अगर “खादी” के जुल्मों से बचना है, तो “खाकी” का साथ देना होगा

admin 4
Read Time:16 Minute, 0 Second

-शिवनाथ झा।।

कितनी बड़ी विडंबना है कि भष्टाचार के खिलाफ समाज के “तथाकथित” ठेकेदारों ने संसद को सड़क पर लाने का अथक प्रयास भी किया, करोड़ों रूपये का आदान-प्रदान हुआ, पूरे देश में मानो एक ‘कोहराम’ मच गया, लेकिन इसी समाज में जब एक ईमानदार पुलिसकर्मी  अपने माता-पिता, अपनी पत्नी को विधवा और बच्चों को अनाथ कर इन्ही भ्रष्ट लोगों का शिकार हो गया और अपनी जान गवां बैठा, तो ये कथित अलंबरदार और समाज के संभ्रांत लोग अपने-अपने घरमे दुबक जाते हैं उसी तरह जैसे “सांप काट लिया हों।”

बाबजूद इसके कि लोगों का खाकी वर्दी वालों पर से विश्वास उठता जा रहा है, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है की आधी-रात को भी जब किसी के घर कोई हादसा होता है, तो लोग अपनी जवान बेटी, बहु को इन्ही खाकी वर्दी वालों के हिफाजत में छोड़ते हैं। हालात चाहे कुछ भी हों, आज भी अगर समाज में लोगों की इज्जत, माँ-बहनों-बहुओं की इज्जत बची है तो सिर्फ और सिर्फ इन्ही खाकी वर्दी वालों के “खौफ” से।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समाज के मन में इनके प्रति जो “सामाजिक” और “संवेदनात्मक भावनाएं” होनी चाहिए वह सही मायने में दिख नहीं रही है।

एक नजर देखें:
भारतीय पुलिस सेवा के 40 वर्षीय के सी सुरेन्द्र बाबु सहित छह पुलिस कर्मी बिहार के मुंगेर जिले में नक्सल के लैंड माइन विष्फोट में मारे जाते हैं। उनके पार्थिव शरीर पर एक 85-वर्षीय पिता रोता है, उसकी पत्नी लक्ष्मी देवी अपनी “चूड़ियों को तोड़कर घर के एक कोने में पड़ी होती है, उनके बच्चे अपने पिता की लाश के सामने अपने जीवन की बीच मझधार में खड़ा होते हैं। प्रदेश, या यूँ कहें पूरे देश का आवाम अपने-अपने घरों में अपने परिजनों के साथ आराम फरमाते रहता हैं। किसी के घर में “सन्नाटा” तो बाहर “महफिलें” सजी होती हैं।  सुरेन्द्र  बाबु  बिहार के मुंगेर जिले के नक्सल  क्ष्रेत्र  में  कॉम्बिंग  ऑपरेशन कर वापस आ रहे थे तभी नाक्सलियों का शिकार हुए।

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नरेन्द्र कुमार सिंह की पत्नी मधुरानी तेवतिया अभी अपने पति और घर के लोगों के बीच अपने बच्चे की किलकारी को सुन भी नहीं पाई थी, पिता श्री केशव देव अपने हाथों में अपने पुत्र को रंग और गुलाल लिए दरवाजे पर इंतज़ार कर रहा था, की इस पुलिस अधिकारी को माफिया वालों ने एक ट्रेक्टर के नीचे दबा कर मार  डाला। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है की इस मामले में उस

क्षेत्र के खाकी वर्दी वालों का भी माफिया के साथ ‘ताल-मेल’ हों, लेकिन, इस कदर किसी की जिन्दगी को मिटटी में रौंदना कहाँ का ‘पुरुषार्थ’ है? समाज यहाँ भी सोई हुई है। पिछले दिनों, भारतीय पुलिस सेवा के 37-वर्षीय अधिकारी राहुल शर्मा अपने वरिष्ट अधिकारीयों के दवाव के कारण आत्महत्या कर ली। शर्मा नक्सल क्षेत्र में एक “खौफ” थे जो वहां के वरिष्ट अधिकारियों, राज नेताओं और नक्सलियों से मिले लोगों को पसंद नहीं था।

