सरकार की एक-एक फाईल देखेंगे मुलायम ‘मुख्य मंत्री कार्यालय का ठप्पा’ लगने से पहले

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-शिवनाथ झा।।

मिथिला ही नहीं अवध में भी एक कहावत बहुत प्रचलित है – “छौंरा (युवा) मालिक, बुढ (बुजुर्ग) दीवान, काम बिगड़े सांझ-बिहान.” यानि, जिस शासन और व्यवस्था की बाग़-डोर किसी ‘अनुभवहीन’ युवा के हाथों सौंप दिया जाए और राज्य के कोषागार की देख-रेख बुजुर्गों के हाथ दे दिया जाए, उस प्रदेश का विकास तो होगा, परन्तु, विकास के मार्ग में ‘अनवरत बाधाएं’ उपस्थित होती रहेंगी, जो ‘जन-कल्याण’ के ‘प्रतिकूल’ होगा।

ईश्वर ना करे कि उत्तर प्रदेश के नव-निर्वाचित मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव के क्रिया-कलाप में किसी भी प्रकार का कोई भी ‘विघ्न’ बढ़ाएं उपस्थित हों, और प्रदेश के आवाम से किये गए सम्पूर्ण वायदों को पूर्ण कर, भारत के इतिहास में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्य-मंत्री-काल को एक “स्वर्णिम-काल” के रूप में उद्धृत करने में कोई चूक हो, परन्तु अगर आतंरिक सूत्रों की सूचनाएं सही हैं तो “अखिलेश यादव को कई बार अग्नि-कुण्ड में परीक्षा देनी होगी”.

आतंरिक सूत्रों के अनुसार, “नगर-निगम से लेकर राज्य की पुलिस व्यवस्था तक, वित्त से लेकर शिक्षा तक, जमीन से लेकर जायदाद तक, प्रदेश के विकास और रख-रखाव से सम्बंधित एक-एक फाईल को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष, प्रदेश के पूर्व-मुख्य मंत्री और मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव के पिता श्री मुलायम सिंह यादव के नज़रों के सामने से गुजरना होगा – अवलोकनार्थ.”

इसका अर्थ यह हुआ कि “हाथी के दो दाँत” वाली कहावत यहाँ चरितार्थ होने जा रही है. एक प्रदेश – दो मुख्य मंत्री. एक – दिखने वाले और दूसरे – देखने वाले. और वैसे भी, यदि देखा जाये, तो “अखिलेश यादव की ऊंचाई (भले ही वे मुख्य मंत्री पद पर आसीन हों गए हैं) इतनी अधिक नहीं हुई है कि वह अपने पिता के पांच दशकों की ‘राजनितिक-पहलवानी’ को शिकस्त दे दें. आखिर, मुलायम सिंह यादव हैं तो पहलवान ही और खेल के मैदान में खेल को खेल की भावना से ही खेलेंगे, चाहे सामने वाला बेटा ही क्यों ना हों?

इतिहास भी इस बात का गवाह है कि “कोई भी राजा (जंगल में शेर भी ) तब तक अपने राज्य/क्षेत्र का सम्पूर्ण भार अपने उत्तराधिकारी (चाहे अपनी संतान ही क्यों ना हों) को तब तक नहीं सौंपता और सभी कुटिल-नीति तब तक नहीं सिखाता, जब तक उसे यह विश्वास ना हों जाये कि अब प्रदेश या उसका इलाका उसके हाथों में सुरक्षित है और आवाम में अमन-चैन रखने में वह सामर्थवान है”. वैसे, अच्छे गुरु ऐसे ही होते हैं.

सूत्रों का कहना है कि “चुकि अखिलेश भैया उत्तर प्रदेश जैसे राज्य की राजनितिक-शतरंज की चालों से बहुत अधिक (या यूँ कहें, ना के बराबर) वाकिफ नहीं हैं, इसलिए कोई भी व्यक्ति, चाहे पर पार्टी में हों या मंत्रिमंडल में, विश्वास-पात्र अधिकारी हों या कोई और, कहीं भी जाल में फंसा सकते हैं. इससे अखिलेश जी राज्य के आवाम से किये गए वायदों को पूर्ण करने में सक्षम नहीं हों पाएंगे.” यदि देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री कि “वास्तविक हालत देश के प्रधान मत्री डॉ. मनमोहन सिंह कि तरह ही होने वाली है जैसे प्रधान मंत्री सभी सरकारी फैसले के लिए पार्टी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी के प्रति उत्तरदायी हैं, उसी तरह, अखिलेश यादव को भी अपने पार्टी अध्यक्ष के प्रति उत्तरदायी होना पड़ेगा.”

