आवश्यकता है एक अदद स्वस्थ, विचारवान, राष्ट्र भक्त और सच्चे राष्ट्र सेवक राष्ट्रपति की

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-शिवनाथ झा

आगामी 25 जुलाई 2012 को माननीया प्रतिभा देवी सिंह पाटिल जी रायसीना हिल्स के उस ऐतिहासिक इमारत में अपना पांच साल का “प्रवास” समाप्त करने जा रही हैं. स्वतंत्र भारत में श्रीमती पाटिल 12 वीं राष्ट्रपति हैं जो पांच वर्ष की अवधि पूरी करने जा रही हैं. स्वतंत्र और गणतंत्र भारत में दो और भी कार्यकारी राष्ट्रपति बने – ऍम. हिदायतुल्ला ( 20 जुलाई 1969 – 24 अगस्त 1969) और बी.डी. जत्ती (11 फरवरी 1977-25 जुलाई 1977) जो राष्ट्रपति बनते-बनते नहीं बन पाए.

पिछले पांच वर्षों के दौरान भारत का इतिहास माननीया प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के कार्यकाल को कैसे आंकेगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन एक बात जरुर ही स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा की भारत जैसे “पुरुष प्रधान देश में एक महिला को, चाहे वे तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की रसोई की देख-रेख क्यों ना की हों, राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर इस कदर आसीन करने का हिम्मत दिखाना अपने आप में “हिम्मतकारी” है. काश, भारत के घरों में सभी महिलाओं का भाग्योदय प्रतिभादेव सिंह पाटिल की तरह ही हों, इश्वर से प्रार्थना है.

ज्ञात सूत्रों के अनुसार पूर्व रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम (जिनका बाद के दिनों में श्रीमती इंदिरा गाँधी से मन-मुटाव हों गया था) की पुत्री और वर्तमान लोक सभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार रायसीना हिल के लिए अपनी “दावेदारी”ठोक चुकीं हैं और कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी, जिन्होंने ही बड़े विश्वास के साथ संसद के अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुँचाया, एड़ी – चोटी एक की हुई हैं. और अगर देखा जाये, तो भारत में अगले कुछ वर्षों तक महिलाओं को राष्ट्रपति बनने/बनाने की परंपरा जारी रहनी चाहिए. कम से कम सांसदों को “आचार- संहिता” सिखानी नहीं पड़ेगी.

लेकिन, अगर अल्प-संख्यकों के “मतों” की राजनीति होती है, जिसकी सम्भावना बहुत अधिक है, विशेषकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को नए तरह से उभरने के कारण, तो फिर उप-राष्ट्रपति श्री ऍम. हामिद अंसारी का नाम सबसे आगे उनके पदनाम के आगे “उप” समाप्त हों सकता है. विद्वान है, चाटुकारिता कुछ अलग अंदाज में शायराना करते है. लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ और राज नेताओं का विश्वास प्राप्त है.

इस बीच, एक और राजा कुदक-फुदक रहे हैं. नाम है डॉ. कर्ण सिंह. पिछली बार जब उनके ही “तथाकथित समर्थक” ने उनका नाम सूची से कटवा दिया तो 10 जनपथ से मुंह फुला लिए. लेकिन गाँव में कहावत है (दिल्ली के लोग नहीं समझेंगे, क्योकि गाँव वाले भी जब दिल्ली में रहने लगते हैं तो वे अपनी मानसिक औकात भूल जाते है) : “रुसल जमैय्या का लिहन, ज्यादा गुसिय्येहन त ले जहिह्हन अपन कनियाँ के” (रूठा हुआ दामाद क्या लेगा, ज्यादा गुस्सा करेगा तो अपनी बीबी को ले जायेगा). दस जनपथ से कुछ दिन तो “मुंह फुल्लौवल” रहा, फिर जाना-आना चालू. लेकिन अगर सूत्र की सुचना सही है, तो डॉ. कर्ण सिंह का राष्ट्रपति बनने का सपना उनके साथ ही जायेगा.

इस बीच जो सबसे बड़ा दावेदार है और देश को जरुरत भी है ऐसे व्यक्ति का जो “सभी परिस्थितियों में अडिग रहे” वह हैं “दादा” – प्रणव मुख़र्जी. सूत्रों के अनुसार, “दादा” इस देश के प्रधान मंत्री तो कभी नहीं बन सकते, क्योकि इस “अश्लील, भ्रष्ट, बेईमान, अशिक्षित, असंवेदनशील, अज्ञानी, अदुर्दार्शिता, चापलूस, राज-नेताओं से भरा यह राजनैतिक माहौल कभी नहीं चाहेगा की “दादा” प्रधान मंत्री बने. क्योकि सबों की “दुकानदारी” बंद. लेकिन, राष्ट्र के राजनैतिक उथल-पुथल की अवस्था में, चाहे वह श्रीमती इंदिरा गाँधी का समय हों या श्रीमती सोनिया गाँधी या डॉ मनमोहन सिंह का, “दादा” की भूमिका “अतुलनीय” है.

