क्या भ्रष्ट राजनीतिज्ञों की भेंट चढ़ जायेगा भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन?

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इतिहास गवाह है. राजा महाराजा अपनी रियासतों के विस्तार के लिए एक दूसरी रियासत पर हमला करते थे और अपने साम्राज्य के विस्तार में लगे रहते थे. युद्ध के लिए सेना जंहा से गुजरती, उस रस्ते में पड़ने वाले गांवों को लूट लिया जाता, फसलें तबाह कर दी जाती तथा जिस राज्य पर हमला होता उस राज्य के नागरिक भी आक्रमणकारी सेना द्वारा सताए जाते थे. राजा महाराजा बनने की जुगाड़ में रहते तो महाराजा सम्राट बनने की फ़िराक में निरीह नागरिकों को लूटते, मारते तथा उन्हें अपना गुलाम बनाते. यह सिर्फ हिंदुस्तान नहीं वरन सारी दुनिया का सच था.
समय के साथ सामंतशाही की की विदाई तो हुई, लेकिन सामंतशाही कोई प्रथा नहीं थी बल्कि एक सोच थी, विचारधारा थी, जो आगे जाकर राजनेताओं के दिलो दिमाग में धर कर गयी. जिसके चलते तानाशाही और भ्रष्ट तंत्र की दुनिया में नागरिक फिर से निरीह प्राणी की जमात में शामिल हो गया. अब दुसरे राज्य या देश का राजा या सेना नहीं लूटती, अब यह ठेका सरकार पर कब्ज़ा जमाये राजनेताओं, नौकरशाहों व कार्पोरेट क्षेत्र के चंद दिग्गजों तथा लोबिंग महारथियों के पास है. यह गाथा अकेले भारत की नहीं, विश्व के अनेक देश इसी श्राप के शिकार हैं. बरसों से लूट रहे निरीह प्राणियों की यह चुप्पी टूटी तहरीर चौक में और देखते देखते विश्व के कई देशों का निरीह नागरिक जाग उठा, इस निरीह प्राणी में अचानक इतनी ताकत आ गयी की कई तानाशाहों को बेआबरू होकर सत्ता छोड़नी पड़ी. भारतीय युवा भी भारत में कुछ ऐसी ही कल्पना कर रहा था. अचानक अन्ना हजारे सामने आये और जन लोकपाल बिल के मुद्दे पर दिल्ली में आमरण अनशन पर बैठ गए. जो सरकारी तंत्र और राजनेता अन्ना आन्दोलन को हल्का फुल्का मान रहे थे वो शायद ये भूल गए थे की इस देश के निरीह नागरिको के दिलों में भी एक आन्दोलन मचल रहा है, जो इंतज़ार कर रहा है किसी चिंगारी का. यही हुआ जब चौबीसों घंटे चलने वाले न्यूज़ चैनलों ने अन्ना हजारे के अनशन को दिखाना शरू किया तो आम भारतीय अन्ना के समर्थन में उतर गया नतीज़तन राजनेताओं ने तात्कालिक तौर पर झुक जाना बेहतर समझा और आनन् फानन में अन्ना हजारे की सभी मांगे बिना किसी शर्त मान ली गयी.
लेकिन इस देश के राजनीतिज्ञ इतनी जल्दी हार मानने वाले नहीं थे, सो अनशन की समाप्ति के बाद भ्रष्ट राजनीतिज्ञों ने अपनी गन्दी चालें चलनी शुरू कर दी और अन्ना की टीम के सदस्यों के खिलाफ ओछे हथकंडे आज़मा कर उन पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया ताकि देश का युवा अन्ना हजारे और उनकी चुनी हुई टीम से अलग हो जाएँ, जो जनशक्ति अन्ना से जुडी है बिखर जाये. ताकि इन भ्रष्ट राजनेताओं की चांदी होती रहे. जब भी
यहाँ सवाल भूषण पिता पुत्रों का नहीं बल्कि सदियों से कुचले जाते नागरिकों के दिलो में उठे उस जज्बे को कायम रखने का है जो इस भ्रष्ट तंत्र की कारगुजारिओं से पनपा है. जारी…..
जारी….

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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