शहीदों की चिताओं पर लगते हैं हर बरस मेले… अपनी रोटी सेंकने वाले मुनाफाखोरों और चोरों के?

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हम भारतवासी बेशक खुद को पाक-साफ बता कर भष्टाचार-रहित समाज के अखाड़े में उछल-उछल कर पहलवानी करें कि हम “भ्रष्ट नहीं हैं”, और सरकार या व्यवस्था की गलतियों पर “डुगडुगी लेकर भारत भ्रमण पर निकल जाएँ” या फिर देश की राजधानी के जंतर मंतर पर “लंगोटा” लपेट कर धरना देने पर आमादा हों जाएँ, लेकिन इस सत्य को कोई नहीं झुठला सकता कि देश के 44 हज़ार से भी ज्यादा 70-72 साल के बुजुर्ग जिनकी उम्र आज़ादी के समय 5-7 साल से ज्यादा नहीं रही होगी, स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारियों और शहीदों के कफ़न को नोच-नोच कर खा रहे हैं और पेंशन व सुविधाओं के नाम पर सरकार को हर माह 50 करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगा रहे हैं.”

-शिवनाथ झा

कितनी बड़ी विडम्बना है कि भारत के आवाम को अपने गिरेबान में अपने को झांकने तक की हिम्मत नहीं है, आईने का इस्तेमाल वो सिर्फ अपने गेसुओं को सुसज्जित करने के लिए करते हैं, अपने नजर से अपने को देखने की ताकत नहीं रखता है, लेकिन शासन, सरकार, व्यवस्था के कारनामों को धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता. आज अगर राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर या सुमित्रानंदन पन्त या सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ या गोपाल सिंह नेपाली जीवित होते तो शायद भारतीय आवाम का राष्ट्र के प्रति, हुतात्माओं के प्रति, उनके वंशजों के प्रति लगातार “तिरष्कार और निरादर” तथा उनका उनके प्रति “मानसिक दरिद्रता” पर कई गद्य-पद्य लिखे गए होते.

भारत को आजाद हुए मात्रा 65 साल हुए. आज भारत के 123 करोड़ की आवादी में लगभग 59 करोड़ इस आयु और इससे अधिक आयु के लोग जीवित हैं जिन्होंने अपनी आँखों से देश की आजादी के लिए भारतीय नौजवानों को अंग्रेजी हुकूमत के हाथों गोली खा कर मरते देखा होगा, हँसते-हँसते अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए फांसी के फंदों पर झूलते देखा होगा. कई माताओं को अपने बेटे की मौत से उसके स्तन को सूखते देखा होगा. कई सुहागनों को उसके मांगों से सिन्दुरे उजरते देखा होगा, चूड़ियों की खनखनाहट बंद होते सुना होगा. उनकी आँखें भी अश्रुपूरित हुए होंगे लेकिन आज उन्हें क्यों वह दर्द होगी, क्योंकि वे तो जिन्दा बच गए!

सन 1947 से अबतक भारत की जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि 1947 से पहले उन 33 करोड़ लोगों के मन में अपनी मातृभूमि की “अस्मिता” के लिए जो “बौखलाहट” थी, आज इन 123 करोड़ आवाम में वह “बौखलाहट” लगभग या तो “मृतप्राय” हों गयी है या फिर सभी, जो इस देश को चलाने का ठेकेदारी लेने का दावा करते हैं, “मानसिक रूप से इतने नपुंसक हों गए हैं की उन्हें अपने के सिवा कुछ और दीखता ही नहीं है.”

भगत सिंह को भारत के लोग इसलिए जीवित रखे हैं ताकि राजनितिक गलियारे में चलने वाली दुकानों में उनकी रोटियां सिकती रहे! भगत सिंह के परिवार और उनके परिजनों का क्या हाल हुआ इस देश में, वह इस देश के, या यूँ कहें, उन 65 वर्षों से अधिक उम्र वाले जीवित लोगों से छिपा नहीं है. इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्च्यात स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम क्रांतिकारियों या शहीदों और उनके वशजों के प्रति जो रवैया अख्तियार किया, इतिहास के पन्नों में “काले अक्षरों” में लिखा जायेगा और आने वाले युग के लोग, आज के युग के लोगों पर शर्मसार होंगे.

