किसी को नहीं पता ईंट का भट्ठा बिठाने के बाद कैसे बाबा बना निर्मलजीत सिंह नरूला

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निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा के इंटरनेट पर तीस लाख से भी अधिक लिंक्स हैं, पर उनका कहीं कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. निर्मलजीत से निर्मल बाबा कैसे बन गए, यह आज भी एक अनसुलझा रहस्य है.

निर्मलजीत सिंह नरुला उर्फ निर्मल बाबा दो भाई हैं. बड़े भाई मंजीत सिंह नरुला अभी लुधियाना में रहते हैं. निर्मलजीत छोटे हैं. पटियाला के सामना गांव के रहनेवाले. 1947 में देश के बंटवारे के समय बाबा जी का परिवार भारत आ गया था. बाबा शादी-शुदा हैं. एक पुत्र और एक पुत्री भी हैं उन्हें.

मेदिनीनगर (झारखंड) के दिलीप सिंह बग्गा की तीसरी बेटी से उनकी शादी हुई. चतरा के सांसद और झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के छोटे साले हैं ये. बकौल श्री नामधारी, 1964 में जब ूउनकी शादी हुई, तो निर्मल 13-14 वर्ष के थे. 1970-71 जब निर्मलजीत सिंह के पिता की मृत्यु हो गई तो नामधारी उन्हें अपने यहां ले आए.  मेदिनीनगर (तब डॉल्टनगंज) आये और 81-82 तक वह यहां रहे. रांची में भी उनका मकान था. पर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे के बाद उन्होंने रांची का मकान बेच दिया और चले गये. रांची के पिस्का मोड़ स्थित पेट्रोल पंप के पास उनका मकान था.

  • मेदिनीनगर के चैनपुर स्थित कंकारी में ईंट भट्ठा शुरू किया. पर व्यवसाय नहीं चला
  • गढ़वा में कपड़ा का बिजनेस किया. पर इसमें भी नाकाम रहे
  • बहरागोड़ा इलाके में माइनिंग का ठेका भी लिया

निर्मल बाबा का झारखंड से पुराना रिश्ता रहा है. खास कर पलामू प्रमंडल से. 1981-82 में वह मेदिनीनगर (तब डालटनगंज) में रह कर व्यवसाय करते थे. चैनपुर थाना क्षेत्र के कंकारी में उनका ईंट-भट्ठा भी हुआ करता था, जो निर्मल ईंट के नाम से चलता था.

उन्हें जानने वाले कहते हैं कि निर्मल का व्यवसाय ठीक नहीं चलता था. तब उनके ससुरालवाले मेदिनीनगर में ही रहते थे. हालांकि अभी उनकी ससुराल का कोई भी सदस्य मेदिनीनगर में नहीं रहता. उनके (निर्मल बाबा के) साले गुरमीत सिंह अरोड़ा उर्फ बबलू का लाईम स्टोन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार हुआ करता था.

बबलू के मित्र सुमन जी कहते हैं कि चूंकि बबलू से मित्रता थी, इसलिए निर्मल जी को जानने का मौका मिला था. वह व्यवसाय कर रहे थे. कुछ दिनों तक गढ़वा में रह कर भी उन्होंने व्यवसाय किया था. वहां कपड़ा का बिजनेस किया. पर उसमें भी नाकाम रहे. बहरागोड़ा इलाके में कुछ दिनों तक माइनिंग का ठेका भी लिया. कहते हैं..बहरागोड़ा में ही बाबा को आत्मज्ञान मिला.

