बेकार हो गयी भगत सिंह की कुर्बानी……

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आज हमारे देश की जो हालत है या यूँ कहे की हमने आज जो अपने देश की हालत कर दी है उससे ये यकीन नहीं होता की इसी देश के  लाल  ने कहा होगा “माँ , मेरी लाश लेने आप मत आना , कुलबीर को भेज देना , वरना आपको रोता देख लोग कहंगे , देखो भगत सिंह की माँ रो रही है .”

ये जज्बा था भारत के उस वीर सपूत का जिसने देश कि आजादी के लिए बिना आपने माँ-बाप कि चिंता किए हुए देश के लिए मौत को भी हस्ते हुए गले से लगा लिया क्यूँ कि उस वीर के लिए उसकी भारत की मिटटी ही माँ थी और ये खुला आसमान उसका पिता.  आज हमारे देश की जो हालत है उसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी की जिस भारत की आजादी के लिए वो मौत को हँसते हुए गले लगा रहे है, एक दिन उस भारत को उनके अपने ही लूटेंगे. भगत सिंह, सुखदेव, राज गुरु और अन्य वीरों इस लिए अपने आपको देश के लिए कुर्बान नहीं किया था कि एक खुद इसी देश के लोग एक दूसरे को लुटे, एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाये, हमारे देश के नेता जिन्हें देश की जनता विश्वास और उम्मीद से अपना नेता चुनती है, वही उन जनता का खून चूस कर रोज नए नए घोटाला करे और देश की गरीब जनता की खून पसीने की कमायो को विदेशो में बैंक में पंहुचा दे.  आज कहीं उन वीरो की आत्मा देश कि हालत को देख रही होगी तो देश की किस हालत को देख कर रो रही  होगी और खुद को कोष रही होगी कि क्या इस आजादी के लिए उन्होंने अपनी जान की क़ुरबानी दी थी.??  ऐसी आजादी से अच्छी अंग्रजो कि गुलामी थी, कम से कम तब हम ये कह सकते थे कि हम गुलाम है इस लिए हमारी मज़बूरी है उनके अत्याचार और मनमानी सहना लेकिन आज हमारे अपने जिन्हें हम इस उम्मीद के साथ चुनते है कि शायद ये नेता हमारी परेशानियों को समझे हमारे लिए कुछ करे. लेकिन चुनाव खत्म होते ही वो सारे वादे, वो सारी सहानिभूति बस एक इतिहास बन जाता है. चुनाव जीतते ही सभी अपनी जेब भरने और हमारा खून पिने में जुट जाते है.

जब कभी इन वीरों का जन्म दिवस या शहादत दिवस आता है तो हमारे नेता या हमारे देश की जनता कहती है कि “हमे गर्व है कि ऐसे वीर हमारे देश में जन्म लिया, इन वीरों ने देश के लिए जो क़ुरबानी दी है, उनके लिए हम उनका अहसान कभी नहीं भूलेंगे, ऐसे वीरों को हमारा शत-शत नमन” लेकिन बाकी पुरे साल हम देश कि जनता अपने काम में अपने परिवार में और देश के नेता एक दूसरे पर आरोप-प्रयारोप और नए-नए घोटालों में इतना व्यस्त हो जाते है कि ये भी भूल जाते है कि कोई भगत सिंह, सुखदेव और राज गुरु भी था जिन्होंने देश के लिए हँसते हुए अपनी जान दे दी, हम सोचते है कि इन वीरों के सम्मान में हमने किसी चौराहे पर इनकी मूर्ति लगा दी या किसी सड़क, किसी चौराहे, किसी पार्क का नाम रख दिया, या इनके जन्म दिवस और शहादत दिवस पर इनके नाम से दो चार जयकार लगा दी तो हमारी जिज्म्मेदारी खत्म हो गयी, भले ही बाकि दिन हमे इस बात कोई मतलब ना हो कि उन मूर्तियों कि साफ-सफाई होती है या नहीं, उन सडको के किनारे हम पान और गुटखा खा कर पिक मार कर उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा देते है अगर इससे भी हमारा दिल नहीं भरता तो हम सड़क के दीवारों के किनारे खड़े होकर धार मरने में अपनी शान समझते है. क्या देश केलिए जान देने वाले इस सम्मान के हकदार  है ?? क्या इसीलिए उन्होंने अपनी जान दी थी ?? बिकुल भी नहीं भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने इन सब केलिए अपनी क़ुरबानी नहीं दी थी, उनका सपना था कि हमारे अपने एक खुली हवा में साँस ले एक सम्मान कि जिंदगी जिए लेकिन बड़े दुःख कि बात है आज आजादी के 64 साल बाद भी उनका सपना पूरा होता हुआ नहीं दिख रहा है. हम आज से 64 साल पहले भी गुलाम थे और आज भी किसी गुलाम से कम नहीं है.