क्यों मारे जा रहे हैं भारतीय पुलिस सेवा के युवा अधिकारी या विभिन्न राज्यों के युवा पुलिस कर्मी जो माफिया या नक्सल को जड़ से नस्तोनाबुद करना चाहते हैं जिसके लिए वे पुलिस फ़ोर्स ज्वाइन करने से पहले भारतीय संविधान या पुलिस एक्ट और मैनुअल के तहत उद्धृत “कशम” को खाते हैं? कहीं यह “झूठा तो नहीं है? या कही यह आम आदमी को बेबकूफ बनाने के लिए तो नहीं है? या कहीं स्वतंत्र भारत में सफ़ेद पोश राजनेता गण अपने स्वार्थ सिद्धि या अपनी कुर्शी को बचाने के लिए इन माफिया से साथ-गाँठ कर इन खाकी वर्दीधारियों को “बलि का बकरा” तो नहीं बनाते है?

क्यों नहीं होता है जन-आन्दोलन? क्यों ना लोग इस मृतक परिवारों के लिए सड़क पर आते है? क्यों इन “हत्याओं” को “हादसा” समझा जाता है? क्यों इन शहीदों के कफ़न पर भी “राजनीति” होती है? क्या इस देश के लोग, जन मानस, जिसकी सुरक्षा के लिए ये खाकी वर्दी पहनते हैं, सभी “मानसिक तौर पर नपुंसक” हों गया है? बहुत सारे सवाल हैं, जिसका जबाब समाज आज भले ना दे, लेकिन कल उसे अपनी “नपुंसकता” पर लज्जा आएगी, तब तक बहुत देर हों गयी होगी।

भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ट अधिकारी मीडिया दरबार को कहते हैं, “इस देश का दुर्भाग्य है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के 65 साल बाद भी हम (पुलिस) को शासन और प्रशासन में दूसरी श्रेणी में रखा जाता है। हमें प्रशासनिक सेवा के अधिकारीयों के अधीन काम करना पड़ता है जबकि दोनों एक ही परीक्षा के माध्यम से चयनित होते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार नहीं चाहती है कि भारत में पुलिस बल को क़ानूनी दृष्टि से सबल बनाया जाए, और इसका ज्वलंत उदहारण लगभग 150 साल पुराना पुलिस एक्ट है जिसे अंग्रेजों ने बनाया था।

तत्कालीन वरिष्ट पुलिस महा निदेशक प्रकाश सिंह ने 1996 में सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की थी जो मुलहट इस बात को उजागर करने की कोशिश थी कि ‘प्रशासनिक अधिकारी और राजनेताओं के बीच’ कैसे पिस रही है भारत की पुलिस। पुलिस एक्ट 1861, जिसके तहत आज भी देश में पुलिसिंग होता है। देश का दुर्भाग्य है कि 19 अगस्त 2009 को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद आज तक इस कानून में ना तो कोई परिवर्तन किया गया हैं और ना ही, केंद्र और राज्य सरकारों को दिए गए अन्य निर्देशों पर अमल किया गया है। अगर सम्पूर्ण रूप में इन निर्देशों का पालन होता है, तो समाज के सभी ‘तथाकतित ठेकेदारों को, चाहे वह राज नेता हों या प्रशासनिक

अधिकारी, या अन्य, बीच सड़क पर जनता के सामने नग्न कर देगी खाकी वर्दी वाले, इतना दम है पुलिस में, कानून में।” वैसे सरकारी आंकड़ों पर भी भरोसा नहीं किया जा सकता है, फिर भी, सरकारी आंकड़े यही कहते हैं कि पिछले 2005 और 2011 के बीच पुलिसकर्मियों की मौत, भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सहित, में तीन-गुणा का इजाफा हुआ है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, झारखण्ड, उड़िसा में मरने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या सबसे ऊपर है। अधिकाशतः इन पुलिस कर्मियों की मौत वहां हुई है जहाँ प्राकृतिक सम्पदा का खनन हों रहा है या प्रदेश नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आता है या केन्द्रीय कोषों के तहत विभिन्न राज्यों में ‘ठेकेदारी प्रथा’ के अधीन विभिन्न परियोजनाएं सम्पादित किये जा रहे हैं।