इसके बाद से ही वह अध्यात्म की ओर मुड़ गये. वैसे मेदिनीनगर से जाने के बाद कम लोगों से ही उनकी मुलाकात हुई है. जब उनके बारे में लोगों ने जाना, तब यह चर्चा हो रही है. उन्हें जाननेवाले लोग कहते हैं कि यह चमत्कार कैसे हुआ, उन लोगों को कुछ भी पता नहीं. (प्रभात खबर)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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11 thoughts on “किसी को नहीं पता ईंट का भट्ठा बिठाने के बाद कैसे बाबा बना निर्मलजीत सिंह नरूला

  1. Nirmal baba c****a baba है
    उसका सुनोगे तो पछताओगे
    अपने म्हणत के पैसे इस धोकेबाज़ को मत भेजो |

  2. aree murkh log abhi bhi nahi samaj sake fraud baba ko..
    har roj ek naya baba paida hota hai rato rat third eye fourth eye leker aur bholi bhali janta sorry sorry andhviswasi janta bhi apni dono eye dandh karke vishwas karti hai…

    etna paisa , ezzat apne maa baap, ghar, parivar, garib par karch karte, tho hum aur desh dono aage badte naki baba, jiske pass koye kam nahi wo hi baba bante hai.. ishwar par vishwas aur sachi lagan aur mehnat se har insan aage bad sakta hai….

    1rs petrol ke daam baad gye, 10-20 paise rlwy ke daam baad gye to pure desh me halla ho jata hai. aur loog lakho rupees pakandi baba par karch karte. mat bhiliye aap jaise the waise he hai, but aise baba raato rat lakhpati, corerpati ban rahe hai……… apne hi ghar me he chor hai apne dono aaknhe kolo…..

    JAGO GRAHAK GAGO

  3. aaj bhi log itne bare khulase ke badd bhi nilmal baba ke khilaf kuch sunna pasand nhi kr rahe ye bht hi dukh ki bat hai,
    agar nilmal baba ko aapne bhakton ki takleef hi door karni hoti to wo itne bare auditoriaum mein nahi balki kisi vriksh ke neeche beith kr bhi ye kar skte the,
    jin ke pass aise shaktiyan hoti hain unhe kisi vigyapan ya paise ki kya jaroorat unhe to sirf aapne bhakton se moh hona chahiye.kisi baba ke account mein itne paise ye to dhokha dena hi hua
    bhgwan ke prati shradha rakhne walon ko bhgwan ke account mein paise nhi dalne parte.sabhi janta se ye anurodh hai ki sirf dikhawe per na ja kar wo har pehluon per dhayan de
    aur media isi tarah dhongi aur thaggon ka parda phas krti rhe.

  4. ये जो बी हो रहा है मुझे नहीं पता काया है बत निर्मल बाबा जी ऐसे नहीं हो सकते है जो लोग आज उन्हें इस तरह देख रहे है वो चुप कैसे भीथे है जब की उनकी कृपा से लोग लोगो का जीवन धन्य हुआ है मेरी सबसे यही रेकुएस्ट है अपना विश्वास बनाये रहे जैस एकी अगर पत्थर पर होता है तो उसे बी हम भगवन का रूप कहते hai

  5. Yeh ya aise hi anya vyakti ye sabit karte hain ki Bharat ke log sada dil aur seedhey sadey hain warna aise thagon ki yahan kaise chalti.

  6. sab ko pata hai ki log thag kaise banta hai, use ham hi banate hain, hamri asantosh, lalach, aur jarurat se jyad pane ki iksha ne hame kahi ka nahi chhodta, isme nirmal baba se jyada to ham doshi hue, ki apne vevek ka istemal nahi kar apni apne vivek ko dusre ke haton chhod dete hain,

  7. अभावों ,कष्टों , से घिरे मुफलिसी के शिकार धार्मिक प्रवचनों में आँख मूंद कर विश्वास कर लेने वाले लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करनें वाले निर्मल बाबा भेषधारी व्यक्ति का पर्दाफास हो जानें पर लोग अपनें आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं ।.

  8. अभावों ,कष्टों , से घिरे मुफलिसी के शिकार धार्मिक प्रवचनों में आँख मूंद कर विश्वास कर लेने वाले लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करनें वाले निर्मल बाबा भेषधारी व्यक्ति का पर्दाफास हो जानें पर लोग अपनें आप को ठगा सा महसूस कर रहे हैं ।.