उन क्रांतिकारियों में मात्र भगत सिंह का नाम ही क्यों जीवित है? भगत सिंह की प्रतिमा ही सिर्फ भारतीय संसद में क्यों है? कहाँ गए और क्रांतिकारी? कहाँ गए और दूसरे शहीद? उन्होंने भी अपनी मातृभूमि के लिए अपने सीने पर गोली खाई थी, वे भी फांसी के फंदों पर झूले थे ? इस देश कर दुर्भाग्य है की स्वतंत्र भारत में भारतीय राज नेताओं ने क्रांतिकारियों और शहीदों की कुर्बानियों का जितना मजाक नहीं उड़ाया, उससे कहीं हजारों गुणा अधिक भारतीय आवाम ने उनकी कुर्बानियों का धज्जियां उड़ाई और आज भी अपनी दुकानें चला रहे हैं.

भारत के कितने लोग जानते हैं राजगुरु को, सुखदेव को, दामोदर चापेकर भाइयों को, बटुकेश्वर दत्त को, असफाक उल्लाह खान को, तात्यां टोपे को, सूर्य सेन को, बहादुर शाह ज़फ़र को, राम प्रसाद बिस्मिल को, चन्द्र शेखर आजाद को, ठाकुर दुर्गा सिंह को, ठाकुर रौशन सिंह को, खुदीराम बोस को, सत्येन बोस को, मातंगिनी हाजरा को, बाबु कुंवर सिंह को, जयपाल सिंह को, दामोदर राव को, अज़िमुल्लाह खान को, वाजिद अली शाह को, मंगल पाण्डेय को, जबरदस्त खान को, सुरेन्द्र साईं को, उधम सिंह को, रास बिहारी बोस को, मदनलाल धींगरा को, बैकुंठ शुक्ल को जतिन्द्रनाथ मुख़र्जी को, कुषाण कोंवर को? शायद दस फीसदी लोग भी नहीं? इन सभी क्रांतिकारियों ने मातृभूमि के लिए जो बलिदान दिया शायद आज के लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते?

इन क्रांति कारियों और शहीदों के वंशज आज भी जीवित है, अन्य भारतीय लोगों की तरह – किसे मतलब है? सोच तो वह सकता है, जिसमे ‘दूसरों के लिए’ सोचने की काबिलियत हों, “मानसिक रूप से बाँझ मनुष्य, चाहे शासन में हों या सड़क पर, क्या सोचेगा इन हुतात्माओं के वंशजों के लिए.”

भारत के पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय के. आर. नारायणन ने स्वतंत्रता दिवस के 50 वें वर्ष का जश्न मानते भारतीय लोगों और भारत के सरकार से कहा था: “यह दुर्भाग्य है कि आजादी के पचास साल बीतने पर भी स्वतंत्र भारत के लोग और भारत की सरकार उन क्रांतिकारियों और शहीदों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, उसे देने में पूर्ण रूप से असफल रही है. यह भी दुर्भाग्य है कि आज भारत के लोग उन क्रांतिकारियों और शहीदों पर बीते जुल्मों और कहर की कल्पना तक नहीं कर सकते. आज स्वतंत्र भारत में इस देश के लोगों की एक-एक सांस उन क्रांतिकारियों और शहीदों का ऋणी है.”

इतना ही नहीं, पूर्व राष्ट्रपति ने आगे कहा: “भारतीय संविधान के तहत भारतीय संसद (उच्च सदन) में राष्ट्रपति को यह अधिकार प्रदात है कि वह बारह सदस्यों का मनोनयन सम्बद्ध महानुभावों की काबिलियत और दक्षता के आधार पर करे. हमें कहते यह काफी तकलीफ हों रही है कि उच्च सदन के गठन (1952) के पश्चायत आज तक क्रांतिकारियों और शहीदों के परिवारों से एक भी व्यक्ति को इस सदन में स्थान नहीं दिया गया है…..भारत के लोग सोचें एक बार जरुर.”

क्या भारत के पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत के. आर. नारायणन ने कहीं “राष्ट्रपति के अधिकारों की सीमितता या राष्ट्रपति पर भारतीय राज नेताओं, पार्टियों या सरकारों की ‘अदृश्य दबंगता’ या ‘अदृश्य अधिपत्य’ की ओर तो इशारा नहीं किया था जो संविधान के तहत अधिकार होते हुए भी राष्ट्रपति और उनका कार्यालय मूक-दर्शक, पंगु बना रहा है.” यदि देखा जाए, तो यह मूल रूप से भारतीय व्यवस्था और भारतीय आवाम द्वारा उन क्रांति कारियों और शहीदों के वलिदान का मात्र एक मजाक उड़ना है जो आने वाले दिनों में एक क्रांति की ओर इशारा करता है.