कुल मिलाकर, हरेक स्थिति में “अर्थ” लिप्त है और ‘समर्थ’ की ‘हत्याएं’ हों रहीं है। यह दुर्भाग्य है। भारतीय पुलिस सेवा के सुरेन्द्र बाबु की हत्या इस बात का प्रमाण था कि जो भी नक्सलियों के विरुद्ध कारर्वाई करेगा वह मारा जाएगा। सुरेन्द्र बाबु यह भलीभांति जानते थे कि बिहार और झारखण्ड के 70 फीसदी से अधिक राज नेतागण, वरिष्ट अधिकारी, मंत्रीगण का इन नक्सल या भूमि सेना के सिपाहियों और नेताओं के साथ ताल-मेल है।

अन्वेषण के अनुसार इन क्षत्रों में जितने भी पुलिस कर्मियों की मौत हुई हैं उनमे 40 फीसदी से ज्यादा पुलिस कर्मी ऐसे हैं जिनकी आयु 18 और 35 वर्ष के बीच थी, और इनमें 60 फीसदी “नव-विवाहित” थे, 25 फीसदी अपने बच्चों का पहला जन्म दिन भी नहीं मना पाए, और शेष 15 फीसदी पुलिस कर्मी की पत्नियाँ ‘गर्ववती’ थीं। इतना ही नहीं, मारे गए पुलिस कर्मियों में 30 फीसदी की आयु 35-45 वर्ष थी और वे अपने माता-पिता व परिवार को जीवन और सहारा देने का एक मात्र रोजगार में लगी संतान थे। शेष 30 फीसदी 45 वर्ष से अधिक के उम्र के थे जिनके बच्चे अनाथ और बीवियां अबला हों गईं और पिता उन्हें अपने पेंशन पर जीने के लिए छोड़ कर चले गए।

धिक्कार है ऐसे समाज को। धिक्कार है भारत के उस जन मानस को जो “सफ़ेद” वस्त्र पहने “सफ़ेद-पोश” अपराधियों के पीछे तो भागते हैं, उनकी जयकार करते हैं लेकिन “खाकी-वर्दी” को पहनकर अपने कार्य को अंजाम देने वाले पुलिस कर्मियों के शव के पीछे जाने वाला भी कोई नहीं होता! भारत में भारतीय पुलिस सेवा के कुल 4720 अधिकृत पद हैं, जिसमे 3270 पदों पर नियुक्ति जिसे संघ लोक सेवा आयोग परीक्षा के आधार पर करती है और शेष 1450 पदों पर नियुक्ति “प्रोन्नति” के आधार पर किया जाता है। दुर्भाग्य यह है कि जिस रफ़्तार से देश के आवादी बढ़ रही है, जिस रफ़्तार से आवादी और पुलिस कर्मियों का अनुपात घट रहा है, उस रफ़्तार से ना तो भारत के लोग, ना प्रदेश की सरकार और ना ही भारत की केंद्रीय सरकार इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल ली है।

जरा गौर फरमाइए: भारत में आज की तारीख में भी साढ़े-चार लाख से अधिक पुलिस का पद रिक्त है और आज से ही नहीं वर्षों से रिक्त पड़ा है। भारत के सभी राज्यों और केंद्र प्रसाशित प्रदेशों को मिलाकर कुल 20, 30,000 पद अधिकृत हैं जिसमे 15,60,000 पद पर ही लोग हैं।

अगर सच कहा जाये तो पुलिस को आज भी सरकार और समाज (भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी) अपने जुटे के नोक पर रखना चाहते हैं। क्योकि वे जानते हैं की जिस दिन “खाकी” मजबूत हों जायेगा, उस दिन से “खादी” की कीमत काम हों जाएगी। (ज्ञातब्य हों की भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की कोई आधिकारिक पोशाक नहीं होता है)।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी ने मीडिया दरबार से बातचीत करते कहते हैं: “इस देश का दुर्भाग्य है