  9. निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा के इंटरनेट पर तीस लाख से भी अधिक लिंक्स हैं, पर उनका कहीं कोई विवरण उपलब्ध नहीं है. निर्मलजीत से निर्मल बाबा कैसे बन गए, यह आज भी एक अनसुलझा रहस्य है.

    निर्मलजीत सिंह नरुला उर्फ निर्मल बाबा दो भाई हैं. बड़े भाई मंजीत सिंह नरुला अभी लुधियाना में रहते हैं. निर्मलजीत छोटे हैं. पटियाला के सामना गांव के रहनेवाले. 1947 में देश के बंटवारे के समय बाबा जी का परिवार भारत आ गया था. बाबा शादी-शुदा हैं. एक पुत्र और एक पुत्री भी हैं उन्हें.

    मेदिनीनगर (झारखंड) के दिलीप सिंह बग्गा की तीसरी बेटी से उनकी शादी हुई. चतरा के सांसद और झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के छोटे साले हैं ये. बकौल श्री नामधारी, 1964 में जब ूउनकी शादी हुई, तो निर्मल 13-14 वर्ष के थे. 1970-71 जब निर्मलजीत सिंह के पिता की मृत्यु हो गई तो नामधारी उन्हें अपने यहां ले आए. मेदिनीनगर (तब डॉल्टनगंज) आये और 81-82 तक वह यहां रहे. रांची में भी उनका मकान था. पर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे के बाद उन्होंने रांची का मकान बेच दिया और चले गये. रांची के पिस्का मोड़ स्थित पेट्रोल पंप के पास उनका मकान था.

    मेदिनीनगर के चैनपुर स्थित कंकारी में ईंट भट्ठा शुरू किया. पर व्यवसाय नहीं चला.
    गढ़वा में कपड़ा का बिजनेस किया. पर इसमें भी नाकाम रहे.
    बहरागोड़ा इलाके में माइनिंग का ठेका भी लिया.
    निर्मल बाबा का झारखंड से पुराना रिश्ता रहा है. खास कर पलामू प्रमंडल से. 1981-82 में वह मेदिनीनगर (तब डालटनगंज) में रह कर व्यवसाय करते थे. चैनपुर थाना क्षेत्र के कंकारी में उनका ईंट-भट्ठा भी हुआ करता था, जो निर्मल ईंट के नाम से चलता था.

    उन्हें जानने वाले कहते हैं कि निर्मल का व्यवसाय ठीक नहीं चलता था. तब उनके ससुरालवाले मेदिनीनगर में ही रहते थे. हालांकि अभी उनकी ससुराल का कोई भी सदस्य मेदिनीनगर में नहीं रहता. उनके (निर्मल बाबा के) साले गुरमीत सिंह अरोड़ा उर्फ बबलू का लाईम स्टोन और ट्रांसपोर्ट का कारोबार हुआ करता था.

    बबलू के मित्र सुमन जी कहते हैं कि चूंकि बबलू से मित्रता थी, इसलिए निर्मल जी को जानने का मौका मिला था. वह व्यवसाय कर रहे थे. कुछ दिनों तक गढ़वा में रह कर भी उन्होंने व्यवसाय किया था. वहां कपड़ा का बिजनेस किया. पर उसमें भी नाकाम रहे. बहरागोड़ा इलाके में कुछ दिनों तक माइनिंग का ठेका भी लिया. कहते हैं..बहरागोड़ा में ही बाबा को आत्मज्ञान मिला.

    इसके बाद से ही वह अध्यात्म की ओर मुड़ गये. वैसे मेदिनीनगर से जाने के बाद कम लोगों से ही उनकी मुलाकात हुई है. जब उनके बारे में लोगों ने जाना, तब यह चर्चा हो रही है. उन्हें जाननेवाले लोग कहते हैं कि यह चमत्कार कैसे हुआ, उन लोगों को कुछ भी पता नहीं. (प्रभात खबर)

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