बिहार में मीडिया आजाद नहीं : जस्टिस मार्कंडेय काटजू

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पटना। बेबाक विचारों से उत्पन्न विवाद एवं जस्टिस मार्कडेय काटजू का चोली-दामन का साथ रहा है। शुक्रवार को इसका गवाह बना पटना विश्वविद्यालय का एतिहासिक ह्वीलर सीनेट हाल, जहां वे ‘चार जन सिद्धांत : विज्ञान, जनतंत्र, जीविका एवं जन-एकता’ विषय पर व्याख्यान देने आए थे। जस्टिस काटजू ने कहा बिहार में प्रेस स्वतंत्र नहीं है। सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों का उत्पीड़न किया जाता है।

इसी दौरान कुछ लोगों ने हंगामा करने की कोशिश की। जिस पर श्री काटजू ने कहा कि इस हंगामे से यह साबित होता है कि यहां प्रेस को सरकार के खिलाफ़ बोलने या लिखने अधिकार नहीं है। आज बिहार के किसी पत्रकार में सरकार या मंत्री के खिलाफ़ लिखने की हिम्मत नहीं है। अगर कोई मीडिया हाउस ऐसा करता है, तो उसका विज्ञापन रोकने की धमकी दी जाती है। इस हंगामे यह सिद्ध होता है यहां किसी को बोलने की आजादी नहीं है। प्रेस काउंसिल की धारा-19 में यह जिक्र है कि मीडिया की आजादी पर रोक नहीं लगायी जा सकती। आप सरकार हैं, तो संविधान के नीचे हैं, उसके ऊपर नहीं। उन्होंने चेताया कि सरकार का यह कथित आचरण संविधान का उल्लंघन है। इसकी जांच के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तीन सदस्यीय टीम शीघ्र बिहार आएगी।

उनके इस वक्तव्य का सभागार में मौजूद पटना कॉलेज के प्राचार्य और जद यू विधायक ऊषा सिन्हा के पति लालकेश्वर प्रसाद ने काटजू के बयान का प्रबल विरोध किया। इस पर वहां मौजूद छात्रों ने जस्टिस काटजू के समर्थन में हंगामा कर दिया और तभी शांत हुए जब प्राचार्य प्रसाद सभागार से बाहर चले गए। छात्रों के समर्थन से उत्साहित काटजू ने कहा कि मैं इलाहाबादी हूं और इस तरह आप मुझे हड़का नहीं सकते। मैं इन सबसे डरने वाला नहीं हूं। सरकार संविधान के नीचे है उसके ऊपर नहीं। उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता पिछली सरकार की तुलना से कम बताते हुए नीतीश सरकार को कठघरे में खड़ा किया।

जस्टिस काटजू ने कहा कि अगर किसी मीडियाकर्मी ने परोक्ष रूप से भी मंत्री अथवा अधिकारी के खिलाफ लिखा तो अखबार मालिक पर उस कर्मी को हटाने या ट्रांसफर करने का दबाव बनाया जाता है। लोकतंत्र के लिए प्रेस की आजादी को जरूरी बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर प्रेस आलोचना करता है तो सरकार को बुरा नहीं मानना चाहिए। इस मौके पर काटजू ने कानून एवं व्यवस्था की सुधरी हालत के लिए बिहार सरकार की तारीफ भी की। उन्‍होंने बताया कि जहां शिकायत मिलती है, परिषद जांच करती है। महाराष्ट्र में पिछले 10 साल के दौरान 800 पत्रकारों पर हमले होने की शिकायत मिलने पर उन्होंने वहां के मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर कारण बताने को कहा कि प्रेस की आजादी की अवहेलना करने पर क्यों न वे राष्ट्रपति से यह सिफ़ारिश कर दें कि उन्हें पद से हटाया जाये।

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