16 thoughts on “एक भस्मासुर बन गया है निर्मल बाबा, जिससे पीछा छुड़ाने में जुटा है मीडिया

  1. अब तक रब्‍बी खामोश था, लेकिन जब उस पर जोर डाला गया तो वह बोला, हां, मैं तो इकट्ठा किया गया सारा धन एक कंबल में रख देता हूं, और मैं उसे हवा में उछाल देता हूं, परमात्‍मा को जो रखना होता है वह रख लेता है और जो वह नहीं चाहता है उसे मैं रख लेता हूं।‘’.
    ओशो

  2. अग्रवाल जी, वैसे इस देश में बिना दिमाग वाले तथकथित मनुष्यों की कमी भी नहीं जो निर्मल जैसे पाखंडियों की बातों में आकर अक्सर अपने मानसिक दिवालियेपन का नमूना दिखा ही जाते हैं!

  3. असल में शांति बांये रखने की अपील के बहाने यह पाखंडी पूरे देश को अपनी ताक़त का एहसास करना चाहता है कि उसके के खिलाफ कुछ हुआ तो उसके भक्त सड़कों पर उतर आयेंगे! वैसे दिल बहलाने के लिए ग़ालिब का ख्याल अच्छा है!

  4. लोगो को गुमराह करने में आज मीडिया और प्रेस भी ढोंगी बाबाओ के साथ बराबर के भागीदार है । प्रेस और मीडिया अपने अधिकारो का गलत फाइदा उठा रहे है , पैड न्यूज़ के चलन के बढ़ते ऐसे गुमराह करने वाले लोग और ढोंगियों को बड़ा फाइदा मिल रहा है ,
    मेरी राय में इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रेस मीडिया को बिना किसी जांच या पुख्ता तथ्यो के बिना किसी का विज्ञापन नहीं छापना या प्रसारण नहीं करना चाहिए , और सिर्फ लोगो के विज्ञापन ही नहीं राजनीतिक पार्टियों के भी प्रचार का प्रसार नहीं करना चाहिए । मतलब साफ है “”पैड न्यूज़ “” के दलदल से बाहर आना जरूरी है ।

    और रही निर्मल सिंह नरूला के साथ लोगो का जुड़ना जिसे वो ढोंगी श्रद्धा का नाम देता है दरअसल वो सब मीडिया वालों की वजह से है , मीडिया वाले अब इसकी पड़ताल में जुटे , तो इस ढोंगी का कार्यक्रम प्रसारित करने से पहले क्या भांग खा रखी थी ?

    लोग इस पाखंड का शिकार हुए इसकी बड़ी वजह मीडिया है , जिस पर हर आम जन विश्वास करता है , जनता के साथ विश्वासघात किया है मीडिया ने ।

    सिर्फ 2 लाइन लिखने से मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाते कि हमने डिस्क्लेमर लिखा था – इस कार्यक्रम के बारे में हम किसी प्रकार से जिम्मेदार नहीं होंगे ,कार्यक्रम देखने वाले सोच समझ कर आगे कदम बढ़ाए , यह एक विज्ञापन है”
    इन डिस्क्लेमर को 100 मे से 2 लोग पढ़ते है बाकी सब ठगी का शिकार होते है ।

  5. यही हमारी मानसिक गुलामी का प्रतीक है.भ्रष्टाचार ढोंग और पाखंड के खिलाफ उठने वाली आवाज़ को कुछ लोग इर्ष्या का नाम दे कर ऐसे लोगों का हौंसला बुलंद करते हैं.ऐसे ही लोगों के बल पर ऐसे पाखंडी लोग अपनी दुकान चलाते हैं.किसी भिखारी को भीख देना हो तो जेब में एक रुपये का सिक्का खोजते है नहीं मिला तो मन मर कर दो रुपये का सिक्का देते हैं अगर जेब में मिला तो.और अगर पांच का सिक्का है तो भीख देने से मना कर देते हैं.लेकिन एक ढोंगी भगवान का भय दिखा कर लोगों से अरबों लूट कर अपना घर भर ले तो उसकी जयजयकार करते हैं. जिस इंसान का धर्म और इमान सिर्फ पैसा हो ,मक्कारी की दुकान चलने के लिए जिसने अपना धर्म तक बदल डाला हो वो किसी पे क्या कृपा करेगा?