की जो लड़ने जाता है, चाहे सीमा पर लादे या जंगल में, चाहे दुसरे देश के दुश्मन से लादे या जंगल में बीरप्पन या खदानों में अनधिकृत अधिपत्य जमाये माफिया से, उसके भविष्य की बाग-डोर एक एयर कंडीशंड कमरे में बैठे अधिकारी करता है जिसने कभी भारत की मिटटी और उसके गंध को महसूस नहीं किया है।

भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी लगातार, या यूँ कहें कि वर्षों से, इस विषय पर लड़ाई कर कहे हैं, लेकिन सरकार और संघ लोक सेवा आयोग नहीं चाहते हैं की भारत में एक पुलिस अधीक्षक का अधिकार उसी क्षेत्र में पदस्थापित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (जिला अधिकारी) से अधिक हों। अंग्रेज भी नहीं चाहता था कि पुलिस मजबूत हों, क्योकि अफसरान नहीं चाहते थे, पैसठ साल बाद भारत सरकार भी नहीं चाहती है कि पुलिस मजबूत हों क्योकि वह सबों को “उल्टा लटका देगी”।

अब आप स्थिति को सोचें: एक युवा भारतीय पुलिस सेवा का अधिकारी जैसे ही अपने नौकरी में आता है, सबसे पहले उसे अपना “पथ” की याद आता है और अपनी वर्दी पर लगे “स्टार” और “अशोक स्तम्भ”, जो भारत के प्रधान मंत्री या गृह मंत्री तक के नसीब में नहीं होता है। मरणोपरांत, भले ही उन्हें राष्ट्रध्वज में लपेट कर अंतिम संस्कार किया जाये! अभीतक किसी भी प्रदेश का गृह मंत्री (महाराष्ट्र को छोड़कर) या केंद्र के गृहमंत्री (जो संपूर्ण देश के कानून व्यवस्था का मालिक होता है), कभी किसी हादसे का शिकार कहाँ हुआ है सिवाय एक अपवाद को छोड़कर – पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री राजेश पायलट सड़क दुर्घटना के शिकार हुए थे, जो आज तक “संदेह के घेरे में है” कि वह “दुर्घटना थी” या “सुनयोजित हत्या”?

बहरहाल, आने वाला वक़्त ही बताएगा कि समाज पुलिस के प्रति, चाहे वह देश के किसी भी कोने में, किसी भी पद पर पदस्थापित हों, अपनी संवेदनशीलता दिखाती है या नहीं?

0 0

About Post Author

admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Facebook Comments
No tags for this post.

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

4 thoughts on “अगर “खादी” के जुल्मों से बचना है, तो “खाकी” का साथ देना होगा

  1. बिना जनसमर्थन के ही पुलिस वाले बहुत कुछ ऐसा कर रहे हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में नही आता !

  2. सच कहा शिवनाथ जी और धन्यवाद मीडिया दरवार को जिसने बेबाक लिखा है. शिवनाथ जी ने सच कहा है की भारत का अवाम ‘मानसिक रूप से नपुंशक’ हो गया है, पुरुषार्थ अब सिर्फ अपने हित के लिए दिखाया जाता है, जब तक लोगों के अपने घर में ऐसे हादसे नहीं होते तब तक किसी अन्य की मानसिक दशा को नहीं समझ सकते. वाग आ गया है जब समाज को अपने सम्पूर्ण संरक्षण के लिए सबसे पहले पुलिस को मानसिक संरक्षण देना होगा. एक बार फिर धन्यवाद शिवनाथ जी और मीडिया दरवार को.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

सरकार की एक-एक फाईल देखेंगे मुलायम 'मुख्य मंत्री कार्यालय का ठप्पा' लगने से पहले

-शिवनाथ झा।। मिथिला ही नहीं अवध में भी एक कहावत बहुत प्रचलित है – “छौंरा (युवा) मालिक, बुढ (बुजुर्ग) दीवान, काम बिगड़े सांझ-बिहान.” यानि, जिस शासन और व्यवस्था की बाग़-डोर किसी ‘अनुभवहीन’ युवा के हाथों सौंप दिया जाए और राज्य के कोषागार की देख-रेख बुजुर्गों के हाथ दे दिया जाए, […]
Facebook
%d bloggers like this: