फूलन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी भी हैं प्रासंगिक

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जार्ज जोसेफ-||

डकैत से सांसद बनीं फूलन देवी की हत्या हुए भले ही 11 वर्ष बीत गए हों, लेकिन अभी भी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में वह प्रासंगिक हैं।

कानपुर शहर के हरजिंदर नगर इलाके की जूते के शोरुम में लगी फूलन की तस्वीर इसकी गवाह है। महाराजपुर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार एवं शोरुम के मालिक मोहम्मद असीम कहते हैं, “वह मेरी बहन थीं। मैं उन्हें हमेशा इज्जत के साथ याद करुं गा।” यहां गुरुवार को मतदान होना है। फूलन देवी ने जब 1990 के दशक में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर राजनीति में प्रवेश किया तबसे असीम उनके सम्पर्क में थे। उन्होंने कहा, “मैं हमेशा से यह महसूस करता था कि निचली जाति से सम्बंधित उस महिला पर ज्यादती हुई है। उनका हिंसात्मक जवाब एक प्रतिक्रिया थी।”

फूलन की प्रशंसा करने वालों में उनके कई पूर्व सहयोगी एवं राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं। फूलन के गिरोह ने 1981 में कानपुर से 60 किमी दूर बेहमई गांव में 22 ठाकुरों की हत्या कर दी थी। मल्लाह जाति की फूलन घटना के समय 18 वर्ष की थी।

लेकिन फूलन की कथित पीड़िता की छवि प्रस्तुत करने के प्रयासों का कई लोग विरोध भी करते हैं।

बेहमई कांड की विधवाओं का कई वर्षो तक मुकदमा लड़ने वाले विजय नारायण सिंह सेंगर ने कहा, “मीडिया एवं कुछ राजनीतिज्ञों द्वारा फूलन को महिमामंडित किया गया है।” फूलन की 2001 में 38 वर्ष की उम्र में हत्या कर दी गई थी। सेंगर ने कहा कि वह फूलन एवं उसके गिरोह के सदस्यों के खिलाफ अभी भी मुकदमा लड़ रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी इजाजत भी दे दी है।

फूलन पड़ोस के मिर्जापुर से सपा के टिकट पर दो बार सांसद चुनी गईं थीं। अभी भी कई राजनीतिज्ञ उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते। उन्नाव सीट से सपा उम्मीदवार एवं विधायक दीपक कुमार फूलन के निकट सहयोगी रहे हैं। उन्होंने आईएएनएस से कहा, “अपनी राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने हिंसा से भरे अपने जीवन के पिछले अध्याय को बंद करने की कोशिश की।”

कुमार के पिता और वरिष्ठ समाजवादी नेता मनोहर लाल कानपुर के पूर्व सांसद हैं और उनके प्रयासों से फूलन राजनीति में आईं। मिर्जापुर से सपा प्रत्याशी कैलाश चौरसिया एवं बहुजन समाज पार्टी के पिंटू सेंगर भी फूलन की प्रशंसा करते हैं।

फूलन की हत्या के आरोप में बंद शेर सिंह राणा गौतमबुद्ध नगर की जेवर विधानसभा क्षेत्र से राष्ट्रवादी प्रताप सेना के टिकट पर मैदान में है।

लेकिन फूलन एक दुर्दात डकैत थी या फिर सामाजिक अत्याचार की शिकार, इस बात पर बहस अभी भी जारी है।

सेंगर कहते हैं कि फिल्म एवं मीडिया के कारण फूलन को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया। जबकि असीम फूलन के प्रति सम्मान को लेकर दृढ़ है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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  1. जब फूलन देवी की शादी नहीं हुई थी उमेद सिंह से और मैं उसे तिहाड़ जेल से लेकर आया था, तब मैंने एक कहानी “सन्डे” (आनंद बाज़ार पत्रिका समूह) में की जिसमे लिखा था की “फूलन की मंगनी उमेद सिंह से”, च महीने बाद, दक्षिण दिल्ली में स्थित अपने घर पर बुलाई, मैं उस समय इंडियन एक्सप्रेस में आ गया था, उसने “मेरा गरेवान पकड़ी और बोली…पंडत तुम क्या-क्या लिखता है? तू मुझे जनता है या नहीं? मेरे साथ कुछ और पत्रकार बंधू थे, सभी देख रहे थे,..मैंने कहा: तुम्हे तो लगभग १६ साल से जनता हूँ, लेकिन अगर यह खबर गलत है तो तूं जो चाहे कर ले, अगर सही है तो लड्डू खिला….दुसरे ही पल मुन्नी (फूलन की छोटी बहन) बहुत बड़े परात में लड्डू लेकर हाज़िर थी और फूलन मुझे गले लगायी थी…..बहुत कम इन्शान ऐसे होते हैं जिन्हें खुद की पहचान होती है…शेरनी की तरह जीवित रही…शेरनी की तरह मौत को गले लगाया.

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