सूत्रों का मानना है, “दादा का अब समय आ गया है की उन्हें प्रोनत्ति देकर रायसीना हिल भेजा जाये.” लेकिन यहाँ, एक बात, और सुनने में आ रहा है की “दादा” स्वयं अपने बड़े-दादा का नाम प्रस्तावित करना चाहते हैं जिन्होंने संसद की गरिमा बचानेके लिए अपने पार्टी का नहीं बल्कि संसद का साथ दिया और वह प्रकरण स्वतंत्र भारत में शायद पहला प्रकरण था. सूत्रों के अनुसार, राजनैतिक पार्टी को दरकिनार करते हुए बित्त मंत्री प्रणव मुख़र्जी संभवतः पूर्व लोक सभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी का नाम प्रस्तावित करने को सोच रहे हैं. अगर यह सत्य है, तो भारत को एक कुशल, योग्य, दूरदर्शक व्यक्ति राष्ट्रपति के रूप में मिलेगा जिसका स्थान भारतीय राजनैतिक व्यवस्था से लेकर संसद तक “अतुलनीय” है.

राजनितिक समीक्षकों का मानना है की सन 1950 से 1967 तक जिन तीन राष्ट्रपतियों का चुनाब हुआ उनपर स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 साल बाद तक अगर कोई “ऊँगली” नहीं उठी, तो आने वाले दिनों में भी नहीं उठेगी. कारण: पिछले पैसठ सालों में भारत के राजनैतिक वातावरण में जो ‘गिरावट’ आई है, राष्ट्र और भारत के आवाम के प्रति राजनेताओं की मनोदशा में जिस तरह परिवर्तन हुआ, अपने-हित के लिए राष्ट्र को जिस तरह बीच चौराहे पर नीलाम किया गया, भ्रष्टाचार और अनैतिकता के अथाह समुद्र में इन नेताओं ने जिस तरह ‘गोते’ लगाये, यह अपने आप में एक पराकाष्ठा है.

छब्बीस जनबरी 1950 को बिहार के जीरादेई में उत्पन्न और पटना के टीके घोष अकेडमी का एक छात्र डॉ. राजेंद्र प्रसाद जब स्वतंत्र भारत का पहला राष्ट्रपति बना तो भारत का एक-एक बच्चा राजेंद्र बाबु बनने का सपना देखने लगा – उनकी विद्वता, उनका सादापन, उनके विचार, राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण की भावना – उनके सभी गुणों को एक साथ अपने में समेटना चाहा. राजेंद्र प्रसाद कभी अपने या अपने परिवार के लिए नहीं जिए और यही कारण है की आज उनका बेटा, पोता या अन्य वंशज को भारत के १२१ करोड़ “नपुंशक मानसिकता” रखने वाले लोग जानते तक नहीं, पहचानने की बात करना तो मुर्खता होगी. राजेंद्र बाबु 26 जनवरी 1950 से 13 मई 1962 तक अपना कार्यकाल पूरा किया.

डॉ राजेंद्र प्रसाद के बाद भारत को एक ऐसा शिक्षक मिला राष्ट्रपति के रूप में जो आज भी भारत के प्रत्येक आदमी के जेहन में बसा है – एक सम्मान के साथ, एक शिक्षक के रूप में – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन. भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के शिक्षाविद और आवाम नतमस्तक रहे राधाकृष्णन के सम्मुख. इन्होने ने भी 13 मई 1962 से 13 मई 1967 तक का कार्य काल बहुत ही सम्मान के साथ बिताया.

राधाकृष्णन के पश्च्यात 13 मई, 1967 को भी देश को डॉ जाकिर हुसैन के रूप में एक नया “विचारवान, मूल्यवान, साधक, राष्ट्र भक्त, विद्वान” के रूप में तीसरा राष्ट्रपति मिला. स्वतंत्र भारत का पहला मुस्लिम राष्ट्रपति जिन्होंने शिक्षा के विकास के लिए नेशनल मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना (29 अक्टूबर 1920) की, जो बाद में, जामिया मिल्लिया इश्लामिया के नाम से विश्व विख्यात हुआ. जाकिर हुसैन साहेब 6 जुलाई 1957 से 11 मई 1962 तक बिहार के “लाट-साहेब” (राज्यपाल) के रूप में राज्य में अपना एक अहम् स्थान बनाया था. बाद में, 13 मई 1962 से 12 मई 1967 तक भारत के उप-राष्ट्रपति भी रहे. यहाँ यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि जाकिर हुसैन साहेब के बाद जैसे-जैसे भारत का राजनैतिक वातावरण ‘विषाक्त’ होते गया, राष्ट्रपति पद हेतु चयनित लोगों चुनाव प्रक्रिया भी अछुता नहीं रहा.