इतना ही नहीं, अब जरा भारतीय लोगों में “मानसिक बाँझपन” को देखें. वैसे भारत सरकार और गृह मंत्रालय के पास कोई अधिकृत सूची नहीं है जिसके आधार पर स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों या शहीदों को सुचिवद्ध किया जाये. लेकिन, बिडम्बना यह है की आज भारत के 1,72,545 लोग प्रत्येक माह 11,331 रूपये की दर से स्वतंत्रता सेनानी पेंशन उठाते हैं. भारत सरकार स्वतंत्रता आन्दोलन पेंशन योजना पर प्रत्येक वर्ष कुल 645 करोड़ रूपये खर्च करती है जिसमे पेंशन की नगद राशि के अतिरिक्त इन्हें मिलने वाले अन्य सुविधाएँ भी सम्मिलित हैं.

इन लाभान्वित लोगों में करीब बत्तीस फीसदी ऐसे लोग हैं जिनके आयु मात्र 70-72 वर्ष के बीच है. अब आप खुद सोचें की जिस साल देश आजाद हुआ होगा उस वर्ष इनकी आयु पांच से सात वर्षी की रही होगी. क्या योगदान रहा होगा स्वतंत्रता संग्राम में? इसका अर्थ तो यही माना जायेगा कि करीब 44,000 लोग शहीदों के कफ़न को आज भी नोच-नोच कर खा रहे हैं?

हम भारतवासी बेशक खुद को पाक-साफ बता कर भष्टाचार-रहित समाज के अखाड़े में उछल-उछल कर पहलवानी करें कि हम “भ्रष्ट नहीं हैं”, और सरकार या व्यवस्था की गलतियों पर “डुगडुगी लेकर भारत भ्रमण पर निकल जाएँ” या फिर देश की राजधानी के जंतर मंतर पर “लंगोटा” लपेट कर धरना देने पर आमादा हों जाएँ, लेकिन इस सत्य को कोई नहीं झुठला सकता कि देश के 44 हज़ार से भी ज्यादा 70-72 साल के बुजुर्ग जिनकी उम्र आज़ादी के समय 5-7 साल से ज्यादा नहीं रही होगी, स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रांतिकारियों और शहीदों के कफ़न को नोच-नोच कर खा रहे हैं और पेंशन व सुविधाओं के नाम पर सरकार को हर माह 50 करोड़ से भी ज्यादा का चूना लगा रहे हैं.

कौन है चोर? कौन है बेईमान? इसका निर्णय कौन करेगा?

 

(लेखक एक वरिष्ट पत्रकार है और स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों और शहीदों के जीवित गुमनाम वंशजों को एक प्रतिष्ठित सामाजिक और आर्थिक जीवन प्रदान करने में मशरूफ़ हैं. अब तक चार ऐसे वंशजों को नया जीवन देने में कामयाब रहे हैं और पांचवे के लिए अभी हाल में इन्होने एक फिल्म भी बनायीं है “एक खोज भारत की: स्वतंत्रता आन्दोलन 1857-1947 के शहीदों के गुमनाम वंशजों की दास्ताँ, एक जीवंत फिल्म )

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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3 thoughts on “शहीदों की चिताओं पर लगते हैं हर बरस मेले… अपनी रोटी सेंकने वाले मुनाफाखोरों और चोरों के?

  1. सचमुच अच्छा लेख है आपका, ये हमें बताता है की भ्रस्ताचार किस हद तक फैला है हमारे समाज में. इसके साथ साथ ये हमे ये भी बताता है की जाने अनजाने हम किस प्रकार अपने शैदों को भूल गए है

  2. शिवनाथ जी, खबर अच्छी है, लेकिन आज के इस युग में ऐसे लेख पढने की आदत छुट गयी है पाठकों को. मैं गाँधी नगर, गुजरात में एक अध्यापिका हूँ और बच्चो को इतिहास पढ़ाती हूँ. बीस साल में मैंने भी अपने प्रदेश में स्कूली बच्चों के इतिहास के पन्नों से इन क्रांतिकारियों और शहीदों की तस्वीर को फटते देखी हूँ और उनके स्थानों में राजनेताओं की तस्वीर और गाथाओं को को उद्धृत होते भी. मैंने आपके बेटे को और आपको लोक सभा टीवी तथा दूरदर्शन पर इस विषय पर चर्चा को भी देखी हूँ. आपके प्रयास को सराहनीय शब्द से बंधना नहीं चाहती, सिर्फ इतना ही कहूँगी आपका यह लेख हमारी आँखें खोल दी है, अब बच्चों को भी बताएँगे, फक्र है आप पर. मीडिया दरबार को भी शुक्रिया.

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