    इस दकीयानूसी समाज में लोगों की आँखों पर लालच और अन्धविश्वास का जो चश्मा चढ़ा हुआ है उसको उतारना इतना आसान नहीं है.मीडिया में पूरी तरह नंगा होने के बावजूद ये पाखंडी का हौंसला देखिये कि ट्विटर पर लोगों से शांति बनाये रखने की अपील करता है.सुन कर हंसी आयी थी कि इस मक्कार को अभी भी ऐसा लगता है कि इस के लिए लोग सड़क पर उतर कार हंगामा करेंगे.आज लगता है कि मैं शायद गलत था.लगता है कि लोगों के अन्दर आत्मा विश्वास कि बहुत कमी है.हो सकता है ये हमारी शिक्षा प्रणाली का दोष है या हम प्रगत्तिशील होना ही नहीं चाहते.सिर्फ घर बैठे बैठे बिना मेहनत के सब कुछ पा लेना चाहते हैं.ठीक है इसी मानसिकता का फायदा इस निर्मल सिंह ने उठाया कि भगवान कि कृपा भी अब आपको फ्री में नहीं मिलेगी.

  6. अब तो इस हमाम में सभी नंगे नज़र आ रहे हैं.निर्मल सिंह तो पूरी तरह से नंगा हो चुका है ,इसका तो भांडा पूरी तरह फूट चुका है.सोचने वाली बात ये है कि इस ढोंगी को यहाँ तक पहुचने में किस किस का हाथ है?हमारा मीडिया,चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया ,ये तो पूरी तरह से अपने नैतिक मूल्यों को ,अपनी विश्वसनीयता को ताक पर रख कर हो गया शामिल धोखा धडी और पाखंड के इस खेल में.चंद रुपयों की खातिर रख दिया अपने इमान को इस पाखंडी के पैरों में.और जब इस ढोंगी और पैसे के पुजारी ने मीडिया का प्रसारण का रेट काफी कम कर दिया होगा तो लगे इसकी पोल खोलने.चलो ये तो अच्छी बात है कि कम से कम समाज के सामने सच्चाई तो आई और लोगों की आँख तो खुली.लेकिन समाज को अन्धविश्वास और पाखंड के दलदल में धकेलने का काम भी तो इसी मीडिया ने ही तो किया.और इन सारे खेल में जो ठगा गया वो है आम आदमी.पैसा जो गया सो गया इस से बड़ी बात ये है कि इस आम आदमी की धार्मिक आस्था ,विश्वास और उसके सारे उम्मीदों का तो खून ही हो गया.गौर करने वाली बात यहाँ अब ये है कि क्या कोई व्यक्ति सिर्फ मीडिया के बल पर धोखाधडी का इतना बड़ा जाल अकेले अपने दम पर बुन सकता है ,विश्वास नहीं होता.सरकार चाहे तो बड़ी आसानी से ये पता कर सकती है कि इस के अकाउंट से किस किस अकाउंट में रुपये ट्रान्सफर हुए है और क्यों.इससे कई लोग बेनकाब हो सकते हैं.देखते हैं आगे और क्या क्या राज़ खुलते हैं?

  7. अब तो इस हमाम में सभी नंगे नज़र आ रहे हैं.निर्मल सिंह तो पूरी तरह से नंगा हो चुका है ,इसका तो भांडा पूरी तरह फूट चुका है.सोचने वाली बात ये है कि इस ढोंगी को यहाँ तक पहुचने में किस किस का हाथ है?हमारा मीडिया,चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया ,ये तो पूरी तरह से अपने नैतिक मूल्यों को ,अपनी विश्वसनीयता को ताक पर रख कर हो गया शामिल धोखा धडी और पाखंड के इस खेल में.चंद रुपयों की खातिर रख दिया अपने इमान को इस पाखंडी के पैरों में.और जब इस ढोंगी और पैसे के पुजारी ने मीडिया का प्रसारण का रेट काफी कम कर दिया होगा तो लगे इसकी पोल खोलने.चलो ये तो अच्छी बात है कि कम से कम समाज के सामने सच्चाई तो आई और लोगों की आँख तो खुली.लेकिन समाज को अन्धविश्वास और पाखंड के दलदल में धकेलने का काम भी तो इसी मीडिया ने ही तो किया.और इन सारे खेल में जो ठगा गया वो है आम आदमी.पैसा जो गया सो गया इस से बड़ी बात ये है कि इस आम आदमी की धार्मिक आस्था ,विश्वास और उसके सारे उम्मीदों का तो खून ही हो गया.गौर करने वाली बात यहाँ अब ये है कि क्या कोई व्यक्ति सिर्फ मीडिया के बल पर धोखाधडी का इतना बड़ा जाल अकेले अपने दम पर बुन सकता है ,विश्वास नहीं होता.सरकार चाहे तो बड़ी आसानी से ये पता कर सकती है कि इस के अकाउंट से किस किस अकाउंट में रुपये ट्रान्सफर हुए है और क्यों.इससे कई लोग बेनकाब हो सकते हैं.देखते हैं आगे और क्या क्या राज़ खुलते हैं?

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