चाहे वी.वी. गिरी ( 24 अगस्त 1969 – 24 अगस्त 1974), हों या डॉ. फकरुद्दीन अली अहमद ( 24 अगस्त 1974 – 11 फरवरी 1977), या नीलम संजीव रेड्डी (25 जुलाई 1977 – 25 जुलाई 1982 ), या फिर ज्ञानी जैल सिंह ( 25 जुलाई 1982 से- 25 जुलाई 1987 ) इन सभी राष्ट्रपतियों का चुनाव कैसे हुआ?, इनके कार्य-काल में क्या-क्या कारनामे हुए? कैसे प्रजातंत्र धीरे-धीरे राजतन्त्र और निरंकुशवाद में बदलता चला गया? कैसे भारत का पहला नागरिक इस देश के तीसरे नागरिक (प्रधान मंत्री) के हाथों का कठपुतली बनकर भारत के आवाम के भावनाओं से खेला? यह किसी से भी छिपा नहीं है. आज भी भारत का आवाम उस मनोदशा से निकल नहीं पाया है.

आर वेंकट रमण (25 जुलाई 1987 – 25 जुलाई 1992) के राष्ट्रपति बनने के बाद देश में एक आशा की किरण दिखाई दी – एक सफल अर्थशास्त्री, एक कुशल दूर-दर्शक के रूप में, और यही कारण है की आर. वेंकट रमण को भारत ही नहीं पूरा विश्व सम्मानित किया. यह एक ऐसा व्यक्ति थे जिन्होंने अपने उप-राष्ट्रपति और राष्ट्रपति के पद पर चार प्रधान मंत्रियों के साथ काम किया, जिसने तीन प्रधान पंत्रियों की नियुक्ति इन्होने की थी – वी पी सिंह, चन्द्र शेखर और पी.वी. नरसिम्हा राव.

आर. वेंकट रमण के बाद देश को एक विद्वान, विचारवान, योग्य, शालीन, व्यक्ति भले ही डॉ शकर दयाल शर्मा (25 जुलाई 1992 – 25 जुलाई 1997) के रूप में राष्ट्रपति मिला हों, लेकिन इतिहास भी इस बात का गवाह है कि वे एक कुशल प्रशासक नहीं थे. ऐसा भी कहा जाता है की डॉ शकर दयाल शर्मा को राष्ट्रपति पद पर आसीन होना तो बातों का पुरष्कार था. एक – सन 1960 में डॉ शकर दयाल शर्मा ने श्रीमती इंदिरा गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनने के प्रयास को भरपूर मदद किया था और दूसरा – इनकी बेटी गीतांजलि माकेन और दामाद ललित माकेन (युवा सांसद) का सिख उग्रवादियों द्वारा हत्या.

के आर नारायणन (25 जुलाई 1997 – 25 जुलाई 2002) और एपीजे अब्दुल कलाम (25 जुलाई 2002 – 25 जुलाई 2007) के समय भले ही देश में राजनैतिक अस्थिरता का वातावरण रहा हो, लेकिन दोनों राष्ट्रहित को मद्देनज़र अपनों-अपनी योग्यता और काबिलियत का पूर्ण परिचय दिया. यह अलग बात है की अगर 2002 में समाजवादी पार्टी के तत्कालीन महासचिव अमर सिंह और पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की पहल नहीं हुई होती तो ऐ पी जे अब्दुल कलाम साहेब रायसीना हिल तक नहीं पहुँचते. कहा भी गया है “स्त्रीयस्य चरित्राम, पुरुषस्य भाग्यम देवो ना जानति”.

बहरहाल, जो भी हों, जो बीत गया वह इतिहास है. जो है, वही वर्तमान. लेकिन भारत की राजनैतिक व्यवस्था में “भविष्य काल” को “भूतकाल” होने में वक्त नहीं लगता, वर्तमान काल होने की बात सोचना व्यर्थ है – वशर्ते की आप सत्ता के गलिआरे के दबंग राजनैतिक पार्टी (जिनकी संख्या संसद में और राज्यों की विधान सभाओं और विधान मंडलों में अधिक हों) के अध्यक्ष के “चमचे” हों, “हाँ-में-हाँ” मिलाने की काबिलियत आप में भरपूर हों, सभी अनैतिक, असंवैधानिक कार्यों की पासा पलटने की ताकत आप में हों, और आपका अपना एक “राजनैतिक पी.आर. एजेंसी (सांसदों, मुख्य मंत्रियों, कार्पोरेट हाउस के मालिकों, धनाढ्यों द्वारा समर्थित) हों जो आपकी छवि को उजागर कर “दबंग पार्टी” के मुखिया तक पहुंचा सके.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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