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Vikas K Sinha

This is Vikas K Sinha, I am basically from Village + Post Bajitpur kasturi, Anchal - Sahdei Buzurg, District - Vaishali, Bihar. but living in Delhi. I am Working in a private company as a office asst. and also doing some social work with my some friends
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6 thoughts on “बेकार हो गयी भगत सिंह की कुर्बानी……

    1. सुधीर जी कुछ चीजे ऐसी होती है जो न चाहते हुए भी यकीन करना पड़ता है….. मैं आपसे पूछना चाहूँगा की हम जो श्रधांजलि देते है इससे ऐसे लोगो को कोई फर्क पड़ता है क्या?? और ये हम सभी जानते है कि हमारी बाते वो नहीं सुन रहे है लेकिन फिर फी हम उन्हें धन्यवाद या श्रधांजलि देते है….. ठीक उसी तरह मैंने भी कहा है कि ” आज कहीं उन वीरो की आत्मा देश कि हालत को देख रही होगी तो देश की किस हालत को देख कर रो रही होगी और खुद को कोष रही होगी कि क्या इस आजादी के लिए उन्होंने अपनी जान की क़ुरबानी दी थी.??”

  1. सन १९४७ में जब देश आजाद हुआ, उस समय भारत की आवादी ३३ करोड़ थी, आज १२१+करोड़ है. पुरेस देश में राजनैतिक व्यवस्था चालाने वाले लोगों की संख्या, भारतीय संसद से लेकर विभिन्न राज्य के विधान सभाओं और विधान परिषदों में निर्वाचित और चयनित सदश्यों की संख्या सहित, मात्र ७०००+ है, जो पुरे देश के आवाम की संख्या में “नगण्य” के बराबर है. दुर्भाग्य यह है की देश का १२१ करोड़ “मानसिक रूप से नपुंशक आवाम” अपने गरेवान में नहीं झांक कर उन नगण्य राजनेताओं को दोषी ठहरता है, जिन्हें वे “देश को लुटने के लिए” निर्वाचित या चयनित करते हैं.
    सिर्फ भगत सिंह ही क्यों? बटुकेश्वर दत्त क्यों नहीं? राज गुरु क्यों नहीं? सुखदेव क्यों नहीं? अशफाक उल्लाह खान क्यों नहीं, राम प्रसाद बिस्मिल क्यों नहीं, ठाकुर रोशन सिंह क्यों नहीं, खुदीराम बोस क्यों नहीं? सत्येन बोस क्यों नहीं? भगत सिंह इसलिए आज उनके नाम पर पंजाब के नेता अपनी-अपनी रोटी सेंक सकें राजनितिक अखारे में?
    मुझे यह बात नहीं कहनी चाहिए, क्योंकि सत्य करुआ होता है, लेकिन समझेगा या करुआ तो उसे लगेगा जो “मानसिक रूप से बाँझ नहीं हो”. भारत का आवाम न केवल मानसिक रूप से नपुंशक है बल्कि बाँझ भी और इतिहास कभी इसे माफ़ नहीं करेगा.

    1. सर जी अगर अगर आपने पोस्ट को ध्यान से पढ़ा होगा तो देखा होगा की इस पोस्ट में केवल देश नेताओं को ही नहीं बल्कि देश १२१ करोड जनता भी आईना दिकहने की कोशिश की गयी है. जहाँ तक सवाल है की सिर्फ भगत सिंह ही क्यों? बटुकेश्वर दत्त क्यों नहीं? राज गुरु क्यों नहीं? सुखदेव क्यों नहीं? अशफाक उल्लाह खान क्यों नहीं, राम प्रसाद बिस्मिल क्यों नहीं, ठाकुर रोशन सिंह क्यों नहीं, खुदीराम बोस क्यों नहीं? सत्येन बोस क्यों नहीं? मै आपकी इस सवाल का सम्मान करता हू. लेकिन साथ ही कहना चाहूँगा की जिस तरह हम होली के अवसर पर दिवाली की शुभकामनाये नहीं दे सकते उसी तरह ये पोस्ट शहीद दिवस को समर्पित है इस लिए इस पोस्ट में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की बात की गयी है. जहाँ तक नेताओं के रोटी सेंकने की है तो इन्हें तो बस मौका मिलना चाहिए, ये नेता तो अपने बाप के भी नहीं होते. आपने बिलकुल सही कहा की हमारी आवाम मानसिक रूप से नपुंशक है.

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