सूत्रों का कहना है कि हाल की परिस्थिति में “पूर्व-मुख्य मंत्री सुश्री मायावती के खिलाफ किसी भी प्रकार कि कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी, जब तक आंतरिक जांच के आधार पर राजकोष का दुरूपयोग से सम्बंधित सम्पूर्ण साख्य एकत्रित नहीं कर लिए जाते. इस सम्बन्ध में प्रतिष्ठित कानून वेत्ताओं, आय-कर विभाग के अवकाश प्राप्त अधिकारियों कि भी सेवा ली जा सकती है.”

सूत्रों के अनुसार, “हमारी कोई भी व्यक्तिगत लड़ाई मायावती जी से नहीं है. भारत के राजनैतिक इतिहास में कोई भी दूसरी महिला पिछले 65 सालों में अवतरित नहीं हुई जो अपने बल पर, अपने समुदाय के लोगों को एकत्रित कर, प्रदेश के आवाम का विश्वास जीत कर यहाँ तक पहुंची हों. यह काबिले तारीफ है और हम सभी इसका आदर और सम्मान करते हैं. लेकिन राज्य की सम्पदा और राजकीय कोष, प्रदेश के आवाम का है, और इसे इस कदर व्यय करना सार्थक नहीं दिखता.”

बहरहाल, मायावती जी पर वर्तमान सरकार का जो भी “रुख” हो, लेकिन एक बात तो तय है कि प्रदेश के आला अधिकारी, विशेषकर, पुलिस और न्यायपालिका से जुड़े लोगों पर “वज्रपात” होने वाला है. सूत्रों का कहना है कि “प्रदेश में कानून-व्यवस्था को बनाये रखने के लिए एक नए प्रयोग कि सम्भावना है, जो मूलतः, वैज्ञानिक तकनीकों पर आधारित है और भारत के किसी भी प्रदेश में अब तक लागु नहीं किया गया है. यह अखिलेश यादव और उनके कोर-ग्रुप की सूझ है, जिससे प्रदेश में लोगों का विश्वास कानून व्यवस्था पर पुनः स्थापित हो सके.” यह पूछने पर कि क्या इसमें ‘समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भी क़ानूनी कार्रवाई सन्निहित है, सूत्र का कहना है कि “कोई भी राजनीतिक पार्टी इस बात को खंडित नहीं कर सकते है कि उनकी पार्टी में ऐसे तत्व नहीं हैं, समाजवादी पार्टी भी अछुता नहीं है, लेकिन पार्टी के ऊपर कोई नहीं है. हमारी कोशिश होगी कि इन सबों से छुटकारा पाया जा सके.”

यह सवाल पूछने पर कि “अपराध और अपराधिक गतिविधि” पर समाजवादी पार्टी का “दो व्यक्ति-दो रुख” क्यों होता है – जैसे एक ज़माने में मुलायम सिंह यादव के मित्र डीपी यादव को अपराधी कि श्रेणी में डाल कर उन्हें उनके पुत्र अखिलेश यादव के भी नजर में गिरा दिया जाता है, वहीँ रघुराज प्रताप सिंह @ राजा भैया को मंत्रिमंडल में सम्मिलित किया जाता है और कई अन्य अपराधिक गतिविधियों में संलग्नित नेताओं को पीठ थपथपाने में कभी भी, कहीं भी कोताही नहीं किया जाता है”, सूत्र ने कहा: “भाई साहेब आप हमारे बहुत पुराने मित्र हैं, और आप से मैं झूठ बोल नहीं सकता, हमारी भी इच्छा है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं सम्पूर्ण भारत में राम-राज्य हों….लेकिन.”

एक बात और तय है, किसी भी जिले के जिलाधिकारी या पुलिस अधीक्षक को दो वर्ष के कार्य-काल से पहले किसी भी हालत में अस्थानान्तरित नहीं किया जायेगा, भले ही उनपर किसी भी प्रकार कि लांछना लगे. लेकिन, लांछना साबित होने पर उन्हें तक्षण उनके “होम-केडर” को सुपुर्द कर दिया जायेगा. प्रदेश के अधिकारीयों के मामले में, उनपर लगी शिकायतों कि सुनवाई “फास्ट-ट्रैक कोर्ट” में होगी. ज्ञातब्य है कि 2009 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि वह देश में 150 साल पुरानी पुलिस एक्ट में संशोधन कर “रिफॉर्म” की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दे.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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